नाम दीक्षा तीन चरणों में प्रदान करना | कबीर साहेब

नाम दीक्षा तीन चरणों में प्रदान करना | कबीर साहेब

कबीर साहेब नाम दीक्षा तीन चरणों में प्रदान करते है और यही कबीर पंथ की नाम देने की प्रकिर्या है। कबीर साहेब पहले मन्त्रों का उच्चारण यानि जाप करने के लिए देते हैं और फिर जब वह भक्त सतनाम के काबिल हो जाता है तो उसे सतनाम प्रदान करते हैं उसके बाद जब वह भक्त इस संसार की मोह-माया, रिश्ते-नाते, काल के जाल से मुक्त हो जाने के लायक हो जाता है तो उसे सारनाम प्रदान करके उसे अपने साथ सतलोक ले जाते हैं अर्थात उसे पूर्ण मुक्ति प्रदान करते करते है ताकि वह जन्म-मरण के इस चक्र से मुक्त हो सके। आइये मैं आपको एक उदहारण या कहानी के माध्यम से समझाता हूँ –

राजा बीर सिंह बघेल और ब्राह्मण युवती चन्द्रप्रभा को नाम दीक्षा

एक समय था जब काशी नगरी में बीर सिंह बघेल नमक राजा हुआ करते थे। राजा बीर सिंह बघेल ने कबीर साहेब जो उस समय एक जुलाहे के रूप में थे उनसे नाम ले रखा था। कबीर साहेब ने दीक्षा के रूप में दो नाम तो दे रखे थे लेकिन सारनाम नहीं दिया था जिसे पाने के लिए वह राजा कबीर साहेब के समक्ष प्रार्थना करता रहता था कि हे महात्मन मुझे सारनाम प्रदान करने का कष्ट करें ताकि मैं पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति कर सकूं। 

वहीँ काशी नगर में एक चन्द्रप्रभा नाम की एक ब्राह्मण युवती रहती थी जिसका भगवान् जगन्नाथ और कबीर साहेब के प्रति अटूट विश्वास था। उसकी एक पुत्री भी थी जिसके साथ वह अपने एक छोटे से घर में रहती थी। उन दोनों माँ और बेटी ने भी कबीर साहेब से नाम ले रखा था वे भी अक्सर कबीर साहेब से सारनाम की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करने के लिए जाती थी। 

चन्द्रप्रभा की श्री जगन्नाथ पूरी को धोती अर्पित करने की इच्छा 

चन्द्रप्रभा जो की एक श्रद्धा भाव की युवती थी उसने अपनी श्रद्धा से कहा कि मैं जगन्नाथ पूरी मंदिर में एक धोती भेंट करूंगी। जिसके लिए उस युवती ने अपने घर के आँगन में कपास उगाई और उस कपास की सिंचाई के लिए गंगाजल लेकर आती थी। जिसके परिणामस्वरूप कपास अच्छी हुई कर उस कपास से एक धोती का निर्माण किया जिसे वह जगन्नाथ पूरी में भेट करना चाहती थी। 

कबीर साहब की राजा बीर सिंह बघेल समक्ष शर्त

अब वह दिन भी आने वाला था जब उसे वह धोती जगन्नाथ पूरी मंदिर में भेंट करने के लिए जाना था। उससे पहले कबीर साहेब राजा के दरबार में पहुंचे और उन्हें देख राजा बहुत प्रसन्न हुए और राजा ने कबीर साहेब को प्रणाम करते हुए बैठने के लिए कहा। 

राजा ने निवेदन किया हे प्रभु मेरे इस महल में आप के पधारने पर में सदैव का ऋणी रहूंगा कहिये गुरुदेव कैसे आना हुआ। कबीर साहेब ने कहा कि आपसे मिलने की इच्छा जागृत हुई सो आ गए। राजा ने कहा हे प्रभु निमंत्रण भिजवा दिया होता मैं स्वयं आपके पास आ जाता। राजा ने कहा प्रभु आप आ ही गए हैं तो कृपया मुझे सारनाम प्रदान करने का कष्ट करें। 

तब कबीर साहब ने कहा ठीक है राजन आज मैं तुम्हे सारनाम प्रदान करता हूँ लेकिन उससे पहले मेरी एक शर्त है जिसे तुम्हे पूरा करोगे तो ही तुम्हे सारनाम दूंगा। यह सुनकर राजा बीर सिंह ने कहा प्रभु आज्ञा दें जो भी आदेश देंगे अवशय पूरा होगा। कबीर साहब ने कहा कि काशी नगरी में एक चन्द्रप्रभा नाम की ब्राह्मण युवती रहती है जो विधवा है। और उसने भी मुझसे नाम दीक्षा ले रखी है। वह भी चाहती है उसे भी सारनाम प्राप्त हो जाए। 

कबीर साहेब राजा बीर सिंह बघेल से कहते हैं की राजन उस युवती ने अपने आँगन में कपास उगाकर उस कपास से एक धोती तैयार की है जिसे वह जगन्नाथ को अर्पित करना चाहती है तुम्हे वह धोती उस युवती से लानी है और मुझे देनी है यदि तुम इतना कर दो तो मैं तुम्हे सारनाम दे दूंगा। 

राजा बीर सिंह आज्ञा पाकर वहां से चल दिया और युवती के घर पहुंचा। वहीँ चन्द्रप्रभा राजा बीर सिंह के आने की खबर सुनकर घबरा गई कि काशी नगरी के राजा हमारे घर ऐसा क्या हुआ। 

खैर जैसे ही राजा बीर सिंह ने चन्द्रप्रभा के घर में प्रवेश किया तो जैसे तैसे माँ-बेटी संभल गई और राजा से पुछा राजन हम गरीब ब्राह्मण के घर कैसे आना हुआ क्या हमसे कोई गलती हुई है। यदि हुई है तो हमे क्षमा करें। 

राजा बीर सिंह उनकी बाते सुनकर जरा सा मुस्कुराये और कहने लगे नहीं बहन आपसे किसी भी प्रकार की कोई गलती नहीं हुई है। मुझे तो हमारे गुरुदेव कबीर साहेब ने आपके पास भेजा है और कहा है। आपने अपने आँगन में कपास उगाकर उससे जो धोती बनाई है उसे मुझे दे दें ताकि मैं कबीर साहेब को भेंट कर सकूं और सारनाम प्राप्त कर सकूं। उन्होंने मेरे समक्ष यह शर्त रखी है यदि आप चाहो तो यह संभव हो सकता है। चन्द्रप्रभा और उसकी बेटी दोनों हाथ जोड़कर राजा से प्रार्थना करने लगे की हे राजन यह धोती मैंने श्री जगन्नाथ पूरी के बनाई है मुझे यह उन्हें ही भेंट करनी है कृपया ऐसा न करें। हम आपकी मदद करने में असमर्थ हैं। कृपया हमे क्षमा करें।  राजा के बार-बार निवेदन करने पर भी चन्द्रप्रभा ने वह धोती राजा बीर सिंह को नहीं दी जिसकी वजह से राजा को खली हाथ लौटना पड़ा। राजा निराश होकर अपने महल में वापिस आया जहाँ पर कबीर साहेब उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। 

कबीर साहेब ने श्री जगन्नाथ मंदिर में की आकाशवाणी  

कबीर साहेब ने राजा से पुछा कि हे राजन क्या हुआ? आप वह धोती क्यों नहीं लाये राजा ने सारी कहानी कबीर साहेब को बताई। कबीर साहेब कहने लगे की राजन निराश न हो मैं आपको सारनाम जरूर दूंगा कोई बात नहीं यदि आप शर्त पूरी नहीं कर सके। क्या यह संभव की आप अपने दो सैनिक उनके साथ भेज दे? आप केवल मेरा इतना काम कर दे ताकि चन्द्रप्रभा और उसकी पुत्री जगन्नाथ तक सुरक्षित पहुंच सकें। राजन ने कहा ठीक है गुरुदेव। 

राजा ने चन्द्रप्रभा के साथ जाने के लिए दो सैनिको को भेज दिया जिस दिन उन्हें श्री जगन्नाथ पूरी के लिए रवाना होना था। और वे सुरक्षित जगन्नाथ पूरी पहुंची और वहां जाकर स्नान किया और थाली में धोती को सजाकर मंदिर में प्रवेश किया। जैसे ही उन्होंने धोती को श्री जगन्नाथ पूरी मंदिर  में मूर्ति के समक्ष अर्पित किया तभी धोती वहां से उठकर मंदिर के बाहर जमीं पर जा गिरी और आकाशवाणी हुई कि तुम इस धोती को यहाँ क्यों लाई हो मुर्ख स्त्री जबकि मैंने ये धोती तुमसे राजा बीर सिंह के हाथों काशी में ही मंगवाई थी। यह सुनकर चन्द्रप्रभा और उसकी पुत्री क्षमा की याचना करने लगीं कर और कहने लगी की हे प्रभु हमसे बहुत ही बड़ी भूल हो गई है। हम यह तो भूल ही गई थी कि आप कबीर साहेब जो एक जुलाहे के रूप में काशी के जगन्नाथ हो। कृपया हमे क्षमा करें और यह कहकर दोनों ही फुट-फुट कर रोने लगी। यह आकाशवाणी और चमत्कार वहां पर मौजूद सभी ने देखा जिनमे दोनों सैनिक भी शामिल थे। 

राजा बीर सिंह बघेल और चन्द्रप्रभा के द्वारा कबीर साहेब को भगवान के रूप में स्वीकार करना  

चन्द्रप्रभा रोते हुए वापिस  काशी आकर राजा के महल में गई जहाँ पर कबीर साहेब के साथ राजा भी बैठे हुए थे। चन्द्रप्रभा कबीर साहेब के चरणों में गिरकर क्षमा की भीख मांगने लगी और कहने लगी की हे प्रभु मुझसे अभागिनी से भूल हो गई कृपया मुझे क्षमा करें। राजा भी यह देख कर चकित हो गया जिसे वह केवल सिद्ध पुरुष मान रहे थे वह साक्षात्कार भगवान कबीर साहेब थे। 

राजा बीर सिंह बघेल भी उनके चरणों में गिरकर  सारनाम की प्रार्थना करने लगे। 

उसी समय कबीर साहेब ने राजा और चन्द्रप्रभा से कहा की पहले आप शुद्ध होकर आये फिर ही आपको सारनाम की प्राप्ति होगी। फिर कबीर साहेब ने उनका नाम शुद्ध करके उन्हें सारनाम प्रदान किया और उनका कल्याण किया। 

इस कथा से यह सिद्ध हो चूका है कि कोई भी संत नाम दीक्षा को तीन चरणों में प्रदान नहीं करता। केवल कबीर साहेब यानि पूर्ण परमेश्वर ही हैं जो नाम दीक्षा की प्रकिर्या को तीन चरणों में पूरा करते है। कबीर साहेब के बाद केवल संत रामपाल दास ही एक मात्रा संत हैं जो तीन चरणों में नाम दीक्षा देते हैं। वो कहते हैं न कि यदि आप बुद्धिमान हैं तो आपको इशारा ही काफी है। और यहाँ तो साक्षात् प्रमाण दिए गए हैं।

Ravinder Das

Ravinder Das

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