सेउ और सम्मन की कथा |Seu Samman ki Story

सेउ और सम्मन की कथा |Seu Samman ki Story

एक बार की बात है सम्मन नाम का मनियार था। वह और उसकी पत्नी नेकी औरतों को चूड़िया पहनने का काम करते थे। वह कबीर साहेब का बहुत बड़ा सेवक था। वह बहुत ही गरीब था और उसके परिवार में केवल तीन ही सदस्य थे। एक सम्मन, उसकी पत्नी नेकी और उसका पुत्र सेउ। तीनो सदस्य ख़ुशी-ख़ुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे।

कबीर साहेब अपने दो शिष्यों को लेकर अपने परम भक्त सम्मन के घर पर अचानक से दस्तक दी। जैसे ही सम्मन ने अपने परम गुरुदेव  को देखा तो वह और  हैरान रह गया की उनके गुरुदेव भगवान् कबीर उनके आँगन में खड़े है ये देख कर उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और कबीर साहेब के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए और कहने लगे कि हे भगवान् आप और इस गरीब के घर पर मुझे यकीन नहीं हो रहा है लगता है कि मैं कोई स्वपन देख रहा हूँ।

सम्मन ने अपनी पत्नी से पूछा की नेकी क्या मैं स्वपन देखा रहा हूँ या ये सत्य है तब नेकी ने कहा क्या आप गुरुदेव को यहाँ बाहर ही खड़े रखेंगे या अंदर घर में भी लेकर चलेंगे और उनकी सेवा पानी नहीं करनी क्या ?

सम्मन द्वारा कबीर साहेब को भोजन करवाना

तब सम्मन ने भगवान कबीर साहेब का अपने घर में स्वागत किया और उन्हें अपने घर में एक स्थान पर बैठाया और कहने लगे की भगवान आप क्या और कब भोजन ग्रहण करेंगे, कृपया हमे बताये। कबीर साहेब कहने लगे कि भक्त हमें भूख लगी है, कुछ भोजन खिलाओ।

सम्मन अपने गुरुदेव यानि कबीर साहेब का आदेश पाकर अपने घर के दूसरे कमरे में गया और पत्नी नेकी को कहने लगा की भागयवान गुरुदेव जी को भूख लगी है उनके खाने हेतु कुछ सामग्री तैयार कर दो और हाँ अच्छी और स्वादिष्ट बनाना ताकि कुछ भी कमी ना रहे और गुरु जी व भगत भर पेट भोजन ग्रहण कर सके। 

सम्मन की पत्नी नेकी जबाब में कहती हैं कि मैं क्या सामग्री तैयार करूं, घर में खाना बनाने के लिए कुछ भी नहीं है कैसे तैयार करूं? चूँकि सम्मन के परिवार की हालत ऐसी थी कि उनके घर पर एक समय खाना बनता था तो दूसरे समय खाना बनने की उम्मीद नहीं होती थी अर्थात कभी खाना बनता था कभी नहीं। 

सम्मन द्वारा भोजन की व्यवस्था करना

सम्मन ने कहा की भाग्यवान किसी पडोसी उधार से मांग लाती तब भी गुरूजी के लिए खाना बन सकता है। हम बाद में उनका उधार चूका देंगे लेकिन जबाब में नेकी ने कहा की मैं सब जगह से उधार के लिए जा चुकी हूँ लेकिन किसी ने भी मुझे उधार नहीं दिया।

यहाँ तक की दुकानदार से माँगा तो उसने भी इंकार कर दिया और कहा की तुम कह रहे हो की तुम्हारे गुरूजी भगवान् कबीर साहेब आये हैं और उनके लिए खाना बनाना है यदि वो आपके भगवान् हैं तो तुम लोग उधार क्यों मांग रहे हो? उन्हें तो तुम्हारी स्थिति के बारे में पता होना चाहिए। उन्हें कह के अपने अन्न भंडार को भरवा लो ताकि तुम्हे उधार मांगने की जरूरत ही न पड़े। यदि भगवान् तुम्हारे घर पर आये हैं तो तुम्हारा कल्याण भी तो करेंगे ना। ऐसा कह कह कर मेरा उपहास यानी मजाक बना रहे थे और मुझे चिढ़ा रहे थे।

दुकान वाले के पास सामग्री थी लेकिन फिर भी देने से इंकार कर दिया और हंसने लगा की भगवान् कबीर के लिए भोजन तैयार करना है। यह सुनकर सम्मन बहुत ही चिंतित हो गया और नेकी से कहने लगा कि अब हम गुरुदेव भगवान् कबीर के लिए क्या बनाएंगे वो तो भूखे हैं और पता नहीं कब से नहीं खाया है।

यह कहते कहते उसे एक विचार आया और नेकी से कहने लगा की नेकी तुम मुझे अपना चीर दे दो इसे मैं गिरवी रख आता हूँ और लगभग 3 सेर यानी 1 किलो आता तो आ ही जायेगा जो गुरूजी और उनके शिष्यों के लिए काफी रहेगा। नेकी ने कहा नहीं ये चीर तो फटा हुआ है इसका आपको कोई मोल नहीं देगा आप व्यर्थ ही जायेंगे। यह सब सोच कर सम्मन बहुत चिंतित हुआ। इस पर सम्मन ने कहा की मैं कितना अभागा हूँ की मेरे घर पर साक्षात् कबीर परमेशर का आगमन हुआ है और मैं उनकी सेवा भी नहीं कर सकता।

मेरा ये जीवन व्यर्थ है मुझे जीने का कोई हक़ नहीं है। यह बात सम्मन रोते हुए कह रहा था। मैंने जरूर पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा जिसका फल मुझे अब मिल रहा है। यह कहकर वह दूसरे कमरे में जाकर रोने लगा तभी नेकी वहां आई और कहने लगी की ये रोना धोना बंद करो और गुरूजी के पास जाओ और खाने के लिए कुछ इंतज़ाम करो। तुम्हारी ये आवाज़ सुनकर नहीं तो गुरू जी यानि कबीर साहेब जी, ये सोचेंगे की तुम उनके आगमन पर खुश नहीं हो और उनकी सेवा से दूर भाग रहे हो। यह सुनकर सम्मन अपने आंसू  पोंछकर आगे कमरे से बहार निकल आया।

सम्मन द्वारा चोरी करने की योजना बनाना

अब नेकी सम्मन और सेउ को खाने के इंतज़ाम के लिए कहती है आज रात में आप दोनों पिता पुत्र ( सम्मन और सेउ) चोरी करने जाना होगा और 3 सेर आता चोरी कर लाना, जो केवल हमारे गुरुदेव और उनके शिष्यों के लिए पर्याप्त होगा। यह सुनकर पुत्र सेऊ अपनी माता नेकी से सवाल करता है कि माता जी आप हमे चोरी करने के लिए कह रही हैं चोरी करना तो पाप है आप ही ने तो मुझे सिखाया है।

नेकी कहती है बेटा ये चोरी तो हमे करनी ही होगी क्योकि भगवान् कबीर जी हमारे घर पर पधारे हैं और उन्हें भूख लगी है खाने को घर में कुछ नहीं है। ऐसे में हमारा धर्म बनता है कि घर आये संत रूपी भगवान् यानी परमेश्वर कबीर साहेब का हम अनादर नहीं कर सकते, इसलिए हमे उनके लिए चोरी करनी होगी न कि अपने लिए और ये चोरी भी नहीं कहलायगी पुत्र।

अब हम धर्म संकट में फंसे हुए हैं क्या करना उचित है और क्या करना अनुचित? ये मायने नहीं रखता। अब मायने रखता है तो केवल अपने गुरुदेव और उनके शिष्यों को भोजन प्रदान करना। अतः आपको ये सब करना ही होगा। पुत्र ये हमारे गुरूजी हैं जिन्होंने एक गाय के बछड़े को जो मृत यानि मरा पड़ा था उसे पुनर्जीवन दिया था। 

हमारे गुरुदेव यानी कबीर साहब पूर्ण परमात्मा हैं वे ही सर्वश्रेष्ठ हैं। उन्ही की कृपा से मरे हुए लड़के और लड़की वापिस जिन्दा हुये थे। जब सिकंदर लोधी जलन की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे तब इन्ही की कृपा बरसी थी और उनकी ये गंभीर बीमारी भी ठीक हो गयी थी। हमारे गुरुदेव कबीर साहेब के गुरुदेव थे जिन्हे सिकंदर लोधी ने तलवार से दो हिस्सों में काट दिया था उनको भी परमेश्वर कबीर साहब ने ही पुनः जीवन दिया था। 

देखो बेटा इस शहर के लोग जो आज हमारे भगवान् कबीर साहेब का उपहास कर रहे हैं यानी मजाक बना रहे हैं उन्हें शायद इस बात का अंदाजा नहीं है कि हमारे गुरुदेव ही सर्वोच्च हैं। वही हैं जो मानव यानि मनुष्य को पूर्णप्राप्ति  दे सकते हैं। शहर के लोग उपहास कर कर के हंस रहे हैं की अगर तुम्हारे गुरुदेव परमेश्वर यानि भगवान्  हैं तो घर घर क्यों भटक रहे हैं? उनसे कहकर अपने अन्न भंडार को भरवा लो ताकि तुम्हे दर दर की ठोकर न कहानी पड़े।

बेटा ये लोग अज्ञानी हैं इन्हे सत्य और असत्य की कोई कदर नहीं है। ना ही ये लोग जानते हैं कि भगवान् को बिना भोजन करवाए नहीं जाने देना चाहिए। लेकिन आज ऐसा अनर्थ हो सकता है अगर हमने गुरु जी को भोजन नहीं करवाया तो। इसलिए हमें इसे रोकने के लिए ऐसा करना ही होगा। माँ के ये वचन सुनकर सेउ ने कहा आप सत्य कह रही हैं। आप जैसा कहेंगी हम वैसा ही करेंगे।

सम्मन और सेऊ चले चोरी करने

यह बात कहकर सेउ और उसके पिता सम्मन दोनों रात को चोरी करने के लिए चल पड़ते हैं और आधी रात का समय हो चूका होता है। अब वे एक सेठ की दुकान में चोरी करने के लिए दुकान की दिवार में छेद करने की कोशिश करते हैं और कामयाब हो जाते हैं। छेद करने के पश्चात् सम्मन सेउ से कहता है कि बेटा तुम मेरा बाहर इंतज़ार करना और मैं अंदर जा रहा हूँ कोई भी आहट या शोर सुने तो मुझे आराम से सूचित कर देना ताकि तुम यहाँ से भाग सको। जैसे ही मैं तुम्हे 3 सेर यानि आटा दूँ तो तुम उसे लेकर भाग जाना और मैं बाद में आ जाऊंगा।

यह सुनकर सेउ अपने पिता से कहते हैं कि नहीं पिता जी दुकान के अंदर मैं जाऊंगा ताकि यदि मैं चोरी करते हुए पकड़ा भी जाऊंगा तो मुझे बच्चा समझ कर छोड़ा जा सकता है अगर आप पकड़े गए तो बहुत कुछ हो सकता है। दोनों पिता और पुत्र कुछ देर तक बहस करते रहे कि कौन अंदर जायेगा। फिर दोनों में फैसला हुआ कि ठीक है सेउ ही अंदर जायेगा और 3 सेर आटा लेकर आएगा। 

सेऊ का चोरी करते हुये पकड़े जाना

सेउ छेद में से दुकान के अंदर घुसा और उसके पिता सम्मन ने कहा की बेटा याद रहे 3 सेर ही लाना है इससे ज्यादा नहीं।  सेउ ने कहा ठीक है पिता जी। सेउ ने 3 सेर आटा अपने चीर यानी कपड़े में बांध लिया और चलने लगा तो उसका पैर एक तराजू से टकरा गया, जिससे सेठ की आँख खुल गयी और सेठ ने सेउ को पकड़ लिया।

जब तक सेठ सेउ को सही से दबोच पता तब तक सेउ ने आटा बंधी पोटली को अपने पिता की ओर फेंक दिया, जो छेद से होती हुई उसे पिता सम्मन के पास पहुंच गयी और कहा की पिता जी आप आटा लेकर घर पहुंचिए और संतो को खिलाइये, मैं भी आ जाऊंगा। तब सेठ ने सेउ को एक स्तम्भ से बांध दिया। 

सम्मन आटा लेकर घर पहुंचा और नेकी ने देखा की सम्मन अकेला आया है और सेउ उनके साथ नहीं है। यह देख नेकी ने पूछा कि सेउ कहाँ है? तब सैममन ने सारा वृतांत सुनाया की सेठ ने सेऊ को पकड़ लिया है और एक स्तम्भ से बाँध रखा है। नेकी ने कहा की आप अभी की अभी वापिस जाओ और मुझे सेउ की गर्दन काट लाओ। यह सुनकर सम्मन की आंखे खुली की खुली रह गई और कुछ देर बाद बोले कि तुम पागल हो गई हो मुझे अपने पुत्र जो इकलौता है उसकी हत्या करने के लिए कह रही हो।

तब नेकी कहती है कि हाँ जब सुबह सेठ सेउ के साथ हमारे घर पर आएंगे और कहेंगे की तुम चोर हो और चोरी करते हो तो यह सुनकर गुरुदेव हमारे बारे में क्या सोचेंगे और हम उन्हें क्या जबाब देंगे। यह शहर के लोग वैसे ही हमारे खिलाफ है और शायद ये गुरु जी पर यह आरोप लगा सकते हैं कि इनके गुरु जी ही चोरी करवाते होंगे और गुरु जी को भी जेल मे डलवा सकते है।

यह हमारे लिए धर्मसंकट की घड़ी है। हमें इससे बचने के लिए ऐसा करना ही होगा। नेकी के बार-बार कहने पर सम्मन एक छुरी यानि खंजर अपने हाथ में लेकर दुकान की और चल दिया कर वहां जाकर सेउ से कहने लगा की पुत्र सेउ क्या तुम अपनी गर्दन को इस छेद में से बाहर निकल सकते हो मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी थी।

सम्मन द्वारा अपने एकलौते पुत्र की गर्दन काटना

सेउ ने सेठ जी से कहा की कृपया आप मेरी रस्सी को थोड़ा सा ढीला कर दीजिये ताकि मैं अपने पिता जी से दो बाट कर सकु। कल तो आप मुझे राजा के सामने पेस कर दोगे फिर मुझे पता नहीं क्या सजा मिलेगी तो फिर पता नहीं मैं अपने पिता से मिल भी पाऊँगा या नहीं । सेउ के आग्रह पर सेठ जी ने सेउ की रस्सी की ढीला कर दिया ताकि वह छेद में से गर्दन बाहर निकाल सके और सेउ ने अपने को ढीला पाकर अपनी गर्दन को छेद के बाहर निकला और कहा कहिये पिताजी।

एकलौते पुत्र का पिता होने के नाते सम्मन के हाथ से खंजजर नही चला और उसके अपने पीछे छुपा लिया। उधर सेऊ के मन भी प्रेरणा हुई कि पिता जी अगर मेरी गर्दन काट ले जाए तो अच्छा है ताकि ये चोरी कि घटना किसी को न पता चल सके नहीं तो गुरु जी के उपर मुसीबत आ जाएगी।

सेऊ ने सम्मन से कहा अगर मैं आपका बेटा हूँ तो आप एक काम करे मेरी गर्दन काट ले और अगर आपने ऐसा नहीं किया तो मैं आपकी संतान नहीं। यह सुनकर सम्मन में एक दम से जोश आया और उसने खंजर से सेउ की गर्दन पर वार कर दिया और सेउ की गर्दन धड़ से अलग हो गई। जिसे लेकर वह अपने साथ अपने घर चला गया और अपनी पत्नी नेकी को दे दी। 

नेकी उस गर्दन को देख कर रोई नही और फिर कहा की आप दोबारा जाइये और सेउ के धड़ को भी ले आइये, क्योंकि सेठ अब उठ धड़ को अपनी दुकान मे नही रखेगा और कहीं बाहर फेंक कर आएगा। आप उसके निशान देखते जाना और वहाँ से धड़ उठा लाना।  

सम्मन दोबारा दुकान की ओर गया और देखा की सेठ ने हत्या के डर से सेउ के धड़ को किसी सुनसान जगह पर फेंक दिया और छेद जो उन्होंने चोरी के लिए किया था वह भी बंद कर दिया है। अब सम्मन उस  निशान पीछे पीछे चल दिया जिस तरफ सेठ लाश को घसीटते हुए लेकर गया था। अब सम्मन लाश के पास पहुंच चूका था और अपने बेटे सेउ के धड़ को अपने साथ घर ले गया। 

घर पहुंचने के उपरांत दोनों ने सेउ के धड़ को अलमारी में रख दिए और सिर को अलमारी के ऊपर। अब तक सुबह हो चुकी थी नेकी ने संत (भगवान कबीर) और उनके शिष्यों के लिए भोजन तीन थालियों में लगा दिया। भोजन लगाने के बाद कबीर साहेब ने सम्मन और उसकी पत्नी नेकी से कहा कि इस खाने को तीन नहीं छः जगह डालो, सभी आज एक साथ ही भोजन करेंगे।

कबीर साहेब द्वारा म्र्त सेऊ को जीवित करना

कबीर साहेब के आदेश के सामने नेकी और सम्मन कुछ नही कर सकते थे और उन्होंने भोजन को छः जगह परोस दिया। तब कबीर साहेब (भगवान् कविर्देव) जी ने सेउ को आवाज लगाई और कहा कि पुत्र सेउ आओ भोजन ग्रहण करो। परमेश्वर की आवाज सुनकर सेउ वहां उपस्थित हो गया और भोजन ग्रहण करने लगा।

यह देख नेकी और उसके पति सम्मन देखने के लिए कमरे में गए और वहां उन्होंने पाया की ना तो सेउ की गर्दन पर की निशान था और न ही कमरे में धड़ और गर्दन सिर्फ खून के कुछ छींटे थे जो दिखने मात्र थे ताकि उन्हें विश्वास दिलाया जा सके। तब कबीर साहेब ने कहा कि सिर चोरों का कलम किया जाता है संतो का नहीं। संत तो हमेशा ही क्षमा के पात्र होते हैं। यह बात कबीर साहेब कहते हैं की –

आओ सेऊ जीम लो, ये प्रशाद प्रेम ,शीश काटत हैं चोरों के, साधो के नित क्षेम

कबीर साहेब

इसके बाद कबीर साहेब ने सम्मन को बहुत धन दिया और उसी जन्म मे सम्मन को उसी शहर का सबसे धनवान सेठ बना दिया। अब नेकी, सेऊ और सम्मन का पूरा परिवार अपना खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगे थे। और उनका जीवन सफल हुआ। उन्होंने कबीर साहेब जी से तीनो नाम पाकर अपने आप को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर लिया। 

कबीर साहेब जी (कविरग्नि) जी के बहुत से ऐसे दिव्य कार्य हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि वे स्वयं, पूर्ण परमात्मा हैं। सामवेद में सांख्य सं॰ 822, यह वर्णित है कि कविर्देव अपने सच्चे भगत की आयु बढ़ते हैं। वे हमेशा ही अपने सच्चे भक्त का साथ देते हैं। अतः उनकी भक्ति से ही मुक्ति संभव है। 

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