ईख या गन्ने की कथा | कबीर साहेब

ईख या गन्ने की कथा | कबीर साहेब

कबीर साहेब जब भी प्रवचन देते थे तो अपने अनुयायियों को समझने के लिए कहानियों का सहारा लेते थे ताकि वे प्रवचन सुन रहे अनुययियों को ईश्वर के बारे में अच्छे से समझा सके अर्थात मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। 

कबीर साहेब का धर्मदास को प्रवचन

एक दिन परमेश्वर कबीर साहेब अपने शिष्य धर्मदास को प्रवचन देते हुए कहते हैं कि धर्मदास यदि शिष्य या मनुष्य जब भी ईश्वर की भक्ति करता है उसके समक्ष बहुत सी कठिनाइयां होती हैं जिनका उसे सहनशीलता से सामना करना पड़ता है। जो भी शिष्य इन कठिनाइयों का सामना करते हुए भक्ति करता रहता है वह उतना ही ईश्वर को प्रिय हो जाता है अर्थात ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उतना ही करीब होता चला जाता है। 

ठीक उसी प्रकार जैसे एक किसान अपने खेत में ईख बीजने का काम करता है। जब किसान ईख (गन्ने) के छोटे छोटे टुकड़े करके उसे बोता है और जब वह ईख उगकर बड़ा हो जाता है तो किसान उसकी कटाई करने के पश्चात् उसे कोल्हू में पीड़ता है अर्थात उसका रस निकलकर गुड़, चीनी, खाण्ड, शक्कर, और मिश्री बनाता है। यही सब प्रकिर्या उस परमेश्वर की भक्ति करने की है। 

इन्द्रियों पर नियंत्रण

कबीर साहेब धर्मदास जी को आगे कहते हैं कि हे धर्मदास सच्चा साधक वही है जो अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रख सकता है अर्थात समय आने पर ही जरूरत के हिसाब से अपनी इंद्री का उपयोग कर सकता हो। अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने से मतलब है कि अपने भक्ति करना। आप पर अच्छे-बुरे का कोई प्रभाव न पड़ना। 

जिस समय आप भक्ति में लीन हों उस वक्त आप सौंदर्यवान रूप को देखकर आकर्षित ना हो और किसी भी कुरूप को देखने के पश्चात् आप उससे घृणा की दृष्टि से या अपने मन में ऐसा कोई विचार उत्पन्न ना करें। जिस समय आप सच्ची भक्ति के मार्ग पर चलते हैं तो आपको ललचाने के लिए बहुत सी कठिनाइयां उत्पन्न होती है जो इस सब पर काबू पा लेता है वह अपनी भक्ति को पूर्ण करके मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। एक सच्चे भक्त में काले-गोरे रंग का कोई भेद नहीं होता और न ही अमीर-गरीब का क्योकि गोरा रंग भले ही गोरा हो क्या पता उसका मन काला हो और काळा रंग वाले का मन गोरा अर्थात परोपकारी हो। उसी प्रकार जरूरी नहीं है की अमीर है वहीं आपको अच्छा भोजन या दक्षिणा दे सकता है हो सकता है एक गरीब भक्त या पुरुष आपकी उस अमीर व्यक्ति से कहीं ज्यादा दान दे दे। 

निर्णय में जल्दबाजी न करना

इसलिए हे धर्मदास कभी भी आप जल्दबाजी में निर्णय मत लेना क्योकि जल्दबाजी में लिया गया निर्णय हमेशा ही नुकसानदायक होता है। आप किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को पहचानने में थोड़ा संयम रखें ताकि आपको यह पता चल सके कि यह व्यक्ति की स्वाभाव का है। कभी कभी मीठा बोलने वाला व्यक्ति आपसे घृणा कर रहा होता है जिसका आपको अंदाजा भी नहीं होता और आपसे खिन्नता से बात करने वाला व्यक्ति आपके भले के लिए सोच रहा होता है। 

तुम्हारी भक्ति और साधना में सबसे अहम् बात आती है अपनी वासना को काबू में रखना। यदि आप अपनी वासना पर काबू पा लेते हैं तो आप निश्चय ही उस परमेश्वर की सच्ची भक्ति को सम्पूर्ण कर सकते हैं। 

सतलोक ही वास्तविक निवास स्थान 

कबीर साहेब प्रवचन देते समय एक और पूर्ण अर्थ वाला उदहारण देते हैं और कहते हैं की हे मनुष्य तुम इस लोक पर आये जरूर हो लेकिन यह लोक तुम्हारा स्थाई निवास स्थान नहीं है बल्कि तुम्हारा स्थाई निवास तो सतलोक है जहाँ तुम अपने परिवार को पाओगे। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक अनल पक्षी। 

विशाल अनल पक्षी की तरह ध्यान लगाना।

अनल पक्षी का नाम आप लोगो ने जरूर सुना होगा जो कि एक विशाल पक्षी होता था। जिसकी प्रजाति इस समय विलुप्त हो चुकी है। यह पक्षी इतना विशाल था कि अपने पंजों में एक नहीं बल्कि चार-चार हाथियों को एक साथ उठा कर ले जाता था। 

अनल पक्षी पृथ्वी पर न रहकर आसमान में रहता था। उनकी मादा पक्षी आसमान में ही अंडे देती थी जो बहुत ही बड़े आकर के होते थे। वह अंडे वहां पर देती थी जहाँ पर केले का बाग़ हो। क्योकि केले का पेड़ आपस में पत्तो से झुंड सा बना लेता है जिससे को भी चीज़ उस पर गिरे तो टूट नहीं सकती। इसलिए अनल मादा अपने अंडे केले के बाग़ में ही देती थी। उसका अंडा ऊपर आसमान से वायुमंडल से होकर गुजरते समय ही पककर उसमे बच्चा उत्पन्न हो जाता था। और अंडा जैसे ही केले के पत्तों पर गिरता तो वह उस वेग में हो जाता ताकि अंडा उस स्थिति में टूटे के बच्चे को कोई नुकसान न हो और अंडे के कवर की बात की जाए तो वह इतना मजबूत होता था की अंडे के ऊपर से गिरने के बावजूद भी बची को चोट नहीं लगने देता था। अनल पक्षी का बच्चा दूसरे पक्षियों के साथ उड़ना सीखता था और जैसे ही युवास्था को प्राप्त कर लेता वह अपने परिवार के पास पहुंच जाता और साथ में परिवार के लिए भोजन यानि चार-पांच हाथियों को ले जाता था। 

वह युवा अनल पक्षी हमेशा से ही यह जानता है कि यह स्थान जहाँ पर वो रह रहा है और जीवन का आनंद ले रहा है उसका स्थाई निवास नहीं है बल्कि आसमान में है जहाँ उसका वास्तविक परिवार रहता है जिनके पास वह एक दिन जरूर जायेगा। ठीक उसी प्रकार हे मनुष्य तुम भी इस लोक पर एक मेहमान की भांति ही निवास कर रहे हो जबकि सतलोक ही तुम्हारा वास्तविक निवास स्थान है जहाँ अपने परिवार एक पास जाने के लिए आपको अनल पक्षी के बच्चे की तरह मुक्ति पाने के तौर ताकीरों को अपनाना होगा जो आपको पूर्ण मुक्ति प्राप्त करने में सहायक होते हैं। यह तौर-तरीके और कुछ नहीं केवल एक सच्ची और पूर्ण भक्ति है जो आपको अपने जीवन में अपनानी चाहिए ताकि पर मुक्ति पर्पट करके सतलोक को जा सकें जहाँ आपका वास्तविक परिवार रहता है। 

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