ऋषि दुर्वासा का प्रदर्शन, देवराज इंद्र को माला भेंट की 

ऋषि दुर्वासा का प्रदर्शन, देवराज इंद्र को माला भेंट की  

एक दुर्वासा नामक ऋषि थे जो की काल ब्रह्म के पुजारी थे। ऋषि दुर्वासा त्रिकालदर्शी और सिद्धियुक्त ऋषि थे। ये वही ऋषि दुर्वासा हैं जो अपनी साधना के दौरान केवल घास (दूर्वा) के तिनके के सहारे अपना जीवन यापन करते थे अर्थात निराहार रहते थे मात्रा घास का एक तिनका ही इन्हे तृप्त करने के लिए काफी होता था।

घास के तिनके को खाने के कारण ही इनका नाम दुर्वासा ऋषि पड़ा था। गोपियों के द्वारा भोजन खिलाने  के बाद भी ये निराहार थे क्योंकि इन्होने भोजन अपनी रूचि अनुसार  ग्रहण नहीं किया अपितु गोपियों की इच्छा थी इसलिए  इन्हे निराहार ही माना जाता है। 

ऋषि दुर्वासा काल ब्रह्म यानि  सदाशिव के साधक यानि पुजारी थे। इन्होने आजीवन काल ब्रह्म की ही साधना की। 

ऋषि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को माला भेंट की। 

एक दिन ऋषि दुर्वासा जंगल में कहीं जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें एक सुंदर स्त्री दिखाई दी जो देखने में एक अप्सरा के समान प्रतीत हो रही थी। ऋषि दुर्वासा जैसे ही उस स्त्री के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उस स्त्री ने गले में एक सुन्दर मोतियों की माला पहनी हुई है और वो ऋषि दुर्वासा को भा गई।

ऋषि दुर्वासा ने उस स्त्री से कहा देवी मैं ऋषि दुर्वासा हूँ और जो माला अपने गले में पहन रखी है वह मुझे बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रही है। मैं चाहता हूँ की यह माला आप मुझे दे दें। उस स्त्री को पता था की ऋषि दुर्वासा जल्दी ही गुस्से में आ जाते हैं और श्राप दे देते हैं।

यह सोचते हुए उस स्त्री ने वह माला अपने गले से उतारकर सम्मानपूर्वक ऋषि दुर्वासा को सौंप दी और प्रणाम करते हुए वहां से चली गई। ऋषि दुर्वासा उस माला को लेकर बहुत प्रसन्न हुए और उस स्त्री को आशीर्वाद दिया और माला को अपने बालों के किये हुए जुड़े में डाल लिया और आगे बढ़ गए।

जैसे ही ऋषि दुर्वासा आगे की ओर कुछ दूर ही चले तो उन्होंने देखा की देवराज इन्द्र अपनी विशाल सेना और स्वर्गलोक की अप्सरा और समस्त देवगणों के साथ हाथी पर बैठे हुए आ रहे हैं तो ऋषि दुर्वासा जी देवराज इंद्र के पास गए और अपने जुड़े से वह माला निकाल कर इंद्र की ओर फेंक दी। देवराज इंद्र ने वह माला लेकर अपने हाथी के सिर पर रख दी। देवराज इंद्र जिस हाथी पर सवार थे।

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हाथी के द्वारा माल को जमीन पर फेंकना

उस हाथी ने अपने सिर से वह माला उठा कर निचे धरती पर फेंक दी। हाथी भी अपनी उस आदत से मजबूर था क्योकि देवराज इंद्र को जब भी भेंट के रूप में कोई माला दी जाती थी तो वे एक बार उस माला को स्वीकार करके अपने हाथी यानि जिस हाथी पर वे सवार होते थे उसके सिर पर रख देते थे और वह हाथी उस माल को निचे जमीन पर फेंक देता था। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। 

ऋषि दुर्वासा अपने आप को अपमानित महसूस करते हुए इंद्र को श्राप 

ऋषि दुर्वासा ने देखा की राजा इंद्र ने उनकी दी हुई भेंट यानि माला को निचे धरती पर फेंक दिया है तो वे क्रोधित हो उठे और कहने लगे देवराज इंद्र तुमने मेरे द्वारा दी गई भें रूपी माला को स्वीकार न करके उसे धरती पर फेंका है जिसकी वजह से मेरा अनादर हुआ है।  मैं यह अनादर कदापि सहन नहीं कर सकता। इसके लिए मैं तुम्हे दंड दूंगा।

यह कहते हुए ऋषि दुर्वासा ने कहा कि देवराज इंद्र तुमने मेरा जो अनादर किया है उसके कारण मैं ऋषि दुर्वासा तुम्हे श्राप देता हूँ की तुम्हारा राज्य यानि इंद्रलोक नष्ट जो जाये। यह सुनकर देवराज इंद्र श्राप के भय से कंपित हो उठे अर्थात कांपने  लगे।

राजा इंद्र तुरंत हाथी से निचे उतरे और ऋषि दुर्वासा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगते हुए कहने लगे हे ऋषिवर! आपने जो अमूल्य भेंट मुझे उपहार में दी थी वह मैंने आदर सहित स्वीकार की थी जिसे मैंने अपने हाथी के सिर पर बड़े ही आदर के साथ रखा था लेकिन उस प्राणी यानि हाथी ने औपचारिकतावश वह उपहार रूपी माला निचे फेंक दी। यदि मुझे थोड़ी सी भी शंका होती की हाथी इस माला को निचे फेंक देगा तो मैं कदापि भी ऐसा न करता।

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देवराज इंद्र की ऋषि दुर्वासा क्षमा याचना और ऋषि दुर्वासा द्वारा क्षमा याचना को अस्वीकार करना 

हे ऋषिवर! कृपा मुझे क्षमा करें। देवराज इंद्र के बार-बार क्षमा याचना करने पर भी ऋषि दुर्वासा नहीं माने और कहने लगे की राजा इंद्र मैंने एक बार जो कह दिया उसे वापिस नहीं लिया जा सकता। अतः तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है। कुछ समय बाद देवराज इंद्र का सर्वनाश हो गया और इंद्रलोक यानि स्वर्ग भी तहस-नहस हो गया।

Ravinder Das

Ravinder Das

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