श्री ब्रह्मा जी के द्वारा अपनी माँ देवी दुर्गा से अपने पिता (काल निरंजन) के दर्शन करने की इच्छा

श्री ब्रह्मा जी के द्वारा अपनी माँ देवी दुर्गा से अपने पिता (काल निरंजन) के दर्शन करने  की इच्छा

एक दिन ब्रह्मा ने कहा की हे माते! कृपया मुझे ये बताएं कि मेरे पिता जी कौन है? तब माँ दुर्गा यानि अष्टांगी जी ने कहा, हे ब्रह्मा! तुम्हारे पिता काल निरंजन हैं? ब्रह्मा जी कहते हैं कि माँ मैं उनके दर्शन करने को व्याकुल हुआ जा रहा हूँ कृपया मुझे बताने का कष्ट करें वो कहाँ मिलेंगे? देवी अष्टांगी यानि दुर्गा ने कहा की तुम उनके दर्शन नहीं कर सकते और ना ही मैं तुम्हे उनके बारे में ज्यादा जानकारी दे सकती हूँ।

श्री ब्रह्मा जी की काल निरंजन के दर्शन करने हेतु दृढ प्रतिज्ञा 

ब्रह्मा थोड़ा सा गुस्से में कहने लगे, मुझे अपने पिता के दर्शन करने से कोई नहीं रोक सकता। अब मैंने ठान ली है कि मैं अपने पिता जी के दर्शन करके ही वापिस लौटूंगा। माता दुर्गा ने कहा कि ब्रह्मा तुम वैसे ही जिद कर रहे हो तुम्हारा यह हठ कभी भी पूरा नहीं हो सकता। क्योंकि काल निरंजन कभी भी किसी को दर्शन नहीं देते। अतः तुम्हारा प्रयास व्यर्थ ही जायेगा।

ब्रह्मा जी की अपने पिताजी के दर्शन की अभिलाषा और भी उत्तेजित हो गई और अपनी माता यानि दुर्गा से वचन करते हुए कहने लगे कि माते! मैं जब तक अपने पिताजी यानि काल निरंजन के दर्शन नहीं कर लेते तब तक यहाँ वापिस नहीं आऊंगा अर्थात तब तक आपको अपना मुख नहीं दिखाऊंगा। और  चले गए। श्री ब्रह्मा जी उत्तर दिशा में जहाँ पर अधिक अँधेरा था वहां पर जाकर तप यानि ध्यान लगाकर बैठ गए और काल निरंजन का आह्वान करना शुरू कर दिया ताकि वे उनके दर्शन कर सकें। लेकिन काल निरंजन ने दर्शन नहीं दिए। 

श्री ब्रह्मा के बारे में काल निरंजन की देवी दुर्गा से बातचीत

काल निरंजन ने ध्यान लगाकर देवी दुर्गा से पुछा ब्रह्मा जी कहाँ हैं सृष्टि बनाने का काम अधूरा पड़ा है तब देवी दुर्गा कहती है कि आपके ज्येष्ठ पुत्र ब्रह्मा ने हठ किया है वो आपके दर्शन करना चाहता है। और कहकर गया है कि वह जब तक आपके दर्शन नहीं कर लेता तब तक मुझे अपना मुख नहीं दिखायेगा। काल निरंजन जी कहते हैं कि आप उसे अभी बुला लो मैं उसे दर्शन नहीं दूंगा वह व्यर्थ  का कार्य कर रहा है। जिस काम के लिए उसे उत्त्पन्न किया गया है इस समय उसके लिए यही कार्य उचित नहीं है। यह कहकर काल निरंजन जी अंतरध्यान हो गए।

श्री ब्रह्मा को बुलाने के लिए गायत्री का उत्त्पन्न होना

उनके अंतर्ध्यान होते ही देवी अष्टांगी ने अपनी शक्ति से एक लड़की (गायत्री) को उत्त्पन्न किया और उससे कहा की जाओ और ब्रह्मा को बुलाकर लाओ उससे कहना की मैंने लौटा मंगवाया है। गायत्री माँ दुर्गा से आज्ञा पाकर वहां से प्रस्थान कर गई। अब देवी गायत्री श्री पास पहुंची और उन्होंने देखा की श्री ब्रह्मा जी काल निरंजन के दर्शन हेतु ध्यान लगाए बैठे हैं तो उसने उनके ध्यान को भंग करना उचित ना समझा और वो उनके ध्यान से उठने की प्रतीक्षा करने लगी।

गायत्री के द्वारा श्री ब्रह्मा जी का ध्यान भंग करना  

तभी देवी दुर्गा ने ध्यान लगाकर देखा की श्री ब्रह्मा जी ध्यान लगाए बैठे हैं और गायत्री उनकी प्रतीक्षा कर रही है तो उन्होंने गायत्री से कहा की तुम इनके पैरों को स्पर्श करो तो ये ध्यान से उठ जायेंगे। गायत्री ने श्री ब्रह्मा जी के चरणों को स्पर्श किया जैसे ब्रह्मा जी के चरणों पर एक स्त्री के हाथ का स्पर्श हुआ तो उनका ध्यान भंग हो गया और वे क्रोधित होते हुए बोले पापिन स्त्री तुम कौन हो? और तुमने मेरा ध्यान भंग करने की चेष्टा भी कैसे की?

मैं तुम्हे इस पाप के लिए श्राप देता हूँ। यह सुनकर गायत्री घबरा गई और हाथ जोड़कर श्री ब्रह्मा से निवेदन करने लगी की हे ब्रह्म देव कृपया मुझे क्षमा करें यह पाप मैंने जानबूझ कर नहीं किया और ना ही इसके पीछे मेरा को स्वार्थ है।  मुझे माँ दुर्गा ने आपके पास भेजा है लौटा लाने के लिए जिससे सृष्टि की निर्माण कार्य पूरा किया जा सके। यदि फिर आप मुझे श्राप देना चाहते हैं तो दे सकते हैं। 

झूठ बोलने के लिए गायत्री व् पहुपवती की शर्त 

श्री ब्रह्मा जी ने कहा कि ठीक है लेकिन मैं किस मुँह के साथ माता के सामने जाऊंगा। क्योंकि मैंने अब तक काल निरंजन जो मेरे पिता हैं उनके दर्शन ही नहीं हुए हैं। और मैं अपनी माता के समक्ष प्रतिज्ञा करके आया था कि अपने पिता जी के दर्शन करके ही उन्हें अपना मुँह दिखाऊंगा। मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में असफल हो गया हूँ मुझे उनके सामने जाने में लज्जा आ रही है। गायत्री श्री ब्रह्मा जी से कहती हैं की हे ब्रह्मा वो आपकी माता हैं और माता से क्या लज्जा। यदि ऐसा होता तो वे आपको बुलाने के लिए मुझे आपके पास ना भेजती।

श्री ब्रह्मा ने कहा की मुझे शर्म महसूस हो रही है वहां जाकर मेरा उपहास बन जाएगा। देवी गायत्री ने ब्रह्मा जी से कहा रास्ता है यदि तुम शान से अपनी माता के पास जाना चाहते हो। श्री ब्रह्मा जी ने उत्सुकतावश पूछा बताओ देवी गायत्री क्या रास्ता है। गायत्री ने कहा की तुम अपनी माता से कहना होगा की तुमने काल निरंजन यानि तुम्हारे पिता के दर्शन हो गए हैं। श्री ब्रह्मा जी कहने लगे की यह तो झूठ है जिसे मैं कैसे सच साबित कर सकता हूँ।

गायत्री ने कहा की तुम्हारा साथ देने के लिए मैं हूँ ना। मैं क्या काम आउंगी। श्री ब्रह्मा जी खुश हुए और कहने लगे कि ठीक चलो मैं अभी देवी प्रकृति के पास जाकर यह सुचना दे देता हूँ। गायत्री ने कहा रुकिए ब्रह्मा जी इतनी जल्दी भी क्या है भला ये बताइये बिना किसी स्वार्थ के मैं आपका साथ क्यों दू। मुझे भी इसके बदले में आपसे कुछ चाहिए। श्री ब्रह्मा से बहुत ही उत्सुकता से  कहा , कहो देवी तुम्हे क्या चाहिए? गायत्री ने कहा कि आपको मेरे साथ भोग-विलास करना होगा अर्थात सम्भोग करना होगा तभी मैं तुम्हारा साथ दूंगी अन्यथा नहीं। श्री ब्रह्मा जी के सामने और कोई रास्ता न था उनके लिए तो यह वह स्थिति थी की मरता क्या न करता।

श्री ब्रह्मा जी ने गायत्री के साथ मिलन किया और कहने लगे की चलो अब देवी दुर्गा को यह सुचना देते हैं। गायत्री ने कहा की ऐसे जाना ठीक न होगा हमें एक और गवाह की जरूरत है जिससे पूरी तरह यकीं किया जा सके। श्री ब्रह्मा जी ने कहा क्या अब कोई रास्ता है तुम्हारे पास। गायत्री ने अपनी ध्यान शक्ति से एक लड़की को बनाया जिसका नाम पुहपवती था उसने भी श्री ब्रह्मा के समक्ष वैसी ही शर्त रखी जैसी गायत्री ने रखी थी। श्री ब्रह्मा जी को उसके साथ भी सम्भोग करना पड़ा। 

लज्जा और उपहास से बचने के लिए श्री ब्रह्मा, गायत्री, और पहुपवती का माँ आदिभवानी के समक्ष झूठ का सहारा लेना 

अब वे तीनो अपनी बात बताने के लिए देवी प्रकृति के पास आये और श्री ब्रह्मा जी से देवी दुर्गा ने प्रश्न किया की क्या आपको अपने पिता काल निरंजन के दर्शन हुए हैं या वैसे ही निष्फल वापिस आ गए। श्री ब्रह्मा जी कहा कि हे माते मुझे मेरे पिता यानि काल  दर्शन हो गए हैं। यदि आपको मुझ पर यकीं ना हो तो आप इन दोनों से पूछ सकती हैं।

दोनों गायत्री और पहुपवती ने हाँ कर दी। देवी दुर्गा को बहुत ही आश्चर्य हुआ और उन्होंने ध्यान लगाकर काल निरंजन से पुछा की क्या अपने ब्रह्मा को दर्शन जबकि अपने मुझसे वचन दिया था की आप मेरे अलावा किसी और को दर्शन नहीं देंगे। काल नीरंजन ने आकाशवाणी करते हुए कहा की मैंने ब्रह्मा को दर्शन नहीं दिए हैं यह तीनो झूठ बोल रहे है। 

माँ आदिभवानी का क्रोधवश तीनो (श्री ब्रह्मा, गायत्री, और पहुपवती) को श्राप   

माता दुर्गा क्रोध में आ गई और कहने लगी की ब्रह्मा जी आप मेरे पुत्र होकर मुझसे ही छल कर रहे हैं अर्थात अपने मुझसे  झूठ बोला कि आपको आपके पिता जी के दर्शन हो गए है इसके लिए तुम्हे दण्डित होना पड़ेगा। मैं तुम्हे श्राप देती हूँ।

श्री ब्रह्मा जी हाथ जोड़कर देवी दुर्गा के समक्ष याचना करने लगे की हे माता मैं अपनी प्रतिज्ञानुसार मेरे पिता जी के दर्शन करने के लिए तलाश में गया जरूर था लेकिन उन दर्शन ना कर सका जिससे मुझे आपके समक्ष आने में लज्जा आ रही थी। कृपया मुझे क्षमा करें। देवी प्रकृति नहीं मानी और उन्होंने तीनों (श्री ब्रह्मा, गायत्री, और पहुपवती) को श्राप दे दिया। 

माँ आदिभवानी का श्री ब्रह्मा को श्राप

प्रकृति देवी ने श्री ब्रह्मा को श्राप देते हुए कहा कि इस जगत में तुम्हारी कोई भी पूजा नहीं करेगा और तुम्हारे वंशजो को ज्ञान नहीं होते हुए भी वे ज्ञानी बनने का ढोंग करेंगे। वे लोगो को वेद और पुराण पढ़कर लोगो को ठगना शुरू कर देंगे।

उन्हें मनुष्यों की भलाई से जयादा भेंट लेने में ज्यादा दिलचस्पी होगी। वे अपने आप को सर्वश्रेठ और दूसरों को नीचा समझेंगे और दिखाने की कोशिश करेंगे। यह सब सुनकर श्री ब्रह्मा जी बेहोश हो गए और जमीं पर गिर गए। 

माँ भवानी का गायत्री को श्राप

देवी दुर्गा ने गायत्री को को श्राप दिया की तूने भी झूठ बोलने में इनका साथ दिया जिसके लिए तुम भी दंड भोगने के दायरे में हो तुम मृत्युलोक यानी पृथ्वी पर गाय के रूप में रहोगी और कई सांड तेरे पति होंगे। 

माँ भवानी का पहुपवती को श्राप

इसी प्रकार देवी अष्टांगी ने पहुपवती को भी श्राप दिया और कहा की तुम मेरे श्राप के अनुसार गंदगी में निवास करोगी। तुझसे जो फूल प्राप्त होंगे उन्हें पूजा में कोई स्थान नहीं दिया जायेगा। तुझे पृथ्वी पर केवड़ा और केतकी के नाम से जाना जायेगा। इसे हरियाणा में कुसौंधी के नाम से जानते हैं। और यह कुरड़ी में पाई जाती है। 

काल निरंजन के द्वारा माँ भवानी को श्राप 

जब माता दुर्गा ने तीनो को श्राप देने के पश्चात् पछताने लगी ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार माता-पिता अपने बालक को किसी गलती पर डांटने के बाद पछताते हैं। 

काल निरंजन जो यह सब देख रहे थे उन्होंने कहा की देवी दुर्गा यह तुमने क्या अनर्थ कर दिया तीनो को श्राप दे दिया वो भी एक छोटी सी गलती के लिए। अब तुम भी एक अपराध की भागी हो जिसके लिए तुम्हे भी सजा मिलेगी। जब तुम द्वापर युग में द्रोपदी के रूप में जन्म लोगी और तुम्हारे पांच पति होंगे जिन्हे पांडवो के रूप में जाना जायेगा।

काल निरंजन के श्राप के अनुसार देवी भवानी ही द्रोपदी के अवतार में पैदा हुई थी। जब काल निरंजन ने यह आकाशवाणी की तो देवी दुर्गा ने कहा की हे निरंजन अब तो आपका ही वश है जो चाहे करें आपकी मर्जी। 

काल निरंजन ने यह श्राप देवी अष्टांगी को इसलिए दिया था क्योंकि उन्होंने अपने लोक पर एक ऐसा कानून बना रखा था जहा पर को भी अपने से दुर्बल जीव पर अत्याचार या सताने का काम करेगा तो उसे उसका दंड अवश्य भुगतना पड़ेगा। 

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