जगन्नाथ के मंदिर की अधूरी मूर्तियों का रहश्य

जगन्नाथ के मंदिर की अधूरी मूर्तियों का रहश्य


राजा इन्द्रदमन के स्वपन में प्रभु श्री कृष्ण जी आये और उन्होंने आदेश दिया कि भव्य मंदिर बनवाओ और इस मंदिर में कोई भी मूर्ति स्थापित नहीं करनी मंदिर का निर्माण पूरा होते ही उसी समय पर एक नाथ वंश के उत्तराधिकारी वहां पर आये राजा इन्द्रदमन को कहने लगे की हे राजन आप बहुत ही भव्य मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं लेकिन जैसा मैंने सुना है की इस मंदिर कोई भी मूर्ति को स्थापति नहीं किया जायेगा तो इस मंदिर का क्या फायदा होगा आपको इसमें एक मूर्ति अवश्य ही स्थापित करनी चाहिए।

लेकिन राजा ने कहा की हे नाथ मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योकि मेरे स्वपन में प्रभु श्री कृष्ण जी आये थे उन्होंने ही मुझे आदेश दिया था की मैं यहाँ पर इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाऊं और प्रभु श्री कृष्ण जी ने ही मना किया था की इस मंदिर में कोई भी मूर्ति स्थापित न करूं और वह पूजा पाठ भी नहीं करना है जो आप अब तक करते आ रहे हैं वह भी नहीं करनी है।

यह सुनकर नाथ जी हंसने लगे और कहने लगे की क्या स्वपन भी कभी सच होते हैं और उन्होंने कहा की इस मंदिर में जल्द ही एक चन्दन की मूर्ति स्थापित करें। यह कहकर नाथ नाराज होकर खड़ा हो गया और जल पान किये बिना ही वहां से चला गया। राजा इन्द्रदमन ने सोचा की नाथ नाराज हो गए तो उन्हें कोई दंड ने दे दें। इसके डर से उन्होंने चन्दन की लकड़ी मंगवाकर मूर्तिकारों से एक श्री कृष्ण जी की मूर्ति का निर्माण करवाकर मंदिर में स्थापित कर दिया।

तब राजा को अन्य संतो और गुरु जनो ने सलाह दी की इस मंदिर में अकेले श्री कृष्ण जी कैसे रह सकते हैं क्योकि श्री कृष्ण जी के साथ उनके दाऊ भैया श्री बलराम जी भी तो रहते थे उनकी मूर्ति भी स्थापित की जाये। किसी ने श्री कृष्ण जी की बहन सुभद्रा की मूर्ति स्थापित करने के लिए कहा जो श्री कृष्ण जी को अत्यंत प्रिय थी। आखिर में यह तय किया गया की तीनो की ही मूर्ति तैयार की जाये और मंदिर स्थापित की जाए। जैसे ही मूर्तियों का निर्माण हुआ और उन्हें मंदिर में स्थापित करने की बारी आई तो तीनो मुर्तिया टूट गई। 

राजा इन्द्रदमन बहुत ही गहरी चिंता में डूब गए और अपने आप को कोसने लगे। वे अपने आप को मन ही मन में कह रहे थे की राजा इन्द्रदमन को भी शुभ कार्य तुम्हारे हाथो से होना शायद नहीं लिखा है। मैंने जो भी शुभ कार्य करने की कोशिश की वह भंग हो गया है। मैंने मंदिर का भी निर्माण करवाया लेकिन हर बार ध्वस्त हो गया और फिर मूर्ति जो मंदिर में स्थापित करनी थी वो भी टुकड़ों में बदल गई और नाथ भी नाराज होकर चले गए हैं यदि मूर्ति स्थापित नहीं हुई तो नाथ और भी नाराज हो जायेगा और वह यह भी बर्दाश नहीं करेंगे की भगवान् की मूर्ति टूट गई है कहीं वह मुझे श्राप न दे दें। राजा दिन रात इसी सोच में डूबा रहा और न ही खाना खा पा रहे  सोने की इच्छा हो रही थी। 

80 वर्षीय बुजुर्ग का शिल्पकार के रूप में आना।

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राजा दिन रात इसी सोच में डूबा रहा और न ही खाना खा पा रहे सोने की इच्छा हो रही थी। पूरी रात राजा सो नहीं पाए। सुबह जब वे अपने दरबार में आये तो उन्होंने देखा की एक अस्सी वर्ष का वृद्ध शिल्पकार आया है और उसके पास एक थैला था जिसमे एक आरी जो लकड़ी काटने के काम आती है। वे साफ़ ही नजर आ रहे थे की वे एक शिल्पकार या कारीगर है। वह शिल्पकार कोई और नहीं बल्कि स्वयं पूर्ण परमात्मा कबीर साहब ही थे जो एक शिल्पकार का रूप धारण करके आये थे।

वे दरबार में आकर राजा से कहने लगे की राजन मैंने सुना है की एक भव्य मंदिर के लिए चन्दन की लकड़ी से बने हुए भगवान् की मूर्ति स्थापित करनी है लेकिन यह शुभ कार्य हो नहीं रहा है। हे राजन यदि आप मुझे एक मौका दे तो मैं अपनी प्रतिभा आपके समक्ष पेश करूं। मुझे शिल्पकारी का साठ वर्ष का अनुभव है महाराज और मैं उस मंदिर के लिए चन्दर की लकड़ी से भगवान् की मूर्ति बना सकता हूँ जो सबके बस की नहीं होती।

महाराज कृपया अनुमति दे अपने इस दास को मूर्ति बनाने के लिए। राजा इन्द्रदमन ने अस्सी वर्ष के शिल्पकार से कहा की हे वृद्ध शिल्पकार आप इस घडी में मेरे लिए परमात्मा यानि भगवान् से कम न होंगे यदि ऐसा कर देते हैं तो। मैं समस्या से जूझ रहा हूँ और मैं यह भी सोच रहा था की क्यों न किसी अनुभवी शिल्पकार को खोजै जाये जिससे की इस समस्या से निपटा जा सके और आप भगवान् के रूप में हाज़िर हो गए।

राजा ने शिल्पकार से पुछा की क्या आप जल्दी से मूर्ति बना सकते हैं? शिल्पकार यानि भगवान् कबीर साहब ने कहा की राजन मुझे एक कमरा चाहिए जिसमे मैं भगवान् की मूर्तियां बना सकूं। शिल्पकार ने राजा के समक्ष एक शर्त रखी की हे राजन मैं मूर्तियां एक शर्त पर बनाऊंगा यदि उन्हें पूरा करो तो मैं मुर्तिया बनाऊं अन्यथा नहीं।

राजा ने कहा कहिये शिल्पकार क्या शर्त हैं आपकी , शिल्पकार यानि  साहब ने कहा की मैं मूर्तियां बनाने के लिए कमरे में जाऊंगा वहां कोई नहीं आना चाहिए क्योकि मैं दरवाजा अंदर से बंद करूंगा। दरवाजा जब खुलेगा जब मूर्तियां तैयार हो जाएँगी।  यदि दरवाजा बीच में खुला तो मूर्तियों का कार्य बीच में ही रुक जायेगा यानि मूर्तियां जहाँ तक तैयार होंगी वही की वही रह जाएगी। राजा किस भी तरह इस समस्या से बहार निकलना चाहता था। राजा ने कहा जैसा आप कहे।

अपनी शर्त को रख कर वह वृद्ध शिल्पकार यानि कबीर साहेब कमरे के अंदर मूर्ति बनाने के लिए चले गए और कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। मूर्तिकार यानि शिल्पकार को मूर्ति बनाते हुए बारह दिन बीत गए और वह बहार नहीं आये न ही दरवाजे खुले। इसी बीच नाथ जी वहां देखने आते हैं की मंदिर में स्थापित करने के लिए मुर्तिया तैयार हुई के नहीं।

तब राजा इन्द्रदमन ने कहा की हे नाथ मंदिर के लिए मूर्तियों का निर्माण कार्य चल रहा है किन्तु जब भी चन्दन की लकड़ी से मूर्ति आधा रूप धार लेती है यानी आधी मूर्ति तैयार हो जाती है तो उसके टुकड़े हो जाते हैं। सबूत के लिए राजा ने अपने नौकरों से उन मूर्तियों के टुकड़े दिखाए ताकि नाथ को विश्वास आ सके। नाथ उन टुकड़ों को देखकर यह कहने लगे की अब तक जो हुआ सो हुआ अब मैं यहाँ हूँ अब काम चल रहा है जहाँ पर वहां पर मुझे अपने साथ ले चलो क्योकि मैं अपनी आँखों से देखना चाहूंगा की यह कैसे होता है।

राजा ने नाथ से विनती की की हे नाथ, आप वहां नहीं जा सकते क्योकि मूर्ति तराशने वाले कारीगर यानि शिल्पकार ने मना किया है और वह एक कमरे में बंद है वह शिल्पकार 80 वर्ष का है और उसे 60 वर्ष का शिल्पकारी का अनुभव भी है। राजा ने नाथ को वहां जाने से मना  किया लेकिन नाथ ने राजा की एक नहीं मानी और राजा को साथ लेकर वहां पहुंच गए जहाँ पर कबीर साहेब मूर्ति तराश रहे थे। वहां पर भी राजा ने कहा की हे नाथ वह बारह दिन से अंदर हैं और मूर्ति बना  रहे हैं उनका कहना था की जब तक मूर्ति बन नहीं जाती तब तक दरवाजा नहीं खुलेगा यदि खुला तो काम वहीं का वहीं रह जायेगा आगे नहीं होगा।

नाथ ने कहा हमें यह तो अवशय ही देखना होगा की शिल्पकार मूर्तियों को सही से तराश रहा है या नहीं। यदि तराशने के बाद उनमे किसी प्रकार की कमी निकल आई तो यह कहकर नाथ ने शिल्पकार को आवाज लगाई जिससे तराशने के कार्य करने की आवाज आ रही थी वह बंद हो गई और नाथ कहने लगा की तुम 80 वर्षीया बुजुर्ग की बात कर रहे थे न राजन और उसने बारह दिन से कुछ नहीं खाया कर नही पिया है कहि वह मर तो नहीं गए हैं नाथ ने दरबाजा तोड़कर खोलने के आदेश दिए।

जैसे ही दरवाजा खुला तो शिल्पकार वहां से गायब हो गया था और तीन मुर्तिया जिनके यही पैर बनाने बाकि थे बनी पड़ी थी। राजा और नाथ यह देख कर हैरान हो गए थे कि शिल्पकार जो मूर्ति बना रहा था गायब है और मूर्ति जो लगभग बन ही गई थी कमरे में पड़ी हैं। नाथ ने कहा चलो इतनी तो इतनी ही सही लगता है प्रभु को यही मूर्ति पसंद हैं।

ईश्वर खुद यही चाहते हैं की यही मूर्तियां उनके मंदिर में स्थापित की जाएँ। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है की स्वयं श्री कृष्ण जी यहाँ आकर ये मुर्तिया बनाकर गए हैं। 

कबीर साहेब जी एक भिखारी यानि शूद्र का रूप में मंदिर के मुख्य द्वार पर खड़ा होना

आखिर मूर्तियों को स्थापित करने का समय आ ही गया। जो प्रमुख पांडेय था उसने शुभ मुहूर्त निकला की कल मुर्तिया स्थापित की जाएँगी। अगले दिन सभी पांडेय और राजा , सैनिक और वो सब व्यक्ति जो धर्मपरायण थे मूर्तियों को स्थापित करने के लिए चल दिए। भगवान् कबीर जी एक भिखारी यानि शूद्र का रूप बनाकर मंदिर के मुख्य द्वार पर इस तरह खड़े हो गए जैसे की उनको पता ही नहीं हो की आज सभी मूर्ति स्थापित करने के लिए आ रहे हैं।

पांडेय ने शूद्र को धक्का देना और भगवान् की तीनो मूर्तियों का शूद्र रूप हो जाना।


सबसे आगे मुख्य पांडेय थे और उसने देखा की मंदिर मुख्य द्वार के सामने एक शूद्र यानि फ़क़ीर खड़ा है तो उसने शूद्र रूप में खड़े कबीर साहब को धक्का दे दिया और आगे निकल गए। कबीर साहेब उस धक्के से दूर जा गिरे और शूद्र की तरह सहमे से एकांत में जाकर बैठ गए। जितने भी व्यक्ति भगवान् की मूर्तियों को स्थापित करने के लिए आये थे वे सब मंदिर में चले गए और वहां जाकर पाते हैं की भगवान् की तीनो मूर्तियों ने उसी शूद्र का रूप ले रखा था जिसको मुख्य पांडेय ने धक्का दिया था। यह नजारा यानि कबीर साहेब की लीला रहस्यमई थी सब लोग आश्चर्यचकित रह गए की मूर्ति ने शूद्र का रूप ले लिया है।

यह देख मुख्य पांडये ने कहा की मंदिर का मुख्य  द्वार अशुद्ध हो गया है और यह सब उस शूद्र के कारण हुआ है। इसलिए सभी मूर्तियां शूद्र का रूप धारण किये हुए है। दुर्भाग्यपूर्ण वे मूर्तियां दोबारा अपने रूप में ढल गयी। गंगा जल से कई बार मंदिर को साफ़ किया गया और फिर मूर्ति स्थापना का कार्य किया गया। तब कबीर साहेब कहते हैं कि अज्ञानता का ये पाखंड देखो एक शिल्पकार एक मूर्ति का भगवान् बन गया और एक पंडित उस मूर्ति की स्थापना करता है और फिर लकड़ी का वह भगवन उनके कार्यों को पूरा करते हैं। अच्छा किया पाखंडी अपने ईश्वर में प्रेम रखने वाली आत्माओं का आपने अच्छा स्वागत किया।

श्री जगन्नाथ मंदिर में पड़ितों, राजा और नाथ के हाथों मूर्तियों की स्थापना हो चुकी थी। कुछ समय बीत जाने पर समुद्र देव ने अपनी लहरों को लगभग 40 फ़ीट ऊँचा उठा कर मंदिर की ओर बढ़ना शुरू कर दिया ताकि मंदिर को ध्वस्त कर दे लेकिन मंच पर बैठे कबीर साहेब ने आशीर्वाद के रूप में अपना हाथ उठाया की समुद्र की लहरें पहाड़ के समान ऊँची और सीधी खड़ी हो गई। समुद्र के प्रयास करने पर भी वह आगे बढ़ नहीं पा रहा था।

समुद्र देव द्वारा नष्ट करना और कबीर साहेब द्वारा मंदिर को बचाना

कबीर साहेब द्वारा जगन्नाथ मंदिर को बचाना

फिर समुद्र देव ने एक ब्राह्मण का रूप लिया और कबीर साहेब के पास आकर उन्हें प्रणाम करके कहने लगे कि हे ऋषिवर कृपया मेरा रास्ता छोड़ दे और मुझे आगे बढ़ने दें। महात्मा रूपी कबीर साहेब ने समुद्र देव से कहा की आप कहाँ जाना चाहते हैं तो उत्तर में  समुद्र ने कहा की मैं इस मंदिर को नष्ट करने के लिए आपने मेरा रास्ता रोक रखा है। कबीर साहेब ने कहा आप इस मंदिर को क्यों नष्ट करना चाहते हैं? उत्तर देते हुए समुद्र ने कहा की हे ऋषिवर त्रेतायुग की बात है जब श्री राम चंद्र जी श्री लंका में जाने के लिए मुझसे रास्ता माँगा था तो मेरे मना करने के बाद श्री राम चंद्र ने मुझे अग्नि बाण दिखाकर लज्जित किया था।

बस उस लज्जा का बदला लेने के लिए ही मैं इस  नष्ट करना चाहता हूँ कृपया आप मेरे रास्ते से हट जाये अन्यथा मुझे  आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। तब कबीर साहेब ने कहा की आपको रोका किसने है आप आगे बढ़ सकते हैं लेकिन अपने इस बेइज्जती का बदला तो द्वारिका नगरी को बहा कर ले लिया था न। समुद्र ने कहा की नहीं महाराज उस समय मैं  केवल आधा हिस्सा ही डुबो सका था आधा हिस्सा आपकी तरह किन्ही महापुरुषों ने बचा लिया था। 

कबीर साहेब कहते हैं की आप अब जाकर उस द्वारका नगरी को डुबो सकते हो।  लेकिन उस समय जब द्वारिका नगरी बचाने वाला भी मैं ही था। समुद्र देव आज्ञा लेकर देवरिका नगरी को डुबोने चल दिया और डुबो भी दिया।  लेकिन कबीर साहेब के कहे अनुसार उस स्थान को छोड़ दिया जहाँ पर श्री कृष्ण की कब्र बनी हुई है ताकि यह साबित किया जा सकता है की श्री कृष्ण जी मृत्यु को प्राप्त हो चुके है। 

उसे भी डुबो दिया तो लोग कहने लगेंगे की श्री कृष्ण जी अभी भी जिन्दा है। अब कबीर साहेब समुद्र से कहते हैं की आप अब इस मंदिर को नष्ट नहीं करेंगे और ना ही इस मंदिर से दूर जायेंगे। यह सुनकर समुंदर उस मंदिर से 1-1.50 किलोमीटर दूर पीछे हट गए। यह था जगन्नाथ मंदिर बनने का सारा का सारा किस्सा। 

शुरू से ही श्री जगन्नाथ मंदिर में अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं दिया गया। 

पांडे को कुष्ठ रोग होना और कबीर साहेब से रोग का ठीक होना।

मंदिर के निर्माण के कुछ दिनों बाद ही कबीर साहेब ने अपनी लीला दिखाई जिस प्रमुख पांडे ने कबीर साहेब को शूद्र रूप में धक्का मारा था उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उस पांडे ने अपने रोग का बहुत इलाज करवाया लेकिन ठीक नहीं हुआ।  उसने अनेकों प्रकार की धार्मिक यात्रायें और और धार्मिक सेवाओं का आयोजन किया लेकिन रोग घटने की बजाए बढ़ता ही जा रहा था। वह बार बार जगन्नाथ मंदिर जाता और अपने आप को रोगमुक्त होने की प्रार्थना करता। 

एक दिन श्री कृष्ण जी उस पांडे के स्वपन में आये और उन्होंने उनके दुःख का निवारण बताते  हुए कहा की यदि आपको याद हो श्री जगन्नाथ मंदिर में मूर्ति स्थापना के समय आपने एक शूद्र को धक्का दिया था यह उसी का फल है।  यदि आप इस रोग से मुक्त होना चाहते हैं तो उस शूद्र के पेर धोएं और उनसे क्षमा याचना करें। यदि वे आपको क्षमा कर दें तो आपको यह रोग ठीक हो सकता है अनयथा नहीं। 

वह पांडे सुबह जल्दी उठकर अपने साथियों के साथ श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंचा और उन्होंने देखा कि वही शूद्र बैठा हुआ है जिसे मैंने उस दिन धक्का दिया था।  जैसे पांडे तरफ बढ़ते हैं तो वह शूद्र वहां से उठ कर चल देता है और कहता है की हे पांडे ही मुझसे दूर ही रहिये मैं अछूत हूँ मुझे छूने से आपका धर्म भ्रष्ट हो जायेगा। यह कहकर पांडे जोर जोर से फुट कर रो पड़ा और शूद्र की और भागा और उसके सामने कपडा बिछा दिया और कहने लगा ही हे प्रभु कृपया इस पर बैठ जाइये।  कबीर साहेब उस कपड़े पर बैठ गए तब उस पांडा ने कबीर साहेब यानि उस शूद्र के पैर धोये और क्षमा मांगने लगा। तब कबीर साहेब ने एक कटोरे में फुटनार के दाने डाले और कहा की इन दानो को खाना और हर रोज़ थोड़ा सा पानी लेकर नहाना।  आज से 14 दिन बाद तुम्हारा ये रोग चला जायेगा और तुम स्वस्थ जो जाओगे। 

कबीर साहेब कहते हैं की आज से यहाँ यानि जगन्नाथ मंदिर पर अगर अस्पृश्यता का भाव करेगा तो निश्चय ही वह रोग से ग्रसित हो जायेगा। तब से अब तक श्री जगन्नाथ मंदिर पर अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं दिया गया है। 

नोट: – यह भारत का एकमात्र मंदिर है जहाँ शुरू से ही कोई अस्पृश्यता नहीं रही है।

यहाँ तक की मैं दास भी इस जगह पर जा चूका हूँ ये मेरा सौभाग्य था की में वहां पर गया जहाँ मेरे परम परमेश्वर कबीर साहेब ने जिस मंच से समुद्र को श्री जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त होने से रोका। मैंने इसके वहां पर सबूत भी देखें हैं और वे सबूत अब भी वहां पर मौजूद हैं। उस स्थान पर स्मारक के रूप एक गुम्बद बनाया गया है। बहुत पुराने महंत यानी पुराने मठ  उत्तराधिकारी अभी भी वहां पर बैठते हैं। मैंने एक सत्तर साल के महंत जी थे उनसे ये सारी  बातें पूछीं की क्या वास्तव में कबीर साहेब ने एक संत के रूप में भक्ति करते हुए समुद्र को रोका था की इस भव्य मंदिर को नष्ट न करें। उन्होंने बताया की कई पीढ़ियों से मेरे पूर्वज यहाँ संरक्षक के रूप में हैं।

यही पर श्री धर्मदास जी और उनकी पत्नी भक्तमति श्रीमती आमनी देव ने अपनी देह का त्याग किया था उन्होंने हमें वह स्थान दिखाया जहाँ इन दोनों की कब्र आमने सामने एक दूसरे के नजदीक बानी हुई है। अंत में हम श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के अंदर गए हमने वह देखा की वास्तव में  पूजा नहीं होती है बल्कि एक संत हो गीता जी से ज्ञान के पथ सुनाता है। यहाँ केवल एक प्रदर्शनी लगी है जहाँ तीनो मूर्तियों विराजमान हैं लेकिन उनकी पूजा नहीं होती। 

हमने वहां मौजूद पांडा से पूछा कि क्या यह सब सत्य है कि समुद्र देव ने इस मंदिर को पांच बार ध्वस्त किया था और फिर इसका पुर्नर्निर्माण किया गया था। समुद्र देव ने इसे नष्ट क्यों किया था? और समुद्रदेव को किसने रोका?

तब पांडे जबाब देते हुए कहता है की मुझे इसके बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं है पर हाँ इतना जरूर जनता हूँ की इस मंदिर के निर्माण पर जगन्नाथ जी की कृपा रही है और उन्होंने समुद्र देव को रोका जिसके कारण यह कार्य संपन्न हुआ। फिर मैंने उस पांडे से पूछा की यदि जगन्नाथ जी की लीला है तो मंदिर निर्माण कार्य के लिए उन्होंने समुद्र देव को पहली बार में ही क्यों नहीं रोक लिया। पांडे जी कहते हैं कि इसका जबाब आपको किसी के पास नहीं मिलेगा बस यही शब्द सुनने को मिलेगा की सब जगन्नाथ जी की लीला है उन्होंने जैसा चाहा वैसा ही हुआ। 

मैं उनसे निरंतर प्रश्न करता रहा और उनसे मेरा अगला प्रश्न था कि क्या इस मंदिर में किसी तरह की अस्पृश्यता है या नहीं? तब पांडे जी उत्तर देते हुए कहते हैं की आप देखेंगे की दूर दूर तक इस मंदिर में अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं दिया गया है। आप इसका उदाहरण भी देख सकते हैं की एक ब्राह्मण एक शूद्र दोनों ही एक थाली में भोजन करते दिखाई देंगे। क्योंकि यहाँ पर ऐसा पाया गया ही यदि कोई अस्पृश्यता का भाव रखता है तो वह कुष्ठ रोग से पीड़ित हो जाता है। फिर मैंने पूछा कि पांडे जी यदि पहले का हिसाब किताब देखा जाये तो अन्य मंदिरों में तो अस्पृश्यता स्पष्ट दिखाई देती थी वहां तो शूद्र का मंदिरों की और मुँह करना भी पाप माना जाता था फिर इस मंदिर में ऐसा क्यों नहीं है? पांडे जी कहते हैं की ये सब उस ईश्वर की लीला है लेकिन यहाँ मंदिर का निर्माण हुआ था तब से अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं है। 

धर्मपरायण की यही सोच है कि जगन्नाथ की लीला कहने मात्र से सत्य दबाया जा रहा है और वे यह भी सोचते हैं की सत्य दब भी गया है। पवित्र स्मारक सम्मानजनक हैं और वे चाहिए। पवित्र गीता और वेदों में भी कहा गया है की तत्वज्ञान की भक्ति भावना से आप का कल्याण हो सकता है। 

प्रमाण: गीता अध्याय 16 मंत्र 23, 24 श्री जगन्नाथ के मंदिर में, भगवान के आदेश के अनुसार, पवित्र गीता जी के ज्ञान की महिमा का गुणगान करके ही कल्याण संभव है।  श्रीमद् भागवत गीता जी में वर्णित पूजा विधि के अनुसार साधना करने से, अन्यथा केवल जगन्नाथ जी के दर्शन करने और प्रसाद खाने से कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि श्री गीता जी का उल्लेख नहीं होने के कारण यह क्रिया शास्त्र के विरुद्ध है, जो कि अध्याय 16 मंत्र 23, 24 में स्पष्ट रूप से वर्णित है।

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