दशरथ पुत्री शांता और ऋषि श्रंगी की प्रेम कथा

दशरथ पुत्री शांता और ऋषि श्रंगी की प्रेम कथा

श्री रामचंद्र और सीता विवाह के दौरान यंग  

ये तो आप जानते ही हैं कि श्री तुलसीदास जी कविताओं में रामायण का वर्णन देखने को मिलता है। उन्होंने बाल कांड अध्याय में दशरथ पुत्री शांता का वर्णन किया है।

यह बात तब सामने आती है जब श्री रामचंद्र जी सीता माता से विवाह करने के लिए जाते हैं तो सीता यानि दुल्हन के पक्ष की औरतें यंग यानि सीठणे सुनती हैं और कहती हैं कि हे रामचंद्र जी तेरी बहिन शांता जो ऋषि श्रंगी के साथ विवाह कर लिया या भाग गई थी।

जबकि विवाह तो अपनी जाती में होता है तुम क्षत्रिय और ऋषि श्रंगी ब्राह्मण। 

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ऋषि श्रंगी जी की इन्द्रियों को वश में करने के लिए कठिन साधना 

एक बार ऋषि श्रंगी अपनी इन्द्रियों को वश में करने के लिए कठिन तपस्या या साधना कर रहे थे उस समय वे अपनी पांचों इन्द्रियों को काबू करने में अपने आप को सक्षम समझ रहे थे। वे केवल दिन में एक बार वृक्ष की छाल को चाटकर तृप्त होकर बैठ जाते थे।

श्रंगी ऋषि अपनी भक्ति का प्रदर्शन करने के लिए अयोध्या के पास घने जंगल में बैठ गए। वहां पर लोग तरह-तरह का भोजन तैयार करके ले जाते और ऋषि के समक्ष रख देते और प्रतीक्षा करने लगते की कब ऋषि श्रंगी भक्ति से उठकर आँखे खोले और हमारा भोजन स्वीकार करें।

परन्तु ऐसा संभव ही नहीं हुआ ऋषि श्रंगी भक्ति में लीन वृक्ष की छल को चाटकर तृप्त हो जाते और फिर से भक्ति में लीन हो जाते। उनकी शक्ति का यह बोल बाला पूरी अयोध्या में तेजी से फ़ैल गया। 

राजा दशरथ और उनकी पुत्री शांता द्वारा ऋषि श्रंगी के दर्शन

इस बात की भनक एक दिन राजा दशरथ को लगी। यह सुनते ही राजा दशरथ अपनी पुत्री शांता और नौकरानियों के साथ ऋषि श्रंगी के दर्शन की लालसा लेकर नगर की और चल दिए और अपने साथ स्वादिष्ट भोजन भी।

राजा दशरथ अपनी पुत्री अरु नौकरानियों के साथ जंगल में ऋषि के पास पहुंचे और उन्हें परनाम करके वहां बैठ गए और प्रतीक्षा करने लगे ताकि ऋषि श्रंगी उनका भोजन स्वीकार करेंगे लेकिन यह उस दिन संभव नहीं हुआ क्योकि ऋषि ने अपनी आँखे ही नहीं खोली और वृक्ष की छाल चाटकर अपनी भक्ति में लीन रहे।

राजा दशरथ को वापिस निराश होकर लौटना पड़ा। लेकिन शांता ने हार नहीं मानी और वो अपनी नौकरानियों के साथ लगातार ऋषि श्रंगी के पास जाती रही। क्योंकि शांता उस समय युवा थी वो ऋषि को मन ही मन चाहने लगी।

शांता ने एक महात्मा या गुरुदेव से विनती की और पूछा कि ऋषि श्रंगी को भक्ति से कैसे उठाया जा सकता है जिससे वह आंखे खोल के भोजन ग्रहण करे। 

ऋषि शृंगी की भक्ति से आँखे खोलने के लिए वृक्ष की छाल पर शहद का उपयोग

गुरु ने बताया की आप उस वृक्ष की उस जगह पर शहद लगा दीजिये जहाँ ऋषि श्रंगी छाल को चाटता है। शांता ने ऐसा ही किया उसने वृक्ष के उस जगह पर शहद लगाया जहाँ ऋषि छाल को चाटता है उस दिन ऋषि ने छाल को दो बार चाटा।

अगले दिन फिर ऐसा ही किया गया और ऋषि ने इस बार चार बार ऐसा किया। तीसरे दिन भी ऐसा ही किया गया अबकी बार ऋषि श्रंगी छाल को चाटता ही रहा और उन्होंने अपनी आँखे खोली। आँखे खुलते ही ऋषि ने अपने सामने शांता को पाया।

शांता ने अपना परिचय देना शुरू कर दिया और कहा की हम आपके लिए स्वादिष्ट भोजन लेकर आये हैं ताकि आप अपनी भूख मिटा सकें। परन्तु वो ज्यादा भोजन न कर सके।

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राजा दशरथ के द्वारा ऋषि श्रंगी से महल में आने के लिए निवेदन 

यह खबर राजा दशरथ को मिली की ऋषि श्रंगी ने अपनी आँखे खोल ली हैं वो तुरंत ही ऋषि के पास पहुंचे और उनसे निवेदन किया की आप हमारे साथ हमारे महल चले।

ऋषि श्रंगी तुरंत सहमत हुए और राजा दशरथ के साथ महल आ गए। महल पहुंचते ही राजा दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को आदेश दिया की वह ऋषि श्रंगी की सेवा करे। 

शांता अपनी नौकरानियों से स्वादिष्ट भोजन तैयार करवाकर खुद परोसने के लिए जाती और घंटो तक ईश्वर के बारे में बाते करती  रहती थी। 

राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति हेतु याचना 

एक दिन राजा दशरथ ने ऋषि श्रंगी के समक्ष अपनी दुविधा पेश की और कहा की मुझे शांता के बाद कोई संतान नहीं है कृपया कोई रास्ता सुझाए। मैं चाहता हूँ मेरा कोई उत्तराधिकारी हो जाये जो इस राज्य को संभल सके।

ऋषि श्रंगी ने एक महायज्ञ करने का सुझाव दिया जिससे की आपको पुत्र प्राप्त हो जायेगा। और उन्होंने राजा दशरथ से कहा, यदि आप बुरा न माने तो यह यज्ञ मैं ही करना चाहता हूँ। राजा ने अनुमति दे दी और यज्ञ की तारीख़ को छह महीने आगे रखा गया। 

शांता से विवाह का प्रस्ताव

एक दिन ऋषि श्रंगी ने राजा दशरथ से कहा की हे राजन! यदि आप क्रोधित ना हो तो मैं आपके समक्ष अपनी एक बात रखना चाहता हूँ यदि हाँ हो तो उससे ज्यादा ख़ुशी की बात मेरे लिए नहीं हो सकती यदि ना हो तो कृपया मुझे क्षमा कर दीजियेगा। 

राजा दशरथ ने कहा हे ऋषिवर निश्चिन्त होकर अपनी बात रखे यदि मेरे हिसाब से आपके लायक हो तो मैं अवशय ही करूंगा। ऋषि श्रंगी ने कहा कि मैं आपकी पुत्री शांता से विवाह करना चाहता हूँ यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपने आप को धन्य समझूँगा।

यह सुनकर राजा दशरथ को ख़ुशी तो हुई लेकिन साथ ही दुविधा में फंस गए की यदि वे हाँ करते हैं तो समाज उन पर ताने मरेगा और यदि ना करते हैं तो खिन ऋषि उन्हें श्राप न दे दे। तब राजा दशरथ ने कहा मैं दोनों तरफ  में हूँ कृपया आप ही कोई रास्ता निकालें ताकि आप  शांता से शादी कर सकें।

ऋषि श्रंगी ने बीच का रास्ता  और एक ऋषि ने शांता को गोद लिया तब शांता एक ब्राह्मण जाती की हो चुकी थी और ऋषि श्रंगी भी ब्राह्मण था तब दोनों का विवाह हुआ और एक जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगे। 

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Ravinder Das

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