जगन्नाथ पूरी का मंदिर कैसे बना?

जगन्नाथ पूरी का मंदिर कैसे बना?

भारत के उड़ीसा राज्य में एक इन्द्रदमन नाम का राजा था। वह केवल भगवान श्री कृष्ण जी की ही पूजा करते थे। एक बार की बात है कि राजा रात्रि में अपने शयन कक्ष में सोये हुए थे कि अचानक उनके स्वपन में श्री कृष्ण जी उनको दर्शन देते है और कहते हैं कि हे राजन आप मेरे परम भक्तो में से एक हैं तत्पश्चात मैं आपसे एक वचन मांगता हूँ कि तुम यहाँ पर एक मंदिर का निर्माण करवाओ और उसका नाम श्री जगन्नाथ पूरी रखना तथा याद रहे उन मंदिर में मूर्ति स्थापित करके पूजा-अर्चना नहीं करनी है बल्कि किसी भी एक संत को छोड़ना होगा जो यहाँ इस मंदिर में आगंतुक आएंगे उनको पवित्र गीता का ज्ञान प्रदान कर सके। 

राजा ने स्वपन में ही श्री कृष्ण जी से कहा कि हे भगवन अपने मुझ तुच्छ से मानव को अपने दिव्य दर्शन दिए, मुझ अभागे को और क्या चाहिए। आप केवल निर्देश दें ,मैं अपने पुरे राज्य में ही मंदिर बनवा दूँ। श्री कृष्ण जी ने कहा नहीं भक्त आइये मैं आपको उस जगन्नाथ मंदिर के लिए स्थान दिखता हूँ जहाँ आपको इसका निर्माण करवाना होगा।

राजा श्री कृष्ण के साथ उस स्थान पर चले जाते हैं और वह स्थान देखते है। वह स्थान समुन्द्र के  किनारे पर था। जैसे ही सुबह हुई राजा इन्द्रदमन अपनी नींद से जागे तो बहुत ही खुश नजर आ रहे थे उनकी पत्नी ने उनसे पूछा की क्या बात है आज आप सुबह उठते ही बहुत खुश नजर आ रहे हैं। तब राजा ने अपनी ख़ुशी का राज अपनी पत्नी को बताया और कहा की मैंने रात को स्वपन में श्री कृष्ण जी भेंट की है और उन्होंने मुझे समुद्र के किनारे पर श्री जगन्नाथ के मंदिर का निर्माण करने का आदेश या निर्देश दिया है।

रानी भी यह बात सुनकर बहुत ही प्रसन्न हो गई और कहने लगी की स्वामी शुभ काम दे देरी कैसी? चलिए हम शीघ्र ही उस स्थान पर चलते हैं जहाँ श्री जगन्नाथ के भव्य मंदिर का निर्माण करना है। हम वहां जाकर हमारी प्रजा को यह शुभ सन्देश देंगे और मंदिर की आधारशिला भी रखेंगे। राजा ने कुछ ही दिनों में मंदिर का निर्माण करवा दिया। जैसे ही मंदिर का निर्माण हुआ अचानक से समुद्र में चक्रवात आ गया और मंदिर को ध्वस्त करके चला गया। मंदिर इस तरह से धवस्त हुआ की  एक भी ऐसा निशान नहीं था कि यह कहा जा सके कि यहाँ इस स्थान पर मंदिर का निर्माण हुआ था। इस तरह राजा इन्द्रदमन ने श्री जगन्नाथ के मंदिर का पांच बार निर्माण करवाया और पांचों बार समुद्र ने उसे ध्वस्त कर दिया। 

परम परमेश्वर भगवान् कबीर साहब का उड़ीसा के राजा इन्द्रदमन से मिलना 

राजा इन्द्रदमन बहुत ही निराश हो गया था और हो भी क्यों ना क्योकि किसी भी राजा के लिए पांच बार भव्य मंदिर बनाना कोई आसान काम नहीं था क्योंकि वो मंदिर खुद श्री कृष्ण जी के आदेश से बनवाना था तो साधारण मंदिर नहीं बल्कि भव्य मंदिर बनवाना था। अंत में राजा ने फैसला लिया की वह अब मंदिर का निर्माण नहीं करेगा। वह सोच रहा था की भगवान् जानते ही हैं कि मैंने पांच बार श्री जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाया है जाने समुद्र देव को मुझसे क्या दुश्मनी थी जो पांचों बार निर्माण किये हुए मंदिर को ध्वस्त कर दिया। मेरा खज़ाना भी खाली हो चूका यदि मैं फिर से मंदिर बनवाने सक्षम होता। 

कुछ समय पश्चात् कबीर साहेब एक ऋषि के भेष में राजा इन्द्रदमन के दरबार में प्रवेश करते हैं और श्री जगन्नाथ पूरी के मंदिर के निर्माण करने के लिए कहते हैं और राजा को आश्वासन भी देते हैं की राजन आप इस बार मंदिर का निर्माण करवाएं मंदिर ध्वस्त नहीं होगा यह मेरा आपसे ये वादा है लेकि राजा इसके को तैयार नहीं था।

राजा ने कहा कि हे महात्मन हम आपका आदर सत्कार करते हैं परन्तु आप मुझे मंदिर के निर्माण हेतु ना कहें तो ही बेहतर है क्योकि जिन श्री कृष्ण जी के कहने पर मैंने इस मंदिर का पांच बार निर्माण करवाया है वही स्वयं इस समुद्र के कहर को रोक पाने में सक्षम नहीं थे यानि लाचार नजर आ रहे थे तो आप एक महात्मा या साधु इस कहर को कैसे रोक सके हैं?

जगन्नाथ मंदिर

महात्मन आपकी अन्य कोई इच्छा है तो बताये अवश्य ही पूरी की जाएगी और महात्मन मैं अगर मंदिर को दोबारा से बनाना भी चाहुँ तो नहीं बनवा सकता क्योंकि खजाना खाली हो चूका है। हे ऋषिवर मैं अब और परीक्षा नहीं दे सकता हूँ क्योकि मैं इस लायक नहीं रहा हूँ। 

तब ऋषि रूप में आये कबीर साहेब राजा इन्द्रदमन से कहते हैं कि हे राजन जो स्वयं इस सृष्टि के निर्माता हैं और सभी ब्रह्मण्डों के स्वामी हैं केवल वही ऐसा करने में सक्षम हैं और कोई नहीं है। मैं उस परमेश्वर की शब्द शक्ति को रखता हूँ। मैं उस समुद्र को रोक सकता हूँ।

ऋषि रूप में आये कबीर साहेब सत्य कह रहे थे लेकिन उस ऋषि रुप में अपने आप को छिपा रहे थे। लेकिन राजा इन्द्रदमन कबीर साहेब की बात मानने को तैयार ही नहीं थे। वे कह रहे थे कि हे ऋषिवर मेरा खजाना खाली हो चूका है और वह जो सबके पालन हार हैं, वही इस कहर को रोक नहीं पाए तो आप कैसे रोक पाएंगे ? मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।

संत रूपी कबीर साहेब ने राजा से कहा की किसी  मंदिर के निर्माण के लिए आपको मन बनाने की आवश्यकता है न की धन की। यदि आपके मन में है कि आप मंदिर बनवाना चाहते हैं तो कृपया मेरे साथ चलिए मैं आपको वह स्थान दिखाउंगा, जितनी जगह में मैं रहता हूँ। मैं आपको वचन देता हूँ कि इस बार समुद्र देव आपके कार्य में बाधा नहीं बनेगा। यह कहकर भगवान् कबीर साहेब वहां से चले गए और बताया कि यदि आपका मंदिर बनवाने का मन हो तो आप आ जाना और अपनी कुटिया का पत्ता बता दिया।

श्री कृष्ण जी का दोबारा जगन्नाथ मंदिर बनवाने का आदेश देना

उसी रात्रि को जब राजा अपने कक्ष में गहरी निंद्रा में थे तो श्री कृष्ण फिर से राजा इन्द्रदमन के स्वपन में आये और कहने लगे की राजन आपको श्री जगन्नाथ जी के मंदिर का निर्माण तो अवशय ही करवाना है। आप एक बार फिर से मंदिर का निर्माण कीजिये लेकिन हाँ मंदिर निर्माण के लिए आपके पास उन संत का होना अति आवशयक है वही एक मात्र संत हैं जो आपके मंदिर के निर्माण में आपकी सहायता कर सकते हैं। उन संत को आप को साधारण संत या फ़क़ीर न समझे क्योंकि उनकी भक्ति-शक्ति की कोई सीमा नहीं है। आप शीघ्र ही उनसे मिलें और उनसे आग्रह करें की मंदिर बनवाने में हमारी मदद करें। 

राजा इन्द्रदमन जब नींद से जागे तो सारा का सारा वृतांत अपनी पत्नी को बताया। रानी ने राजा की सारी बात सुनी और कहा कि यदि ईश्वर कह रहे हैं तो आपको पीछे नहीं हटना चाहिए। भगवान् श्री कृष्ण के कथनानुसार मंदिर का निर्माण फिर से करवाना शुरू कर दीजिये।

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रानी की सद्भावना पूर्ण बातें सुनकर राजा ने कहा कि यदि मैं मंदिर का निर्माण करवाता तो खजाना भी खाली हो चूका है बिना धन के यह संभव कैसे हो सकता है? और यदि मैं मंदिर नहीं बनवा सका तो मेरे प्रभु मुझसे नाराज हो जायेंगे। हे प्रभु आपने मुझे किस धर्म संकट में डाल दिया है, मैं करूं तो क्या करूं? मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।

रानी राजा को दुखी देख कर कहने लगी की स्वामी आप दुखी मत होइए। मेरे पास कुछ आभूषण है शायद उनसे मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया जा सकता है। आप इन आभूषणों को लेकर जाइये और प्रभु श्री कृष्ण ने आपको जो आदेश दिया है उस कार्य को अति शीघ्र पूरा कीजिये। रानी ने अपने आभूषणों को राजा को समर्पित कर दिया और कहने लगी कि राजन ये सारी मेरी सम्पति में भगवान् के कार्य के लिए आपको समर्पित कर रही हूँ।

राजा उन आभूषणों को लेकर कबीर साहेब के बताये हुए स्थान पर पहुंच गए जहाँ पर कबीर साहेब बैठे हुए थे। राजा ने कबीर साहेब के पास पहुंच कर उनसे प्रार्थना की हे ऋषि जी अपने जैसा कहा था ठीक वैसा ही श्री कृष्ण ने मुझे उसी रात स्वपन में कहा एक आप ही हैं जो इस शुभ कार्य को करने में हमारी मदद कर सकते हैं। कृपया मंदिर को बनवाने में हमारी मदद करें और समुद्र देव को शांत करें। 

कबीर साहेब द्वारा समुन्द्र को मंदिर तोड़ने से रोकना

तब कबीर साहेब जो संत के रूप में कहते हैं कि जहाँ से यानी जिस दिशा से समुद्र ऊपर आ रहा है उस दिशा में एक ऊँचा मंच तैयार किया जाए। उसी स्थान यानि मंच पर मैं बैठकर भगवान् की भक्ति करुंगा और समुद्र को रोकूंगा। तब राजा ने मूर्तिकारों से एक बड़े पत्थर को तराशकर एक मंच तैयार करवाया और राजा ने कबीर परमेश्वर से कहा की ऋषिवर आप इस मंच यानि स्थान पर विराजमान हो सकते हैं और संत रूपी कबीर साहेब उस स्थान पर बैठकर भक्ति करने लगे। अब मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो चूका था जो की छठवीं बार हो रहा था।  

कबीर चौरा मठ

अब जब कुछ समय बाद मंदिर बनकर तैयार हुआ तो समुन्द्र फिर से ऊँची लहरों उठा और मंदिर को तोड़ने के लिए आगे बढ़ा, लेकिन आगे कबीर साहेब जी बैठे थे तो उनके सामने समुन्द्र का वश नहीं चला और आगे नहीं बढ़ पाया। फिर समुन्द्र देव एक ब्राह्मण का वेश में आया कहने लगा कि हे ऋषि जी आप मेरे रस्ते हट जाइये मैं इस मंदिर को तोड़ कर रहूँगा।

समुन्द्र द्वारा द्वारिका को समाप्त करना

तब कबीर साहेब जी ने ब्राह्मण रूपी समुन्द्र देव से पूछा कि आप इस मंदिर को क्यों तोड़ना चाहते हैं, इससे आपकी क्या दुश्मनी है ? समुन्द्र देव ने कहा कि ये श्री कृष्ण जी के आदेश से यह मंदिर बन रहा है और त्रेता युग में श्री कृष्ण जी श्री राम रूप में थे तब इनको श्री लंका जाना था तो इन्होने मुझ पर अग्नि बाण चलाया था आज मैं उसी का बदला ले रहा हूँ। अतः आपके प्रार्थना है ऋषि जी आप रास्ते से हट जाएं क्योंकि आगे रहने से मेरी पार नहीं बसा रही।

kabir saheb ne samundar ko roka

तब कबीर साहेब जी कहने लगे कि अब आप इस मंदिर को मत तोड़ो। यह मंदिर में कोई भी मूर्ति पूजा नहीं होगी यहाँ केवल ज्ञान दिया जायेगा। समुन्द्र देव कहने लगे कि फिर आप मेरा समाधान बताएं ऋषिवर कि मैं अपना बदला कैसे पूरा करूँ। कबीर साहेब ने कहा कि आप एक काम करो कि आप श्री कृष्ण जी की द्वारिका को नष्ट करलो लेकिन इस मंदिर को आगे से कभी कोई नुक्सान मत पहुँचाना। यह सुनकर समुन्द्र पीछे हट गया और द्वारिका को डुबो दिया और इस तरह जगन्नाथ के मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।

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2 thoughts on “जगन्नाथ पूरी का मंदिर कैसे बना?

  1. सबका मालिक एक है और वो और कोई नही सिर्फ और सिर्फ कबीर साहेब ही भगवान है ।

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