पवित्र तीर्थ स्थान व् धाम की स्थापना कैसे हुई

पवित्र तीर्थ स्थान व् धाम की स्थापना कैसे हुई

भारत को धर्म निरपेक्ष राज्य कहा जाता है क्योकि भारत में सभी धर्मों को एक समान माना जाता है। भारत में अलग -अलग धर्मों के विभिन्न तीर्थ स्थान व् धाम हैं। जिनकी शायद आपको जानकारी भी नहीं होगी की इनका निर्माण किस प्रकार और क्यों हुआ हुआ है?

आज मैं आपको तीर्थ स्थान व् धाम के बारे में जानकारी प्रदान करता हूँ ताकि आपको पता चल सके कि इन तीर्थ स्थानों और धाम का हमारे जीवन में क्या और कितना महत्व है?

तीर्थ व् धाम के निर्माण की जानकारी 

एक बार एक साधु थे जो तपस्या के उद्देश्य से गाँव से दूर एक शांत जगह पर तालाब के किनारे पर अपना आसन बनाकर साधना या तपस्या करने लगे और वहां उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन किया और जब उस साधु की तपस्या समाप्त हो गई तो वह अपने लोग को प्रस्थान गए।

लेकिन लोगो ने साधु के साधना या तपस्या के स्थल को तीर्थ का नाम दे दिया ताकि इस बात का प्रमाण रखा जा सके कि किसी समय में यहाँ पर कोई साधु आये थे और उन्होंने यहाँ पर साधना के दौरान अपनी शक्ति का भी प्रदर्शन किया जिससे काफी लोगो का भला हुआ। 

ऐसा इसलिए किया गया ताकि उस स्थान के माध्यम धार्मिक लोग अपनी कमाई का साधन बना सकें और भोली-भाली आत्माएं जो ईश्वर में विश्वास करती हैं उन्हें इस जाल में फंसा सकें।

लेकिन अब उस स्थान पर वह शक्ति नहीं है जो उस साधु ने प्रदर्शित की थी क्योकि साधु तो वहां से चले गए और वह शक्ति भी। 

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इसका तर्क मैं आपको एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करना चाहूंगा

जिस प्रकार हम हमाम दस्ता का उपयोग किसी वस्तु को कूटने के लिए करते हैं ठीक उसी प्रकार तीर्थ स्थान और धाम माना जा सकता है। हम हमाम दस्ते का उपयोग किस लिए करते हैं जाहिर सी बात है या तो दवाई पीसने या कोई अन्य सामग्री को कूटने के लिए करते हैं।

ठीक उसी प्रकार एक सन्यासी या साधु भी अपनी साधना के लिए ही किसी स्थान का उपयोग करते हैं जो एकांत और शांत हो ताकि वे साधना से विचलित न हो। मान लीजिये कि आप अपने घर में हमाम दस्ते का उपयोग करके कुछ सामग्री कूटते है और कूटने के बाद उसे साफ़ करके अपने एक कमरे रख देते हैं और उस हमाम दस्ते से कुछ दिन सुगंध आती रहती है जिससे पता चलता है कि अपने उस हमाम दस्ते में किसी सामग्री को कूटा है।

लेकिन कुछ दिनों के बाद उससे सुगंध आनी बंद हो जाती है क्योकि उसमे से सुगंध आना एकदम से बंद नहीं हुई थी बल्कि पहले से ही सुगंध कम होती आ रही थी और कुछ दिनों में समाप्त हो गई। ऐसा इस लिए संभव हुआ

क्योकि सामग्री को अपने एक ही दिन कूटा था और सामग्री को तो अपने उसमे से निकल लिया जिससे सुगंध सामग्री के साथ चली गई और हमाम दस्ते में तो केवल सुगंध का कुछ अंश बचा था जो कुछ दिनों तक हमे महसूस हुआ।

वैसे ही जहाँ पर साधु ने साधना की थी वो तो अपनी शक्ति को अपने साथ ले गए वहां तो केवल वह स्थान ही बचा है जहाँ साधु साधना किया करते थे। 

अब यदि आप सोच रहे हैं कि आपके हमाम दस्ते में सुगंध अभी बाकी है तो आपकी यह सोच व्यर्थ है ठीक उसी प्रकार जिस स्थान पर साधु ने साधना या तपस्या करते समय उन्होंने जो शक्ति का प्रदर्शन किया था वह अब उस स्थान पर नहीं है। यदि इस समय आप उस स्थान पर शक्ति का लाभ पाने के लिए तीर्थ धाम या स्थान मान रहे हैं तो आपसे बड़ा मुर्ख कोई नहीं है। क्योकि आप उस शक्ति का लाभ पाने की सोच रहे हैं जो इस समय वहां पर है ही नहीं। 

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श्री अमरनाथ धाम की स्थापना 

एक बार देवी पार्वती ने शिव (तमोगुण) यानी महादेव से आग्रह करते हुए कहती हैं कि स्वामी आप मुझे यह बताएं की ऐसा क्या है की आप अजर-अमर है और मुझे आपको प्राप्त करने के लिए हर बार नया जन्म और नए स्वरुप में आकर बरसों तक तप या साधना करनी पड़ती है।

हे भोलेनाथ यदि मुझे जब आप ही को पाना है तो मेरी इतनी कठिन परीक्षा और तपस्या को ली जाती है और आप के गले में में नरमुंड माला और आप अमर है इसका क्या रहस्य है? 

देवी पार्वती का महादेव से अमरकथा सुनने का हठ

देवी पार्वती के बात को सुनकर महादेव हर बार अनुचित कहकर टाल देते थे और इस बार उन्हें अपना ये गहरा रहस्य देवी पार्वती के समक्ष बताना ही पड़ा कि वे अजर-अमर क्यों हैं और पार्वती को उन्हें प्राप्त करने के लिए हर बार जन्म और नए स्वरुप में कठिन परीक्षा क्यों देनी पड़ती है। 

महादेव ने पार्वती से कहा कि ये रहस्य ऐसे स्थान पर नहीं बताये जा सकते क्योकि दीवारों के भी कान होते हैं। इसके लिए हमे किसी एकांत स्थान पर जाना होगा जहाँ पर किसी का आवागमन ना हो यानि कोई परिंदा भी वहां ना आता जाता हो।

यह कहकर देवी पार्वती और महादेव एक एकांत स्थान को खोजने के लिए चले तो उन्हें हिमालय पर्वत पर एक स्थान दिखाई दिया जहाँ उन्होंने एक गुफा में देवी पार्वती को अपनी अमर-अजर होने की कहानी बताई और उन्हें यह भी बताया की उन्हें भी ऐसी कठिन परीक्षा क्यों देनी पड़ती है। 

जब देवी पार्वती ने महादेव से यह कहानी सुनी तो वे इतनी मुक्त हो चुकी थी कि उनकी मृत्यु तब तक नहीं होगी जब तक श्री शिव की मृत्यु नहीं होगी। 

सात ब्रह्मा की मृत्यु पर एक विष्णु की मृत्यु और सात विष्णु की मृत्यु पर एक शिव यानि तमोगुण की मृत्यु होती है यानि तभी माता पार्वती भी मृत्यु को प्राप्त होंगी। लेकिन फिर भी उन्हें पूर्ण मुक्ति प्राप्त नहीं हुई। वे अब भी जन्म-मृत्यु के चक्र में हैं। 

शुरुआत में अमरनाथ धाम पर कोई नहीं जाता था लेकिन कुछ धार्मिक लोगों ने वहां पर अधिकारी रखे और जो वहां पर उपदेश और मंत्र का जाप करने लगे जिन्हे देख लाखों श्रद्धालु हर साल अमरनाथ धाम की यात्रा पर जाते हैं। ऐसा इस लिए किया गया ताकि यहाँ की याद को सुरक्षित रखा जा सके।

यदि कहा जाए तो अब वहां पर ऐसा कुछ नहीं है केवल वहां पर कमाई का साधन है जो धार्मिक लोग है वो केवल अपनी जेब ही भर रहे है तीर्थ और धाम पर जाने से इच्छा है आप साधना में अपना समय व्यक्त करें जो आपको आपके गुरु यानि अध्यात्म संतो से मिला है वही सच्चा ज्ञान और वही आपके लिए तीर्थ है। यही है जो आपको पूर्ण मुक्ति दिला सकता है। 

अमरनाथ की यात्रा तो उस समान है जिस प्रकार संत रामपाल जी महाराज जगह-जगह पर सत्संग करते हैं और जिस स्थान पर सत्संग करते हैं वहां खाने का प्रबंध भी होता है ताकि उनके अनुयायी सत्संग सुनने के बाद भोजन का आनंद ले सके और हाँ ऐसा है भी जो सत्संग के दौरान वहां पर उपस्थित होता है।

वह भोजन ग्रहण कर लेता है और जो सत्संग होने के पश्चात् एक दो दिन के बाद आता है कि यहाँ तो संत रामपाल का सत्संग था और वहां खाना बना था तो क्या उनको वह भोजन मिलेगा कदाचित नहीं।

उनको तो सिर्फ भोजन तैयार करने के लिए बनाई गई भट्टी और चूल्हे ही मिलेंगे और कुछ नहीं। वैसे ही तीर्थ और धाम की कहानी है अब वहां पर कुछ नहीं है केवल याद को सुरक्षित रखें के मात्र स्थान है जहाँ पर बाद में मंदिर बनवाये गए हैं। 

यदि आपको ज्ञात हो तो अमरनाथ पर तीन से चार बार बर्फानी तूफान आया है जिससे हज़ारों श्रद्धालुओं की मृत्यु हो चुकी है यदि वहां पर दर्शन करने ले लाभ होता तो ऐसा कतई भी नहीं होता। आपको सदैव सचेत रहना चाहिए क्योकि किसी भी तीर्थ और धाम पर जाने से हमारा कल्याण नहीं होता बल्कि वहां रहने वाले आचार्य और महंत का होता है जो आपको पूर्णतया भर्मित रखते हैं। 

वैष्णो देवी मंदिर की स्थापना और देवी पार्वती का यज्ञ कुंड में भस्म होना 

एक बार राजा दक्ष जो की श्री ब्रह्मा के मानस पुत्र थे उन्होंने अपने राज्य की राजधानी कनखल (गंगाद्वार) में महायज्ञ करवाया। इस महायज्ञ में राजा दक्ष ने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन अपनी पुत्री देवी पार्वती (सती) और अपने जमाई (जामाता) भगवान् शिव को आमंत्रित नहीं किया।

लेकिन देवी सती शिव जी के बार बार समझाने पर राजा दक्ष यानि अपने पिता के महायज्ञ में आ गई। और वहां पर देवी सती को और भगवान् शिव के अनादर का सामना करना पड़ा। वहां पर दोनों के बारे में कटु शब्द कहे गए।

देवी सती अपना और भगवान् शिव का अपमान सहन न कर पाई कर उन्होंने वहीँ पर यज्ञ के अग्निकुंड में अपने आप को भस्म कर लिया। जिसकी सुचना सुनकर भगवान् शिव ने अपने आप को वीरभद्र के रूप में ढाल लिया और यज्ञ को भी खंडित कर दिया और साथ ही उन ऋषियों, देवताओं को दण्डित किया जो देवी सती और भगवान् शिव का उपहास कर रहे थे। और इस घटना के मुख्यारोपी राजा दक्ष का सिर भगवान् शिव ने धड़ से अलग कर दिया। 

माता वैष्णो देवी के मंदिर निर्माण

देवी पार्वती जो उस यज्ञ के हवनकुंड में सती हुई थी उनकी हड्डियों यानि कंकाल को अपने कंधे पर उठाकर महेशवर भगवान् शिव सालो तक भटकते रहे। यह देख भगवान् विष्णु ने देवी सती के कंकाल को अपने सुदर्शन चक्र से अस्त-व्यस्त कर दिया।

जहाँ पर आँखे गिरी वहां नैना देवी और जहाँ पर जिह्वा गिरी वहां ज्वाला जी कर जहाँ पर धड़ गिरा वहां पर एक मंदिर बनाया गया और उस मंदिर में एक स्त्री की मूर्ति स्थापित की गई जिसे बाद में माँ वैष्णो देवी का नाम दिया गया। 

मंदिर के निर्माण की शुरुआत में धार्मिक लोगो के द्वारा वेतन पर एक व्यक्ति की नियुक्ति की गई ताकि श्रद्धालुओं को वहां के बारे में कहानी या कथा सुनाई जा सके। अब वहां के वशंज यानि की महंत लोगो ने दान लेना शुरू कर दिया और कहने लगे की एक व्यापारी का व्यापर बिलकुल ठप हो चूका था और उसने माता के मंदिर में 100 रुपए चढ़ाये तो उसका व्यापार तेजी से चलने लगा।

इसी तरह एक धनी दम्पति को संतान नहीं थी उन्होंने कुछ रूपये और सोने का हार एक नारियल चढ़ाया तो उनको पुत्र प्राप्त हुआ। ऐसी ऐसी बाते सुनकर उन भोली भली आत्माएं जो ईश्वर में विश्वास रखती हैं उनको ठगना शुरू कर दिया यानि उनको अपने फायदे के लिए भ्रमित करना शुरू कर दिया।

हमें कभी भी दन्त कथाओं पर विश्वास करके हमारे पवित्र वेदों और ग्रंथो को नहीं भूलना चाहिए। इन दन्त कथाओं पर आधारित साधना से न तो किसी का कोई कार्य सिद्ध हुआ, न किसी को सुख और न ही मुक्ति प्राप्त हुई है। 

यदि आप सुख, और मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने वेदों और ग्रंथो पर आधारित साधना करके ही प्राप्त कर सकते है। जो केवल अध्यात्म गुरु द्वारा दिए गए मार्ग पर चलने से ही संभव है। केवल वही हैं जो आपको मुक्ति का का सच्चा मार्ग बता सकते हैं। 

Ravinder Das

Ravinder Das

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