कपिल ऋषि का जीवन परिचय

कपिल ऋषि का जीवन परिचय

कौशम्बीनरेश जितशत्रु की राजसभा के एक रत्न कश्यप नामक एक ब्राह्मण थे जिन्हे चौदह विद्याओं का ज्ञान था और वे कौशाम्बी के राज पंडित थे। ब्राह्मण कश्यप के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम कपिल रखा गया। 

कौशाम्बी नरेश राज पंडित ब्राह्मण कश्यप का बहुत ही आदर करते थे जिसके चलते वे बहुत ही ठाठ-बाट से राजसभा में उपस्थित होते थे। अचानक एक दिन ब्राह्मण कशयप की मृत्यु हो गई जब कपिल की अल्पायु थी और वह व्यस्क नहीं था जिसके चलते राजा ने अन्य किसी पंडित को अपना राज पंडित बना लिया। 

अपनी माँ की इच्छा पूरी करने के लिए कपिल शास्त्रों के अध्ययन के लिए श्रावस्ती अपने पिता के मित्र इंद्रदत्त के पास अध्ययन के लिए चले गए जहाँ उनकी मुलाकात एक सुन्दर लड़की से हुई और दोनों में प्रेम हो गया।

जिसके चलते इन्हे राजा के दरबार में चोर के रूप में पेश किया जहाँ इन्होने सत्य घटना को बताकर अपने मन को मोह माया दे दूर किया था। और यही कपिल एक विद्वान ऋषि के रूप में जाने जाते हैं। 

राजा सगड़ द्वारा पुत्र प्राप्ति हेतु श्री शिव जी की अराधना व् भगवान् शिव का राजा सगड़ को साठ हज़ार एक पुत्रों का वरदान 

राजा सगड़ इक्ष्वाकु वंश के बहुत ही प्रतापी राजा थे। उनकी दो पत्नियाँ थी – वैदर्भी और शैव्या जिनसे राजा सगड़ को कोई संतान प्राप्त नहीं हुई। राजा सगड़ अपनी दोनों पत्नियों से अत्यधिक प्रेम करते थे जिसके चलते वे अपनी दोनों पत्नियों के साथ हिमालय पर्वत पर संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव जी की तपस्या करने लगे।

भगवान् शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर राजा सगड़ को वरदान दिया की आपकी एक पत्नी के गर्भ से साठ हज़ार अभिमानी पुत्र जन्म लेंगे और दूसरी पत्नी के गर्भ से एक पुत्र जो तुम्हारे वंश को आगे बढ़ाएगा।

राजा सगड़ और उनकी पत्नियां वरदान पाकर अपने राज्य में वापिस लौट आये और समय के साथ राजा की एक पत्नी को तुम्बी उत्पन्न हुई जिसे फोड़ने पर साठ हज़ार पुत्रों की प्राप्ति हुई और दूसरी पत्नी ने  एक पुत्र को उत्पन्न किया। 

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अश्वमेघ यज्ञ के फल हेतु तालाब, कुआँ, और बगीचे का निर्माण 

एक ऋषि ने राजा सगड़ और उनके पुत्रों से कहा की यदि वे एक तालाब, कुआँ, और बगीचा बना दें तो उनको उसका फल उतना ही मिलेगा जितना की 1 अश्वमेघ यज्ञ का। राजा सगड़  पुत्रों ने इस कार्य की शुरुआत तुरंत ही कर दी। 

बहुत से समझदार लोगो ने उनसे कहा की यदि तुम जगह-जगह ऐसे ही करते रहे तो कृषि योग्य भूमि बचेगी ही नहीं। यदि किसी राजा ने मना किया तो उनसे युद्ध किया गया।

राजा सगड़ के पुत्रों ने एक घोडा छोड़ा जिसके गले में एक पत्र लिख कर बाँध दिया गया कि यदि कोई हमे इस कार्य के लिए रोकना चाहता है तो उसे हमसे युद्ध करना होगा।

लेकिन उन सिरफिरे लोगो से कौन पन्गा ले। यह देख धरती माता ने निर्णय किया की वे स्वयं श्री विष्णु के पास जाएँगी और उनसे प्रार्थना करेंगी की राजा सगड़ के पुत्रों को ऐसा करने से रोके।

इसी निर्णय के साथ धरती माँ श्री विष्णु के पास गाय का रूप धारण करके पहुंची और सारा वृतांत सुनाया। धरती माँ की बातें सुनकर श्री विष्णु जी ने कहा की आप निश्चिन्त होकर यहाँ से जा सकती हैं अब वे ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे। धरती माँ वहां से आ गई।

देवराज इंद्र का षड़यंत्र  

धरती माँ के जाने के पश्चात् ही श्री विष्णु जी ने देवराज इंद्र को याद किया और उनसे कहा की राजा सगड़ के पुत्र सौ अश्वमेघ यज्ञ करना चाहते है यदि उन्होंने यह कार्य पूरा कर लिया तो इंद्रलोक यानि तुम्हारा सिंहासन उनके नाम करना पड़ सकता है।

समय रहते कुछ कर सको तो  कर लो अन्यथा इंद्रलोक छोड़ने के लिए तैयार रहो। देवराज इंद्र ने तुरंत ही अपने दूतों को भेजा और उनको सब समझा दिया।

दूत जैसे जी पृथ्वी पर आये तो उन्होंने देखा की राजा सगड़ के सभी पुत्र सोये होये हैं तो उन्होंने घोड़े को खोल कर ऋषि कपिल की जांघ से बाँध दिया जो उस समय सगड़ राजा के राज्य के पास तपस्या कर रहे थे वह काफी लम्बे समय से तपस्या में लीन थे जिसके कारन वे बिलकुल सूख कर पतले हो चुके थे। 

कपिल ऋषि द्वारा राजा सगड़ के साठ हज़ार पुत्रों को जलाकर भस्म करना 

सुबह होने पर राजा के पुत्रों ने देखा की घोडा वहां पर नहीं है लगता है किसी ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा है वे घोड़े की पैड के साथ साथ कपिल ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे जहाँ घोडा उनकी जांघ से बंधा हुआ था उन्होंने जाते ही उनके शरीर को प्रताड़ना शुरू कर दिया उनके शरीर पर भले, तीर आदि चुभोये गए।

दर्द से क्रोधित होकर जब ऋषि कपिल ने अपनी आँखे खोली। आँखे खोलने के लिए उन्हें अपने हाथों का सहारा लेना पड़ा क्योकि उनकी पलके इतनी बड़ी हो चुकी थी की धरती पर पड़ रही थी। जैसे ही कपिल ऋषि ने आँखे खोली क्रोध के कारण उनकी आँखों से अग्नि बाण बरसने लगे जिससे सगड़ राजा के साथ हज़ार पुत्र जलकर राख यानि भस्म हो गए। 

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Ravinder Das

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