भगवान् कबीर का चारो युगों में आना

भगवान् कबीर का चारो युगों में आना

जिस किसी भी व्यक्ति को तत्वज्ञान नहीं है, उस व्यक्ति की आत्मा को हमेशा संदेह रहता है कि कबीर साहेब (जिन्हे हम भगवान कहते हैं)

  • एक बुनकर के रूप में कैसे जन्म ले सकते हैं?
  • वो वेदो के पूर्ण परमात्मा कविर्देव कैसे हो सकते हैं?

भगवान कबीर का प्रकट दिवस (जन्म) विकर्मी सम्वत 1455 के वर्ष 1398 के ज्येष्ठ माह यानी मई और जून की पूर्णिमा की प्रातःकाल को कमल के फूल पर काशी शहर के लहर तारा तालाब में हुआ था। इनका लालन पालन बुनकर (धानक) नीरू और और नीमा ने किया था।

जब भी कविर्देव (कबीर परमेश्वर) के विषय में लिखा जाता है तो हम आपसे हमेशा यही अनुरोध करते हैं कि कविर्देव वेदों के ज्ञान से भी पहले सतलोक में उपस्थित थे। यह बिलकुल सच है कि वे खुद चारो युगो में ज्ञान देने के लिए स्वयं ही धरती पर अवतार के रूप में जन्म लेते हैं।

इन्हे चारों युगों में अलग अलग नामों से जाना जाता है जैसे –

  • सतयुग में – सतसुकृत
  • त्रेता युग में – मुनिंदर
  • द्वापर युग में -करुणामय
  • कलयुग में-  कविर्देव (भगवान कबीर)

के रूप में आते हैं। इन्होने और भी कई रूपों में अवतार लिया और अपनी लीला या ज्ञान रूपी कार्य को पूरा करने के पश्चात् गायब हो जाते हैं। इस समय भगवान् कबीर जो अपनी लीला को दिखने के लिए स्वयं प्रकट हुए हैं कोई भी नहीं पहचान रहा है भगवान कबीर को ना पहचानने का एक ही मुख्य कारण है की जितने भी पहुंचे या तथाकथित महर्षि हैं उन्होंने भगवान को निराकार बताया है की भगवान का कोई आकार नहीं है क्योंकि  वो सब में निहित है।  जबकि भगवान कबीर, भगवान के रूप में प्रकट हुए हैं। ऐसा इसलिए है की भगवान कबीर ही मात्र एक ऐसे भगवान हैं जिनके पास अपना शरीर है मेरे कहने का मतलब है जिसे हम देख सकते हैं। मगर भगवान् कबीर का शरीर उन पांच तत्वों से मिलकर नहीं बना है बल्कि इनका शरीर प्रकाश के एक तत्व से बना हुआ है।  भगवान जब और जहाँ चाहते हैं प्रकट हो जाते हैं।  ये कभी भी माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेते हैं क्योकि यही सभी के उत्त्पत्तिकर्ता हैं।

भगवान कबीर (कविर्देव) का सतयुग में  सतसुख के नाम से अवतार लेना।

सतयुग में गुरुड़ और श्री ब्रह्माजी ने भगवान कबीर से सच्चा ज्ञान प्राप्त किया था।  भगवान कबीर जी ने महान संत श्री मनु जी को तत्वज्ञान देने की भरपूर कोशिश की लेकिन ऋषि मनु भगवान के ज्ञान को सच नहीं मानते थे बल्कि वे ब्रह्मा जी और जो भी ज्ञान और  वेदों की  शिक्षा उन्होंने खुद ली थी बस उस पर ही अटल रहे।  और तो और ऋषि मनु परमेश्वर भगवान सतसुख को अपमानित भी करने लगे और कहते थे की आप ज्ञान नहीं अज्ञान बाँट रहे हैं। ऋषि मनु ने तो परमेश्वर कबीर को यानी सतसुख को वामदेव की उपाधि दे दी और इसी नाम से पुकारने लगे। जिसका मतलब था की विपरीत देव यानी अज्ञानी जो सही ज्ञान प्रदान न करता हो।

सत सुकृत जी को वामदेव के नाम से पुकारा जाने लगा

सतयुग में कविर्देव जी, सत्सुख के नाम ऋषियों के और उपासकों को वास्तविक ज्ञान देने आये थे लेकिन बदले में उन्हें उपहास झेलना पड़ा और वामदेव के नाम से भी सम्बोधित होना पड़ा।  सभी ऋषि बिलकुल भी मानाने को तैयार नहीं थे की कविर्देव जी वास्तविक ज्ञान देने के लिए कुशल हैं और वो उन्हें वास्तिविक ज्ञान प्रदान करना चाहते हैं इसके विपरीत वे उनके वामदेव के नाम से पुकारने लगे और उनका उपहास भी करने लगे।

यही कारण रहा कि वामदेव ऋषि को यजुर्वेद के वास्तविक ज्ञान का ज्ञाता माना जाता है या ये भी कह सकते हैं की उन्होंने ने ही सही तरीके से ज्ञान का अनुसरण किया और दूसरों को की करवाया।  इसका उल्लेख आप यजुर्वेद के विशेष 12 मंत्र 4 में देख सकते हैं जो की आज भी यजुर्वेद जैसे वेद में अभी भी वर्णित है।

पवित्र वेदों को पूर्णतया समझने के लिए कृपया अच्छे से सोचें –

आपको इसका उदाहरण देते हैं जो की यजुर्वेद में निहित है। यजुर्वेद को एक पवित्र पुस्तक माना जाता है और वास्तव मैं भी ऐसा ही है।

जिस प्रकार यजुह और यजुम दोनों संस्कृत के शब्द हैं और ये यजुर्वेद कीओर इशारा करते हैं ठीक उसी प्रकार कविर्देव को हम अलग अलग भाषाओँ में कबीर भगवान्, कबीर परमेष्वर, या कबीर साहब के सभी नाम कविर्देव की और इशारा करके हमें समझने या बताने की कोशिश करते हैं की ये कबीर भगवान् के ही नाम है जो तत्वदर्शी और वास्तविक ज्ञान के मार्गदर्शक है। बहुत से भक्त या व्यक्ति है जो हमेशा शक करते हैं या ये जानना चाहते हैं की आप कवि शब्द को कबीर में कैसे परिवर्तित कर सकते हैं? व्याकरण में में कभी अपने देखा या पड़ा हो तो कवि को किस प्रकार की संज्ञा दी गई है? कवि को सर्वज्ञ की संज्ञा दी गई है जिसका अर्थ है सब जगह या जिसे पूर्ण ज्ञान हो।

संत रामपाल जी का मानना है की हर शब्द का कोई न कोई अर्थ होता है। अगर हम व्याकरण की बात करते हैं तो भाषा का निर्माण कब हुआ मान लेते हैं की भाषा  पहले बनी है लेकिन यह भी उतना ही सत्य है की वेदो में  भगवान द्वारा भाषण पहले दिया गया है और उस भाषण को ऋषियों ने बाद में वेदो में इसे वर्णित करने का काम किया है।  ये भी हो सकता है की व्याकरण दोषपूर्ण हो।  अगर हम वेदो के अनुसार व्याकरण का अधययन करते हैं तो व्याकरण असंगत और विरोधाभासी है। क्योकि भगवान के दिए हुए भाषण या ज्ञान को वेदो में मन्त्रों और दोहो के माधयम से समझाया गया है।  अगर मैं आपको पलवल शहर का उदाहरण देकर समझाऊं तो उस समय लोग पलवल को परवार के नाम से जानते थे। अगर इस पर बहस हो जाये की पलवल को परवार कैसे कहा गया है यह ठीक उसी प्रकार मानाने योग्य होगा जैसे की कबीर को कबीर कहना।

मेरा तो यह मत है की जिस प्रकार आप अपने क्षेत्र की भाषा का उपयोग करके पलवल को परवर कहते है ठीक उसी प्रकार कवि को कबीर सम्बोधित किया गया है।

इस बात से कोई भी इंकार नहीं करेगा की ईश्वर एक है, महर्षि दयानन्द को कौन नहीं जानता है इन्होने सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास ४ पेज नंबर 100 ( दयानन्द मठ दीनानगर से प्रकाशित की ) जिस पर देवकर्म का जिकर किया है और उन्होंने उसका अर्थ देवर की कामना से किया है। और इसके एक पुरे बड़े देव को देवर लिखा है।  इसलिए व्याकरण में कोई आपत्ति या गलती नहीं है।  हम परमेशवर कबीर को अलग भाषा में कविर्देव कह सकते हैं।  ये सब सबुत हमें यजुर्वेद अध्याय 29 मंत्र और 25 सामवेद मंत्र न. 1400 , जोकि इस प्रकार वर्णित किया गया है।

यजुर्वेद अध्याय न. 29 श्लोक न. 25

समिद्दोअद्य मनुष्यों दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः। आ च वह मित्रमह भाषितांगत्वं गुण: कविरसि प्रचेता: ।। २५ ।।
सम्यग्ज्ञान :केतमनुश: दुरोणेदेव: देवान्यज्सिजतवेद: आ चवमित्रमह: ऋवंग्वत्वम्भव: कविर्असिप्रचेता:

समिध – आद्या – मानुष – दुरोन – देव – देव – यज – असि – जातवेद – आ – च – वं – मित्रम्ह – चिकित्वाँ – टीवीम् – ततो – कवि – असि – प्रचेताह

अनुवाद –  वर्तमान समय में पूजा  करने का तरीका जो की बिलकुल हानिकारक है। पूजा करने के इस तरिके से भरे हुए बिना विचार सकने वाले व्यक्तियों का शरीर महल रूपी हो जाता है इसके स्थान पर देवो के देव, और पूर्ण परमात्मा सत्पुरुष जी पूजा ही वास्तविक पूजा है।

जैसे कहा जाता है ना की ईश्वर ही सभी प्राणियों का एक मात्रा मित्र है जो मनुष्य के जीवित रहने तक उसका साथ देता है। और जो एक दूत के रूप में लाता है और अपने स्वस्थ ध्वनि ज्ञान और सच्चे  भक्त को भक्ति प्रदान करता है उसे ही हम कबीर कहते हैं और वे ही कबीर हैं।

भावार्थ – जब  परमपिता परमात्मा प्रकट हुए तो वे सभी ऋषि मुनियों और संतों को पीछे छोड़ते हुए और उनके पूजा करने के तौर तरीकों को भी निषेध करते हुए कबीर साहब अपने भक्त समुदाय को अपने तरीके से पूजा करने के लिए मार्गदर्शन  हैं या स्वयं उनके मार्गदर्शक बने हुए हैं। उस समय उनके तत्वज्ञान और ध्वनि ज्ञान के दूत बनकर कविर्देव या पूर्ण परमात्मा कबीर साहब खुद आते हैं।

संयुक्त श्लोक; मंत्र सांख्य 1400 सामवेद उत्तारिक आद्याय सं। 12 खंड नं। 3 श्लोक नं। 5

भद्रा वस्त्रा समन्या 3 वसानो महान् कविर्निवचन शंसन। आ वच्यस्वस्म्वो: पूयमानो विचक्षणो जृजर्देवदेवतौ।।५ ।।

भद्रवस्त्राणनिधानसन: महान्कविर्निवचनानिशं त्वच्यस्वचम्वो: पूयमान: विचक्षण: जागृति: देववीतौ

भद्रा – विसरा – सामन्य – वसन – महावन – कविर – निवचन – शसन – अवाच्यस्व – चमवो – पूयमान् – विचक्षणं – जाग्रिह – देव – वीतौ

अनुवाद – जो चतुर लोग होते हैं वो हमेशा पहले ही निर्देश देकर उपदेश देने का काम करते हैं वे अपने अनुयायियों या भक्तों को भाषण के माधयम से समझा देते हैं की वे जैसे कहेंगे आप वैसा ही करेंगे फिर चाहे आपके हिसाब से वो गलत हो या सही। वे कभी भी पूर्ण ब्रह्मा तक पहुंचने का मार्ग नहीं बताते है बजाय उसकी आपको आपके मार्ग से भटकने का काम करते हैं।

अर्थात वो दुसरो की पूजा करने के लिए आपका मार्गदर्शन करते हैं। दूसरों की पूजा से अभिप्राय है की – भूत-पूजा, पितृ-तर्पण, श्राद करने, और ब्रह्मकाल की पूजा। उस समय गलत ज्ञान की समाप्ति हेतु परम सुख देने वाले परमात्मा महान कबीर अपने शरीर को सत्यलोक में तेज रौशनी देने के समान अपने शरीर को प्राप्त करते हैं। वे अपने शरीर को चोले के रूप में प्रकट करते हैं।  आप चोले का मतलब तो समझते ही होंगे की चोला क्या होता है? चोले का अर्थ शरीर होता है।  आप लोगो ने देखा भी होगा की जब भी कोई संत महात्मा अपने शरीर को त्यागता है तो यह कहा जाता है की उन्होंने चोला त्याग दिया या छोड़ दिया है। कबीर साहब ने इस जगत में एक साधारण मनुष्य की भांति और एक मेहमान के रूप में सच्चा ज्ञान देने की कोशिश की है। पूर्ण परमात्मा का निर्गुण ज्ञान आपको शब्दाबली और सरगुन के छिपे हुए ज्ञान के प्रति जागरूक करता है।

अर्थ – यजुर्वेद अभय 5 मंत्र 1 के अनुसार भगवान का शरीर उस शरीर के समान है जिसे भगवान किसी कार्य हेतु अतिथि या वस्त्र के समान ग्रहण करता है। इस अर्थ है की कुछ समय के लिए भगवान इस जगत में आते हैं फिर छोड़ कर चले जाते हैं। वह उन आत्माओं को तत्वज्ञान के द्वारा जगाने की कोशिश करते हैं जो अज्ञान की नींद में सोये हुए भगवान पर अपनी आँखे बंद करके विश्वास करते हैं। इस मंत्र में यही समझाया गया है की पूर्ण परमात्मा कविर्देव या भगवान कबीर कुछ समय के लिए धरती पर  मनुष्य के रूप में प्रकट हुए है।  और कविर्निर्वाचनी शनान ने कवीर वाणी का पाठ किया जो तत्वज्ञान में जागरूकता लाने में कामयाब रहे।  और वे चतुर लोग जिन्हे उस समय महर्षि की संज्ञा दी गई थी वे सब झूठे ज्ञान, शास्त्र पर आधारित सच्ची साधना के अमृत के स्थान पर दुसरो को निराधार बना रहे थे। उस समय पूर्ण परमात्मा ने खुद प्रकट होकर तत्वज्ञान के सहारे शास्त्र आधारित सच्चे ज्ञान को प्राप्त किया और फैलाया।

यजुर्वेद अधाय 5  मंत्र 1 

अग्नेह तनुहि विष्णवे तव सोमस्य तनु हि विष्णवे तव आतिथ्यम् अतीश्याम विष्णवे त्वा श्यने, तव सोम भृते, विष्णवे तव अग्नि त्वा राय पश्यदे विष्णवे त्वा १

परिचय- यह मंत्र हमें भगवान की उन अवस्थाओं के बारे में बताता है जो एक राज्य या स्थान पर उनके चमकदार शरीर के बारे आभास कराता है और दूसरे में मनुष्य के रूप में प्रकट हुए शरीर के रूप में जो सभी आत्माओं पर अपना अनुकूलन बनाये हुए है। जैसे एक अतिथि के आने से घर में सुख शांति बनी रहती है ठीक उसी प्रकार पूर्ण परमात्मा के अतिथि के रूप में प्रकट होने पर इस जगत में हुआ है।  अतिथि से अभिप्राय है की जिसके आने की कोई तिथि न हो। अतिथि के रूप में आने से पूर्व ही भगवान ने दो राज्यों को चुना –

1 समय-समय पर ईश्वर कुछ समय के लिए इस जगत में एक साधारण मनुष्य के रूप में अपना जीवन यापन करते हुए तत्वज्ञान बांटते रहते हैं। जिस प्रकर कबीर रूप में 120 वर्षों तक अपनी लीला दिखा दिखा कर तत्वज्ञान को बांटते रहे। आपको ये तो पता ही है की कबीर साहब का जन्म काशी शहर की झील के उगे हुए कमल के फूल में प्रकट होने पर हुआ था। फिर इनका लालन पालन एक बुनकर परिवार में हुआ था।  इस अतिथि रूपी शरीर में इन्होने 120 सालों तक आध्यात्मिक ये तत्वज्ञान को फैलायाऔर फिर अंत में अपने निजी स्थान सतलोक चले गए।

2 दूसरी स्थिति में परमात्मा अपने आप को किसी संत, ऋषि या साधारण मनुष्य के रूप में प्रकट होकर अपने विशेष भक्त को दर्शन प्रदान करते हैं। उस स्थिति में वे उसे तत्वज्ञान का ज्ञान कराने और सतलोक दिखाने के पश्चात् वापिस पृथ्वी पर छोड़ देते हैं। इस स्थिति में किसी एक पक्षी जैसे बाज या अलल का उदाहरण दिया गया है।

आप ये तो जानते ही हैं की एक फाल्कन पक्षी दूसरे पक्षी पर बहुत ही तेजी से झपटा मारता है और उसे अपने साथ ले जाता है। इसी तरह एक और पक्षी है अलल जो आकाश में रहता है वह जल्दी से निचे आकर हाथी जैसे विशाल जानवर को उठा कर वापिस आकाश में चला जाता है। जो केवल भगवान को दीखता है वह अचानक बेईन नदी के किनारे संत गुरु नानक जी को मिलते हैं। उस मुलाकात के बाद संत नानक जी ने पूर्ण परमात्मा की महिमा का गुणगान मेहला पहला में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में उनके दिए हुए भाषण में निहित है। इसी तरह पूर्ण परमेश्वर ने 1727 में छुड़ानी गाँव, जिला झज्जर (हरियाणा)में संत गरीबदास जी से बाला नमक स्थान पर मुलाकात की। सतलोक दिखने के बाद उसेभी उसी दिन पृथ्वी पर छोड़ दिया। संत गरीबदास जी ने भी पूर्ण परमात्मा जी का वर्णन किया है जो उनके पवित्र ग्रन्थ वाणी गरीबदास में शामिल है। इसी प्रकार भगवान ने संत दादू जी, राजा अब्राहिम सुल्तान अधम जी, और आचार्य रामानंद स्वामी जी से मुलाकात की। इनकी ये मुलाकात केवल एक अतिथि के रूप में की थी। और इस मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार किया और उनकी आत्मा की भलाई के बारे में समझाया।  स्वामी रामानंद जी ने तो खुद अपनी आँखों से देखकर कबीर साहब का गुणगान किया है।

दोहुँ थोड़ है एक तू , भया एक से दो।

कहै कबीर हम कारणे, तुम आए हो मग जौ।।  

(इस पर स्वामी रामानंद जी ने कहा है की, हे मेरे पूर्णपरमात्मा कबीर साहब, आपका शरीर एक उज्जवल शरीर है और आप सबसे ऊपर हैं और आप दोनों स्थानों पर हैं मुझे मालूम है आप केवल और केवल हमारे लिए ही आये हैं।)

अनुवाद – आप एक सुडौल शरीर में विराजमान हैं। आपके पास एक ऐसा शरीर है जो सभी लोकों की  आत्माओं की पूर्ति के लिए या शरीर का पोषण करने के लिए रक्षा करने हेतु है। सोम पुरुष (अनंत भगवान) तीनो लोकों में प्रवेश कर सभी का भरण पोषण करते है।  भगवान एक अतिथि या अचानक से दिखाई देते हैं।  अतिथि उन्हें कहते है जिनके आने की तिथि पूर्व निर्धारित नहीं होती है।  ईश्वर का आगमन तीनो लोको में आवशयक्ताओं की पूर्ति करने के लिए प्रवेश से होता है।

भगवान् वह हैं तो एक मेहमान के रूप में आये हैं और पूजा करने के लायक हैं।  उन्होंने अपना ये रूप पूर्ण मुक्ति का मार्ग देकर भक्ति के अमृत से भरने के लिए होता है।

ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 1 मंत्र 9 और सूक्त 96 मंत्र 17-18

ऋग्वेद मंडल ९ सूक्त १ मंत्र ९

अभी इमं अध्न्या उत श्रीनन्ति धेनव: शिशुम्। सोमिन्द्राय पटवे।।9 ।।

अभी इमम्-अध्न्या उत श्रीनन्ति धेनव: शिशुम् सोमम् इन्द्राय पटवे।

अभि – अपर – अदहन्य – उत्त – श्रीनन्ति – धेनव – शिशम् – सोमम् – इन्द्र – पातवे

अनुवाद – वह पूर्ण परमात्मा भगवान, जो काशी शहर में बाल रूप में प्रकट हुए।  उनका पालन -पोषण करने के लिए कुंवारी गाय को रखा गया है।  जिससे उनके पोषण के साथ साथ विकास का भी अच्छा मूल साधन है।

भावार्थ – जब अपनी लीला करते हुए भगवान कबीर एक बालक के रूप में प्रकट हुए तो उस समय यह भी चमत्कार होता है की एक गाय जो कुंवारी है और दूध भी देती है। उसी गाय से भगवान का पोषण हुआ है।

ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 96 मंत्र 17

शिशुम् जज्ञानम् हर्य तम् मृजन्ती शुम्भन्ती हेम्मीरूत: गणेन।

कविर्गीर्भि काव्येना कविर् सन्तों सोम: पवित्र अतिदेती रेभं |

शिशुम जग्यनम ह्रीं तम मृजन्ति शुम्भन्ति वाहिनमरुतं गनेन कविर्गेभिः कवीना कांत संत सोमं पवित्रम् अतीति विद्रोह 17

अर्थ  – पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर साहब) स्वयं ही अपने मन से बालक के रूप में प्रकट हुए थे। और उनका सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान उस समय शुद्ध व्यक्त होता है जो भक्त ईश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं और वो उस वियोग की आज में जल रहे हैं वे उनकी इस आग को पवन या हवा की भांति शांत करते हैं। कबीर वाणी या कवि वाणी के माधयम से जोर जोर से सत्पुरुष या ऋषि के रूप में खुद कविवर ही हैं। लेकिन उस ईश्वर को न पहचान पाने के कारन उसे कवि भी कहा जा सकता है।

अनुवाद – पूर्ण परमात्मा अपने आप ही बालक के रूप में प्रकट हुए और उस पवित्रता के साथ अपने तात्विक ज्ञान को व्यक्त करता है भगवान् की प्राप्ति के लिए जुदाई की जो आग भड़क रही होती है वे उसे पवन के समान शांत या बुझाने का काम करते हैं। वे अपनी कबीर वाणी या कविताओं के माधयम से जोर जोर से गुणगान करके भाषण सुनते हैं।  वे कहते हैं की सत्पुरुष अकेला है वे ही ऋषि के रूप में कबीर साहब हैं या कविर्देव हैं।  लेकिन कुछ अज्ञानी या ईश्वर को ना पहचान पाने के कारन लोग उन्हें कवि की संज्ञा देते हैं। परन्तु वे ही पूर्ण परमात्मा हैं और उनका असली नाम कविर्देव है।

भावार्थ – वेदों का वर्णन करने वाले ब्रह्मा जी हैं और वे ही कहते हैं की पूर्ण परमात्मा कविर्देव एक मानव शरीर में बालक के रूप में प्रकट हुए है।  वे ही एकमात्र हैं जो वास्तविक आत्माओं को उनका वास्तिविक , तात्विक, और शुद्ध ज्ञान प्रदान करते हैं। कबीर वाणी के रूप में उनके बहुत अनुयायी है जो उनसे वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते है। वे ही सत्पुरुष हैं।

ऋग्वेद मंडल ९ सूक्त ९६ मंत्र १ 9

ऋषिमना य ऋषिकृत्स सुपषाः सनाथः पदवी: कवीनाम्। तृतीयम् धाम महिषः सिषा सन्तु सोमः विराजमानु राजति स्तूपः।

ऋषिमं या ऋषिकृत स्वशाः सहस्त्रांनेथ पदिविह कविनम् तृतेम धाम महिष सिष संत सोम विराजमानु रजति मूर्ख 18

वेदों का वर्णन खुद ब्रह्मा जी करते हैं और कहते हैं की वह पूर्ण परमात्मा, जो प्रसिद्ध कवियों के असाधारण बच्चे के रूप में आते हैं। और संत या ऋषि की भूमिका भी निभाने में पीछे नहीं हटते हैं। भगवान् के द्वारा रचित संत के रूप में हज़ारों भाषणों में प्रकृति के व्यक्ति यानी वे भक्त स्वर्ग के सुख के समान प्रदाता हैं। वे ही एक ऐसे सत्पुरुष हैं जो केवल और केवल पूर्ण प्रभु हैं और मुक्ति के तीसरे यानि सतलोक को पृथ्वी पर स्थापित करने के लिए कह रहे हैं। ये मानव की तरह पहाड़ी पर गुम्बद में एक उज्जवल सिहांसन पर एक शानदार मानव शरीर के रूप में बैठा हुआ है।

अनुवाद – वेद की कथा केवल ब्रह्मा जी ही कर रहे हैं वे इन वेदों में जीकर करते हैं की वे ही एक पूर्ण परमात्मा हैं जो बालक के रूप में प्रकट हुए हैं। वे ही एकमात्र प्रसीद कवि और ऋषि या संत की भूमिका निभाने में सक्षम है।  उनके द्वारा रचे गए भाषण में ही दर्शाया गया है की वे ही भगवान् हैं  जो संत के रूप में धरती पर प्रकट हुए हैं वो भी एक बालक के रूप में। वही हैं जो भक्तों को स्वर्ग के समान सुख प्रदान कर सकते हैं। वही है जो पृथ्वी पर मुक्ति का तीसरा लोक यानि सत्यलोक बनाना चाहते हैं। वे एक ऊँची पहाड़ी पर एक गुम्बद में बहुत ही चमकीले शरीर में निवास कर रहे हैं। क्योकि व्ही सत्पुरुष है।

अर्थ – पूर्ण परमात्मा एक बालक के रूप में आते है ये एक मंत्र में कहा गया है। फिर वे जैसे जैसे बड़े होते है अपनी लीलायें दिखते रहते हैं। वे हमेशा अपनी कविताओं के माधयम से लोगो को तत्वज्ञान प्रदान करते हैं इसलिए उन्हें कवि के नाम से सम्बोधित किया गया है।  वे ही हैं पूर्ण परमात्मा भगवान कबीर।  इन्होने जितने भी कविताओं और भाषणों का रचा है उन्हें हम कबीर वाणी के रूप में मानते हैं। ये वाणी ही भक्तो के लिए सवर्ग के समान हैं।  कबीर साहब या भगवान कबीर ही है जो भक्तो के लिए सत्यलोक स्थापित करने पर बल दिए हुए हैं।  वे अभी भी एक पहाड़ी पर गुम्बद में चमकीले और सुन्दर शरीर में विराजमान हैं।

इस मंत्र में सत्यलोक का तीसरे धाम की उपाधि दी गयी है जिस प्रकारब्रह्मलोक जो इक्कीश ब्राह्मणों का क्षेत्र हैं। दूसरा प्रब्रह्म का लोभ  है। जिस पर सात सनातन ब्राह्मण निवेश करते हैं। और तीसरा सतलोक है।

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