Kabir Saheb ke Shabad | जग सारा रोगिया रे जिन सतगुरू भेद ना जान्या

Kabir Saheb ke Shabad | जग सारा रोगिया रे जिन सतगुरू भेद ना जान्या

आज हम आपको कबीर साहेब जी का शब्द ब्तटने जा रहे हैं जिसमे कबीर साहेब जी ने बहुत ही प्यारी अमृतवानी कही है। वैसे तो कबीर साहेब ने संकड़ों दोहे जाये है जिनमे सामाजिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सहित बहुत ही गुड ज्ञान छुपा हुआ है।

Kabir Saheb ka Shabad | कबीर साहेब का शब्द

जग सारा रोगिया रे जिन सतगुरू भेद ना जान्या जग सारा रोगियारे।।टेक।।

जन्म मरण का रोग लगा है, तृष्णा बढ़ रही खाँसी।

आवा गमन की डोर गले में, पड़ी काल की फांसी।।1

देखा देखी गुरू शिष्य बन गए, किया ना तत्त्व विचारा।

गुरू शिष्य दोनों के सिर पर, काल ठोकै पंजारा।।2

साच्चा सतगुरू कोए ना पूजै, झूठै जग पतियासी।

अन्धे की बांह गही अन्धे ने, मार्ग कौन बतासी।।3

ब्रह्मा,विष्णु,महेश्वर रोगी, आवा गवन न जावै।

ज्योति स्वरूपी मरे निरंजन, बिन सतगुरू कौन बचावै।।4

सार शब्द सरजीवन बूटी, घिस-घिस अंग लाए।

कह कबीर तुम सतकर मानौं, जन्म-मरण मिट जाए।।5

Amar Bodh

इस शब्द मे संत कबीर साहेब जी ने समाज को समझते हुये बताया है कि यह सारा संसार तो जन्म मरण के दीर्ग रोग का रोगी है और केवल सच्चा सद्गुरु ही इस जन्म मरण के रोग से पीछा छुटवा सकता है। इसलिए मानव जीवन का मुख्य उदेश्य अपने जन्म मरण का नाश करवा कर मोक्ष प्राप्त करना चाहिए।

अवश्य पढ़ें: कबीर साहेब के दोहे हिन्दी में

कबीर साहेब जी का यह शब्द बताता है कि मनुष्य को पूर्ण गुरु से दीक्षा लेकर सारनाम प्राप्त करके इन जन्म मरण के रोग को समाप्त करवा लेना चाहिए।

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