बाबा शेख फरीद की कथा | Story of Baba Farid Ganj Shakar

बाबा शेख फरीद की कथा | Story of Baba Farid Ganj Shakar

एक गांव में एक व्यक्ति रहता था जिसका नाम शेख फरीद था और वह मुस्लिम यानी इस्लाम धर्म से सम्बन्ध रखता था। वह बहुत ही महान और नेक दिली इंसान था। उसकी आत्मा उसे हमेशा ही नेक काम करने के लिए सलाह देती थी क्योकि वह ईश्वर में बहुत विश्वास करता था। आज मैं आपको उस महान व्यक्तित्व वाले शेख फरीद की कहानी सुनाऊंगा जो भगवान् के प्रति बहुत ही भक्ति भावी था। 

शेख फरीद बचपन में बहुत ही शरारती बालक था जिस तरह हर बालक बचपन में शरारती होता है ठीक उसी तरह। एक दिन शेख फरीद जी की अम्मी ने उन्हें नमाज पढ़ने के लिए कहा और उन्होंने इंकार करते हुए कह दिया की

नमाज पढ़ने से क्या होगा अम्मीजान ? और मैं नमाज क्यों पढूं?

तब उनकी अम्मी कहती हैं की नहीं बेटा ऐसा नहीं कहते हैं नमाज पढ़नी चाहिए। 

शेख फरीद जी को नमाज के बदले खजूर मिलने की कहानी

यदि तुम नमाज पढोगे तो तुम्हे अल्लाह उसके बदले में खजूर देंगे। तुम्हे खजूर बहुत पसंद हैं न। यह सुनकर शेख फरीद के मुंह में पानी आ गया और कहने लगे की ठीक है मैं नमाज पढूंगा। लेकिन कैसे पढूं ? क्यंकि शेख फरीद को खजूर बहुत ही पसंद थे और वो इन्हे बहुत खाते थे।

शेख  फरीद के अम्मी बोली के तुम्हे जैसा निर्देश दिया जाये वैसा ही करना। उनकी अम्मी ने उनके लिए एक चादर बिछा दी और कहने लगी की अपनी आँखे बंद करके कहो की या अल्लाह मुझे खजूर दे दो। और ऐसा तब तक करना जब तक मैं तुम्हे आँखे खोलने के लिए ना कहूं।

शेख फरीद जी ऐसा ही करते रहे। चूँकि उनकी अम्मी ने चादर के निचे पहले से ही खजूर छिपा रखे थे।  उन्होंने अपने घर का सारा काम समाप्त करके कहा की बेटा शेख अपनी आँखे खोलो और चादर के निचे देखो। शेख फरीद ने देखा तो पाया की वास्तव में वहां पर खजूर रखे थे जो उसे अल्लाह ने दिए थे।

एक दिन अल्लाह ने सच में शेख फरीद जी को खजूर दिए

शेख खजूर पाकर बहुत खुश था और उन्हें खाने में मशरूफ हो गया। अब शेख फरीद का विश्वास ईश्वर यानी अल्लाह के प्रति और अधिक बढ़ चूका था और वह हर रोज़ नमाज़ पढ़ने लगा। एक दिन का वाकया है की शेख फरीद की अम्मी उनकी चादर के निचे खजूर रखना भूल गई थी और अपना सारा काम समाप्त करके आँखे खोलने का निर्देश दे दिया लेकिन वह पाती हैं की शेख फरीद जी खजूर खा रहे हैं यह देख के वह आश्चर्य में पड़ गई। 

अब शेख फरीद जी की अल्लाह यानि ईश्वर में और भी श्रद्धा भर गई और वे इससे प्रेरित होकर एक आश्रम में जाकर एक महात्मा से आग्रह करने लगे की उन्हें भी दीक्षा प्रदान करें ताकि वो भी ईश्वर यानि अल्लाह को पा सके। 

बाबा शेख फरीद जी का गुरू बनाना

लेकिन महात्मा ने शेख फरीद से कहा की पुत्र यदि तुम चाहते हो की मुझे मुक्ति चाहिए तो यह व्रत रखने, नमाज़ पढ़ने और मांस को आहार के रूप में ग्रहण करने से संभव नहीं हो सकता। यदि आप पूर्ण मुक्ति और ईश्वर यानी अल्लाह को प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हे पूजा पाठ करने के वो सब तरिके त्यागने होंगे जो आज तक तुम अपनाते आये हो।

आपको इसके लिए सिर्फ ईश्वर के प्रति सच्चा ध्यान लगाना होगा यह तभी संभव है यदि आप ऐसा कर सकते हैं तो निश्चय ही तुम मुक्ति और ईश्वर (अल्लाह) को प्राप्त कर लोगे अन्यथा सब व्यर्थ है। 

शेख फरीद का अल्लाह यानि ईश्वर के प्रति इतना गहन विश्वास था की उसने अपने पारम्परिक पूजा पाठ यानी नमाज़ को छोड़ दिया और आश्रम में प्रमुख शिष्य का स्थान प्राप्त करके गुरु जी की सेवा में लीन हो गए। उन्होने अपने गुरुदेव से ध्यान लगाने का निर्देश लेकर ध्यान लगाना भी शुरू कर दिया।

शेख फरीद के गुरूजी जब भी प्रवचन देते तो हमेशा कहते थे की अल्लाह यानी ईश्वर निराकार हैं उसका कोई आकर नहीं है। और उसके तुरंत बाद यह भी कहते थे की यदि आप ईश्वर यानी अल्लाह को देखना चाहते हैं तो आपको एकमात्र मंत्र की आवश्यकता हैं और वह है ईश्वर के प्रति गहन ध्यान। बस यही मंत्र यानी ध्यान ही आपको ईश्वर यानि अल्लाह की प्राप्ति करवा सकता हैं। 

शेख फरीद जी अपने गुरू जी के सबसे प्रिय शिष्य थे

गुरु जी शेख फरीद और अपने अन्य शिष्यों के साथ आश्रम में रहते थे।  लेकिन गुरूजी के सब प्रिय शिष्य शेख फरीद ही थे क्योकि शेख फरीद ने गुरूजी के निर्देशों का अच्छे से पालन भी किया था और आश्रम के नियमो को भी सही ढंग से निभा रहे थे।  शेख फरीद गुरु जी की दृष्टि में बहुत ही अच्छे शिष्य थे। वहीँ दूसरे शिष्य शेख फरीद से ईर्ष्या करते थे वे शेख फरीद को गुरु जी की नज़र में निचा दिखने का हर संभव प्रयास करते रहते थे। 

गुरूजी अब बूढ़े हो चुके थे और सभी शिष्य बारी बारी से गुरु जी की सेवा करने लगे। अन्य शिष्यों के बाद अब शेख फरीद की बारी थी की वो गुरु जी की सेवा करे। शेख फरीद गुरु जी के लिए हुक्का भरने के लिए आग जला कर चला गया ताकि गुरु जी खाना खाने के बाद हुक्का पी सकें और हुक्का भरने में कतई भी देरी ना हो।

बाबा शेख फरीद जी का अपने गुरू के लिए अपनी आँख फोड़ने की कहानी

चूँकि गुरूजी जी को खाना खाने के बाद हुक्का पीने की आदत थी। उस दिन भी शेख फरीद ऐसा ही कर रहा था। शेख फरीद ने गुरु जी को खाना परोस दिया और हुक्का भरने के लिए चला गया और  वहां जाकर पाता है की आग तो नम हो चुकी है अगर गुरूजी को समय पर हुक्का न मिला तो गुरूजी मुझसे नाराज़ हो जायेंगे और मैंने आज तक जो भी भक्ति और तपस्या की है वह सब व्यर्थ चली जाएगी शेख फरीद सोच रहा था।

क्योकि आग जलाने में कठिनाई हो रही थी बारिश का मौसम हो चूका था। अन्य शिष्यों ने आग को बुझा दिया ताकि शेख फरीद को गुरूजी की नजरों में निचा दिखाया जा सके और गुरु जी उन सब शिष्यों की तारीफ करें और शेख फरीद को उनसे सिखने के लिए कहे। लेकिन इस सोच में डूबे हुए शेख फरीद को एक तरकीब सूझी और वे हुक्का लेकर गांव की ओर दौड़ पड़े ताकि गांव से हुक्के के लिए आग ला सके और गुरूजी को समय पर हुक्का दे सके जिससे गुरूजी उन पर नाराज़ न हो।   

अब शेख फरीद गाँव में पहुँच गए जो आश्रम से लगभग आधा किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। वह उस गाँव में एक घर के सामने जाकर खड़े हो जाते हैं।  जहाँ पर एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही है लेकिन बारिश के मौसम में आग बार बार बुझ रही है और वह महिला बहुत ही परेशान है |

इसी बीच शेख फरीद जी उस महिला से अग्नि देने का आग्रह करते है जिसे सुनकर महिला गुस्से से तिलमिला उठती है और कहती है की इस अग्नि को पाने के लिए मैंने अपनी आँखन का बलिदान कर दिया है। अगर तुम ऐसा कर सको तो तुम अग्नि पाने के पात्र हो अन्यथा नहीं। 

शेख फरीद यह देख और सुन कर सोचने लगा की इस शरीर का क्या फायदा अगर मेरे गुरूजी की सेवा के लिए काम ना आये। यह महिला मुझे आग तभी देंगी जब मैं अपनी आँखों को नष्ट कर दूंगा।

यदि मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो मैं अपने गुरूजी की सेवा करने में असमर्थ हो जाऊंगा यानी उनको हुक्का नहीं दिया तो अवशय ही नाराज़ हो जायेगे और मेरी इतने वर्षो की साधना, तपस्या और भक्ति पर व्यर्थ ही पानी फिर जायेगा। इसलिए मुझे मेरे गुरूजी को मुझसे नाराज नहीं होने देना चाहिए। 

कबीर हरि के रूठते, गुरु की शरण में जाय
कबीर गुरु जै रूठ गये, तो हरि ना करे सहायता

कबीर साहेब जी

यह सब सोच विचार करने  के पश्चात् शेख फरीद ने अपनी आँखों को नष्ट करने का मन बना लिया और चिमटे के साथ अपनी आँखों को निकाल कर उस महिला से कहा की लीजिये मैंने अपनी आँखों को नष्ट कर लिया है।  महिला यह देख कर घबरा गई और कहने लगी की  तपस्वी जी अपने यह क्या कर लिया मैं तो केवल आग ना जलने के कारन परेशान थी जिसकी वजह से मैंने तुम्हे टालने के लिए गुस्से में कह दिया था लेकिन अपने तो सच में ही अपनी आँखे नष्ट कर ली। उसने घबराकर शेख फरीद जी को आग दे दी। शेख फरीद जी आग लेकर वहां  आश्रम की ओर दौड़ पड़े की कहीं देर न हो जाये। अगर देर हो गई तो गुरूजी गुस्सा हो जायेंगे। 

उधर गुरू जी खाना खाने के बाद से शेख फरीद को दो बार आवाज़ लगा चुके थे या दो बार बुलावा भेज चुके थे। गुरु जी का एक नियम था की वो किसी को भी बुलाने के लिए केवल तीन बार ही आवाज़ लगाते थे अगर वह तीसरे बुलावे में नहीं आता था वे बेंत से उसे सजा देते थे।

शेख फरीद जी की आँख ठीक होना

गुरु जी के दो बार बुलावा देने पर शेख फरीद वहां नहीं आया गुरु जी परेशान थे की आखिर शेख फरीद क्यों नहीं आ रहा है उसे तो बुलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती फिर आज ऐसा क्यों हो रहा है।  खैर तीसरी बार गुरु जी ने आवाज लगाई तो शेख फरीद जो गुरूजी से लगभग 200 फ़ीट की दुरी पर था उसे जोर से आवाज देकर कहा की गुरूजी मैं आ गया हूँ।

गुरूजी शेख फरीद को देख कर बहुत ही प्रसन्न हो गए और वहीँ दूसरे शिष्य ईर्ष्या से जल उठे की ये कैसे आ गया। शेख फरीद ने गुरु जी को हुक्का दिया और गुरु जी के पास बैठ गया।  गुरु जी उसकी आँखों की ओर देखकर बोले की शेख फरीद बेटा तुम्हारी आँखों को क्या हो गया है यह कपडा क्यों बाँध रखा है तो शेख फरीद ने कहा की कुछ नहीं गुरूजी एक जहरीले कीट ने काट लिया था सो अब निकल गया है आप व्यर्थ में चिंता न करें और हुक्का का सेवन करे।

गुरु जी यह सुनकर चुका पीकर आराम करने लगे उधर शेख फरीद दर्द से कराहता रहा।  अगली सुबह वह औरत जिसने शेख फरीद को आँखे नाश करने लिए कहा था वह शेख बाबा की आँखों को अपने साथ लाइ और गुरूजी को सारा वृतांत सुनाया।  यह सुनकर गुरूजी शेख फरीद से बोले की तुमने मुझे बताया क्यों नहीं सारी रात तुम दर्द से कराहते रहे होंगे और मैं आराम से सोता रहा।

बाबा फरीद (शेख फरीद) Farid ganj shakar

मेरे शिष्य ने मेरे लिए इतना बड़ा बलिदान दिया और मुझे बताया तक नहीं और अपने प्रिय शिष्य को गले से लगा के बोले की अपनी आँख पर जो कपडा बाँध रखा है उसे खोलो। जब शेख फरीद ने कपडा खोला तो उसकी आँख बिलकुल ठीक थी, लेकिन आकार में पहले से थोड़ी छोटी थी। तब शेख फरीद जी कहते हैं की गुरूजी आपके लिए सिर्फ आँखें ही नहीं, मैं अपना पूरा शरीर बलिदान कर सकता हूँ तो फिर इस आँख का क्या महत्व है मेरे मालिक। 

कुछ वर्षों के बाद गुरूजी चल बसे यानी उनका निधन हो गया।  गुरु जी के जाने के पश्चात् शेख फरीद में मन में उत्सुकता हुई की इस शरीर का क्या फायदा जब उसे ईश्वर को प्राप्त ही नहीं किया तो मेरा सारा जीवन बेकार हो जायेगा। इसी सोच के साथ शेख फरीद ध्यान करता रहा। और एक दिन अचानक उसके मन में विचार उत्पन्न हुआ की कुएँ के अंदर उल्टा लटककर ध्यान किया जाये। 

अब शेख फरीद ने ध्यान करने के लिए नई जगह तलाश ली थी। वह हर रोज अपने पैरों को किसी पेड़ की शाखा से बाँध कर कुए में उल्टा लटक जाता था और उस गहराई तक जाता था जब तक की पानी की सतह ना आ जाये।  इस तरह ध्यान करते करते शेख फरीद को बारह वर्ष बीत गए। और शेख फरीद  ने खाना भी कम का दिया था वह केवल बारह वर्ष में लगभग 50 किलोग्राम भोजन का सेवन ही कर सका।

जिसकी वजह से उसका शरीर बिलकुल सुख गया यानी वह कमजोर हो गया लेकिन ईश्वर की प्राप्ति न कर पाया।  एक दिन जब वह अपने पिंजर शरीर की अवस्था में लेटा हुआ था तब वहां कोई, बाज़ आदि पक्षी उसे खाने के लिए आ गए। यह देख कर शेख फरीद ने कहा हे पक्षियों यदि आप लोग मुझे खाना चाहते हैं तो खा सकते लेकिन मेरी आँख मत छूना क्योकि मुझे ईश्वर (अल्लाह) को देखना अभी शेष है।

क्या पता कब और कहाँ मेरे ईश्वर यानी अल्लाह जी मुझे दिखाई दे जाये। यह कहकर शेख फरीद फुट फुट कर रोने लगा और वापिस कुए में जाकर लटका गया। 

कबीर साहेब जी (परमेश्वर कविर्देव) जी की शेख फरीद से वार्तालाप।

शेख जब वापिस कुए में गिर गए तो यह देख गुरुओं के गुरु और सर्वश्रेष्ठ भगवान कबीर साहेब जी वहां पर आये और शेख फरीद को कुए से बहार निकला। बहार निकलते ही शेख फरीद ने परमेश्वर कबीर से कहा की आप यह क्या कर रहे हैं क्यों मुझे परेशान कर रहे हैं?

तब कबीर साहेब जी बोले की आप क्या कर रहे थे? मुझे नहीं मालूम था मैंने देखा की आप कुए में गिर गए हैं तो मैंने आपको बचाने के लिए कुए से बाहर निकाला है। यह सुनकर शेख फरीद ने कहा मैं ईश्वर यानी अल्लाह से मिलने के लिए साधना कर रहा हूँ।

यह सुनकर कबीर साहब कहने लगे की मैं वही ईश्वर या अल्लाह हूँ जो तुमसे मिलने के लिए आया हूँ। इतना सुनकर शेख फरीद गुस्से में बोले कि हे महात्मन आप यहाँ से चले जाइये आप क्यों मुझसे मजाक कर रहे हैं? भला ईश्वर या अल्लाह को देखा जा सकता हैं वह तो निराकार है। भगवान् या अल्लाह ऐसा नहीं होता कृपया मुझसे मजाक न करें। 

शेख फरीद की बात सुनकर कबीर साहब कहने लगे कि यह तुम क्या कह रहे हो और क्या करने जा रहे हो? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा हैं। 

एक ओर तो तुम यह कह रहे हो कि ईश्वर यानी अल्लाह को देखा नहीं जा सकता वह निराकार हैं और दूसरी ओर तुम उनसे मिलने के लिए साधना कर रहे हो कि मुझे उनसे मिलना है और उनके दर्शन करने हैं। 

शेख फरीद जी ने कबीर साहेब जी को अपना गुरू बनाया

शेख फरीद परम परमेश्वर कबीर साहब की यह बात सुनकर समझ गया की यह महात्मा जरूर ज्ञान का जानकर है तभी तो ऐसी बाते कर रहा हैं।

उन्होंने उसी समय कबीर साहब के पैर पकड़ लिए और जोर जोर से रोते हुए कहने लगा कि हे महात्मन मेरा मार्गदर्शन कीजिये मैं पूरी तरह से भटक चूका हूँ और बहुत कष्ट में हूँ।

यह सुनकर कबीर साहब ने कहा की यदि तुम ईश्वर (अल्लाह) को प्राप्त करना चाहते हो तो हठयोग करने की जरूरत नहीं है हठयोग तो केवल तुम्हे एक राज्य कर शासक बना सकता हैं जिससे तुम उस राज्य के शासक बनकर शासन करके मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे और फिर जन्म, मरण, नरक, स्वर्ग और 84 लाख प्रकार की योनियों के जाल में फंस कर रह जाओगे। जो तुम्हे पूर्ण मुक्ति नहीं दे सकता। 

कबीर, ज्ञान हीन जो गुरु कहावे, आपन डुबा औरों डुबोवे। 

तब शेख फरीद ने महात्मा के रूप में उपस्थित कबीर साहब से दीक्षा ली, और उनके निर्देशानुसार सतनाम को प्राप्त किया। शेख फरीद ने वास्तविक नाम का उच्चारण किया और सर शब्द को प्राप्त किया। इन दोनों नामों को पाकर शेख फरीद ने अपने जीवन को सफल बनाया और सतलोक में चले गए जहाँ उन्हें पूर्ण मुक्ति को प्राप्त किया। 

बाबा फरीद जी के दोहे इन हिंदी

फरीदा खाकु न निंदीऐ, खाकू जेडु न कोइ।
जीवदिआ पैरा तलै, मुइआ उपरि होइ॥1॥


कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो मांस।
दोइ नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस॥2॥


जो तैं मारण मुक्कियाँ, उनां ना मारो घुम्म।
अपनड़े घर जाईए, पैर तिनां दे चुम्म॥3॥

बाबा शेख फरीद जी
बाबा फरीद जी के गुरु कौन थे ?

बाबा शेख फरीद जी ने पहले के संत फ़कीर को अपना गुरु बनाया था लेकिन बाद में उन्होंने कबीर साहेब जी को अपना असली गुरू बनाया।

बाबा फरीद का जन्म कब हुआ ?

बाबा शेख फरीद जी एक पंजाबी मुस्लिम सुन्नी संत थे। उनका जन्म सन 1173 में हुआ था और उनकी मृत्यु 7 May 1266 को पाकिस्तान में हुई थी।

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