सुपच सुदर्शन और पांडव यज्ञ की कथा

सुपच सुदर्शन और पांडव यज्ञ की कथा

ये तो सब जानते हैं की पांडवो और कौरवों के बीच में महाभारत भीषण का युद्ध हुआ था। लेकिन आप इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते की पांडवों के महान योद्धा अर्जुन जो अपने पारिवारिक मोह में आकर युद्ध क्षेत्र में पहुंच कर युद्ध करने से इंकार कर देते हैं।

और अपने अस्त्र-शास्त्र उतार कर रख देते हैं। उस समय भगवान् श्री कृष्ण के शरीर में काल यानी ब्रह्म घुस कर अर्जुन को युद्ध करने के लिए बाध्य करता है यानि अर्जुन को सलाह देता है की हे अर्जुन इस मोह माया को त्याग कर युद्ध कर।

तब अर्जुन श्री कृष्ण जी से कहते हैं की हे श्री कृष्ण मैं युद्ध नहीं कर सकता क्योंकि मुझे मेरा धर्म यह पाप करने से रोक रहा है। और अपने ही परिवार के साथ युद्ध करना पाप यानि अधर्म है। हे श्री कृष्ण मैं युद्ध करने के बजाय भीख मांगना अपना जीवन निर्वाह कर लूंगा लेकिन युद्ध करने के लिए मुझे विवश न करें।

तब काल श्री कृष्ण के शरीर में प्रवेश है और कहता है की युद्ध करना वो भी अपने हक़ के लिए यह न तो अधर्म है और न ही पाप। आप युद्ध कीजिये यानि अपना कर्म कीजिये फल की चिंता न करें। यह गीता जी के अध्याय 11 श्लोक 33 और अध्याय 2 श्लोक 37, 38 में वर्णित है जिसे आप देख सकते हैं। 

महाभारत के इस लेख में एक अंश में लिखा गया है कि श्री कृष्ण के गीता उपदेश यानि समझने के पश्चात् अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार हुआ और दोनों (पांडवो और कौरवों) के बीच में भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में करोड़ों की संख्या में सैनिक और कौरव मृत्यु को प्राप्त हो गए और पांडव इस युद्ध में विजयी घोषित हुए।

श्री कृष्ण जी द्वारा युधिष्ठर को गद्दी पर बैठाना

जीत के पश्चात् पांडवों में से किसी एक को राज्य के सिंहासन पर बैठना था तब श्री कृष्ण पांडवों में ज्येष्ठ युधिष्ठिर को सिंहासन पर बैठने के लिए कहते हैं क्योंकि सिंहासन पर वही बैठता है जो सबसे ज्येष्ठ होता है क्योकि यह पहले परम्परा थी। लेकिन युधिष्ठिर उस सिंहासन पर बैठने से मना कर देते हैं और कहते हैं की हे श्री कृष्ण मेरा धर्म मुझे यह स्वीकृति नहीं देता की

मैं इस सिंहासन पर बैठ जाऊं। क्योकि आप तो जानते ही हैं कि इस युद्ध में हमारे चहेरे भाई कौरव और कितने सैनिक शहीद हुए हैं। उन सब की पत्निया विधवा और बच्चे अनाथ हो गए हैं क्या कसूर था उन बेचारों का जो इस युद्ध में व्यर्थ में ही अपनी जान गवां बैठे हैं। यह सिंहासन उन सभी के खून से सना हुआ है।

इसलिए हे श्री कृष्ण कृपया मुझे इस सिंहासन पर बैठने के लिए विवश न करें मेरा चित और धर्म दोनों ही मुझे यह पाप करने से मना कर रहे हैं। जब श्री कृष्ण के बार बार मनाने पर भी युधिष्ठिर उस सिंहासन पर नहीं बैठा तो उन्होंने कहा की आप भीष्म पितामह से सलाह ले सकते हैं क्योकि जब अपना दिमाग काम न करे तो किसी अपने से सलाह लेना उचित होता है पांडव ज्येष्ठ।

भीष्म-पितामह

युधिष्ठिर इसके लिए मान गया और श्री कृष्ण जी उन पांचो भाइयों को भीष्म पितामह के पास ले गए जहाँ अर्जुन के द्वारा बनाये गए तीरों के सेज पर भीष्म लेटा हुआ था और अपनी मृत्यु के नजदीक पा रहा था।  वहां पहुंचने पर श्री कृष्ण जी ने भीष्म को सारा वृतांत सुनाया और कहा कि ही एकमात्र इनके अपने बचे हैं जो इनको सही सलाह दे सकते हैं। हे भीष्म अब आप ही इनका मार्गदर्शन करे और इनको राज्य के सिंहासन पर बैठने के लिए कहें ताकि राज्य पर कोई विपत्ति न आये और सुचारु रूप से चले। जो सैनिक इस युद्ध में मारे गए हैं उन सैनिकों के परिवार वालों के लिए भी तो कल्याणकारी कार्य करने हैं। और आप ही इन्हे राजनीती के गुर सीखा सकते हैं। 

भीष्म पितामह के समझने कर आग्रह करने पर भी पांडव ज्येष्ठ युधिष्ठिर अपने मार्ग यानि धर्म के मार्ग से विचलित नहीं हुआ और रट लगाए रखी के इस खुन से स्ने हुए सिंहासन पर मैं कदाचित नहीं बैठ सकता। यदि मैं इस सिंहासन पर बैठता हूँ तो पाप का भागीदार बन जाऊंगा और मुझे नरक प्राप्त होगा जो मैं कदापि नहीं चाहता।

हे पितामह और श्री कृष्ण कृपया मुझे यह पाप करने के लिए विवश न करें। यदि आपके पास कोई उचित मार्ग या सलाह है तो बताएं। यह सुनकर श्री कृष्ण जी कहते हैं की एक रास्ता है यदि तुम्हे उचित लगे और जहाँ तक मैं जानता हूँ आपको उचित ही लगेगा।

आप सिंहासन पर बैठने के लिए एक धर्म यज्ञ करवाए जो आपको इस पाप का भागीदार बनने से बचा सकता है और तुम इस यज्ञ के माध्यम से जो हत्याएं आपने युद्ध में की हैं उनके पाप से भी मुक्त हो जाओगे। युधिष्ठिर श्री कृष्ण के इस विचार पर सहमति जताते हुए कहने लगे कि हे श्री कृष्ण जैसा आप उचित समझें।

तत्पश्चात एक धार्मिक यज्ञ करवाया गया और युधष्ठिर का राजसिंहासन पर राजतिलक किया गया और उसे हस्तिनापुर यानि दिल्ली का राजा घोषित किया गया।   

सुखसागर के प्रथम स्कन्द के अध्याय 8 का अंश, पेज न. 48 से 53 (आठवां और नौंवा अध्याय)

राजा युधिष्ठिर को बुरे स्वपन आना

पांडवों को हस्तिनापुर पर शासन करते हुए कुछ समय अच्छे से बीत गया था और पांडव अपने राज्य में हंसी ख़ुशी रह रहे थे की अचानक राजा युधिष्ठिर (पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता) को बुरे-बुरे सपने सताने लगे। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन धीरे-धीरे छीन रहा था।

राजा युधिष्ठिर अपने सपनो में देखते हैं की महिलाये रो रही हैं उनके बच्चे उनके पास खड़े हैं जो सहमे हुए हैं और उनसे बस यही गुजारिश कर रहे हैं की उन्हें भी उनके पापा यानि परिवार के मुखिये के पास भेज दो। उन्हें सपने में दिखाई देता है कि युद्ध के मैदान में किसी का सिर कहीं पड़ा है और किसी का धड़ कहीं पड़ा है।

यह सब राजा युधिष्ठिर अपने सपने में देख कर बहुत ही चिंतित रहने लगा था। एक दिन रानी द्रोपदी (जो पांचो भाइयों की पत्नी थी) अपने सबसे बड़े यानि ज्येष्ठ पति से पूछती है कि क्या उन्हें कोई समस्या है या कोई व्यथा जो उन्हें अंदर ही अंदर खाये जा रही है। कृपया आप हमें बताये शायद हम आपकी समस्या का निवारण कर दें।

राजा युधिष्ठिर ने बड़ी चतुराई के साथ बात को टाल दिया और कहने लगे कि कुछ भी नहीं हुआ बस ऐसे ही। काफी दिन बीत गए एक दिन रानी द्रोपदी ने चारों भाइयों को  राजा की व्यथा बताई और कहने लगी की राजा युधिष्ठिर कुछ दिनों से रातों में सो नहीं पा रहे हैं और ना ही भोजन ठीक से ग्रहण कर रहे हैं कृपया आप जाए और उन्हें उनकी व्यथा यानि चिंता का कारन पूछें।

रानी द्रोपदी का आदेश पाकर चारों भाई (अर्जुन, भीम, नकुल, और सहदेव) अपने बड़े भाई युधिष्ठिर के पास गए और उनसे उनकी चिंता का कारन पूछा।  पहले तो राजा युधिष्ठिर ने कुछ नहीं बताया और उन्हें टालने की कोशिश की लेकिन बाद में उनके बार बार अनुरोध पर अपनी सारी व्यथा उनको बताई।

श्री कृष्ण जी द्वारा पांडवो को अश्वमेघ यज्ञ की सलाह देना

पांचों भाई अगले ही दिन श्री कृष्ण जी के पास सलाह लेने के लिए जाते हैं और उनको सारा वृतांत सुनते हैं। तब श्री कृष्ण जी उनसे कहते हैं की आपको एक यज्ञ करवाना होगा वहीँ यज्ञ आपको इस चिंता या स्वप्न से मुक्त कर सकता है। यह सुनकर पांडव खुश हो गए और यज्ञ करने का मुहूर्त निकलवाया गया।

यज्ञ, पूजा की कोई अन्य विधि नहीं है बल्कि पूजा पाठ का वही तरीका है जो आप अपने घरों में कथा यानि हवन करवाते समय करते हो। यज्ञ में उस श्रेष्ट परमात्मा को आहुति दी जाती हैं जो सबसे श्रेष्ठ हैं यानी पूर्ण परमात्मा हैं। उनको भोजन करवाने के पश्चात् जो भी अवशेष यानि बचा हुआ भोजन। यज्ञ में स्थित सभी खाते हैं और अपने आप को पाप से मुक्त करने की कोशिश करते हैं।

पांडव जो श्री कृष्ण से सलाह लेने के लिए गए थे उनके पास और कोई रास्ता नहीं था इसलिए उन्होंने यज्ञ करवाने की सोच ली और सहमति जताकर वापिस अपने राज्य में आ गए और यज्ञ की तैयारी शुरू कर दी। श्री कृष्ण जी ने उनको सलाह दी आप इस यज्ञ में सभी देवी-देवताओं, ऋषि-मुनिया, साधु-संतो, और प्रजा को बुलाये क्योकि जिंतने ज्यादा लोग इस भोजन को ग्रहण करेंगे उतने जयादा आपको गुण मिलेंगे।

लेकिन याद रहे आपके लिए सबसे महतवपूर्ण संत लोग होंगे क्योकि उनमे एक ऐसा संत भी हो सकता है जिसके पास शक्ति और भक्ति असीम है वही आप पर कृपा कर सकते हैं। आप एक सजे हुए ऊँचे मंच पर एक पांच मुख वाले शंख को रखेंगे वही आपके यज्ञ को पूरा करने का प्रमाण देगा। जब संतो के द्वारा भोजन जो जायेगा तो एक महान संत की कृपा से यह शंख अपने आप बजने लगेगा यानि शंकनाद होगा। और उस शंख की आवाज इतनी तेज होगी की पूरी पृथ्वी और स्वर्ग तक सुनाई देगी। 

यज्ञ के लिए सभी को आंमत्रित करना

यज्ञ की निश्चित की गई तारीख यानि तिथि आ गई और यज्ञ शुरू करने की तयारी की गई। यज्ञ के दिन सभी धर्मपरायण व्यक्ति, 88 हज़ार ऋषि, 33 करोड़ देवी-देवता, 9 नाथ, 84 सिद्ध, ब्रह्मा, विष्णु और शिव ये सब यज्ञ में शामिल हुए। इन सभी की उपस्थिति में यज्ञ का आरम्भ हुआ और बाद में सभी ने भोजन का अवशेष खाया।

सभी ऋषि-मुनियों, स्वयं श्री कृष्ण, शिव, ब्रह्मा आदि ने भोजन ग्रहण किया लेकिन शंख नहीं बजा जो पूर्ण रूप से यह सुचना दे रहा था की यज्ञ अभी पूरा नहीं हुआ है इसमें कुछ कार्य अभी शेष है। उसी क्षण राजा युधिष्ठिर श्री कृष्ण जी के पास जाकर कहते हैं हे श्री कृष्ण सब ऋषि-मुनि, साधु-संत, देवी-देवता और यहाँ तक की आप स्वयं भी भोजन ग्रहण कर चुके हैं फिर भी शंख नहीं नाद हुआ इसका क्या संकेत है प्रभु।

श्री कृष्ण ने उत्तर दिया की हे राजन (युधिष्ठिर) आप का यज्ञ अभी अधूरा है क्योकि इसमें वह पूर्ण पुरुष जो सतनाम और शरण के उपासक हैं उपस्थित नहीं हैं। यह सुनकर जितने भी महापुरुष और प्रवेशक आये थे झगड़ने लगे। राजा युधिष्ठिर श्री कृष्ण की यह बात सुनकर बहुत ही चिंतित हो गए और कहने लगे की हे प्रभु मैंने सभी ऋषि मुनि, साधुसंत और देवी देवता, और परम परमेश्वर तो तीनो लोको के स्वामी हैं (ब्रह्मा, विश्नि और शिव) सभी को इस यज्ञ में आमंत्रित किया था

जिनमे मंडलेश्वर, वशिष्ठ मुनि, मारकंडे, लोमेश ऋषि, नौ नाथ, 84 सिद्ध इन सब को आमंत्रित किया है। भला अब कौन है जो शेष बचे हैं और न ही मैंने इनके अलावा किसी और का नाम सुना है। इस पर श्री कृष्ण जी कहते हैं की युधिष्ठिर तुम खुद ही सोचो की मेरे यानी विष्णु, भगवान् शिव, श्री ब्रह्मा जी और अन्य जिंतने भी अतिथिगण यहाँ उपस्थित हैं के भोजन खाने पर शंख नहीं गूंजा इसका मतलब ये है की ये सब अपने अपनी प्रशंसा और वासना के लिए ईश्वर की भक्ति करते हैं।

ये सब भक्ति करके जो भी अलौकिक  शक्ति को प्राप्त करते हैं उनसे ये इस जगत के प्राणियों  आकर्षित करते है और आप तो नरक में जाते ही हैं साथ ही उन अज्ञानी आत्मों को भी नरक की और ले जाते हैं जो इनके अनुयायी होते हैं अर्थात जो इनके आगे पीछे इनकी झूठी जय जयकार करते रहते हैं। 

ग़रीब, साहिब के दरबार में, गहाक कोटि अनंत

चार चेज चहै हैं, रिद्धि सिद्धि मन महंत

ग़रीब, ब्रह्म रंध्र के गात को, खोलत है कोइ इक

दवारे से फेर जात हैं, अनीस बहोत अनक

ग़रीब, बेज़क की बाता कहँ, बीज़क नहिं हाथ

पृथ्वी ढोबन उरते, कह-कह मीठी बात

ग़रीब, बेज़क की बाता कहँ, बेज़क नहिं पस

औरों को प्रमोदिहि, आपन चले नरस

तब श्री कृष्ण जी अपनी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए युधिष्ठिर को दिखते हैं कि देखो इन सब महात्मा लोगो को ये सब अपने पिछले जन्म में जानवरों का रूप धार चुके हैं यानि जानवरों का जीवन जी चुके हैं इनमे से कोई भैंस, बकरी, केंचुआ, शेर, आदि थे। 

श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को जो भी दिखाया वह देखकर युधिष्ठिर ने कहा, हे प्रभु! यह मैं क्या देख रहा हूँ इसके हिसाब से जो धरती एक दिन संतो से रहित हो जाएगी यानि पृथ्वी पर एक भी संत नहीं बचेगा। श्री कृष्ण जी कहते है की युधिष्ठिर ऐसी कोई बात नहीं है पहली बात तो ये है की ऐसा संभव ही नहीं है और यदि हो भी जाता है तो पृथ्वी पर हाहाकार मच जाएगी अर्थात पृथ्वी पर आग लग जाएगी और सभी प्राणी आपस में लड़ लड़ कर मर जायेंगे।

लेकिन युधिष्ठिर ऐसा होना संभव नहीं है क्योकि एक पूर्ण संत ने अपनी शक्ति के माध्यम से इस का संतुलन बना रखा है। तत्पश्चात मैं पृथ्वी पर आता हूँ और जो भी आसुरी प्रवृति का प्राणी है उसे या तो मैं नष्ट कर देता हूँ या फिर उसके आसुरी स्वाभाव को।

ताकि संत  को बनाये रखने में सक्षम हो सके  किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो अर्थात  अपने खेत मैं होने वाली फसल में खरपतवार को ख़त्म करके उसे बाहर फेंक देता है ठीक उसी प्रकार मैं भी उन संतो के लिए आसुरी शक्ति को नष्ट करके संतो के लिए मदद करता हूँ ताकि वे अपने कार्य को आसानी से कर सके और उन्हें इस कार्य को करने में कोई कष्ट ना हो। 

युधिष्ठिर मैं तुम्हे एक पूर्ण संत के बारे में जानकारी देता हूँ की पूर्ण संत बहुत ही कोमल ह्रदय के होते हैं। एक पूर्ण संत वही होता है जो सभी को समान ख़ुशी प्रदान करे वह हर प्रकार के पौधे को सींचते हैं फिर चाहे वह कांटेदार हो या फलदार। ऐसे संत अपनी दयालुता को हर जीव के प्रति समान रखते हैं। 

युधिष्ठिर अब मैं आपको एक ऐसे ही संत के बारे में बताने जा रहा हूँ। वे अपना जीवन निर्वाह का  दिल्ली के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में कर रहे हैं। हमें उन्हे  बुलाना होगा क्या अपने उनको बुलाया था? तब युधिष्ठिर जी कहते हैं की हे प्रभु उस दिशा के जितने भी संतो को आमंत्रित करने का काम मेरे छोटे भाई भीम को दिया गया था।

सुपच सुदर्शन द्वारा पाण्डव का यज्ञ ढुकराना

अब उन्ही से पूछना पड़ेगा की वे उन संत के पास गए थे या नहीं। युधिष्ठिर ने भीम को बुलाया और पूछा की उत्तर दिशा में एक संत रह रहे हैं क्या आप उनके पास गए थे? यदि गए थे तो क्या उनको अपने यज्ञ के लिए आमंत्रण प्रस्ताव दिया था। भीम ने कहा कि हाँ मैं उनके पास गया था और उनको मैंने निमंत्रण भी दिया था की आप हमारे यज्ञ में आएं और भोजन ग्रहण करें। परन्तु उन्होंने साफ मना कर दिया। यह सुनकर श्री  कृष्ण जी  बोले की कोई भी संत ऐसे आने से मना नहीं करते। 

श्री कृष्ण जी ने भीमसेन से कहा की भीमसेन कृपया हमें पूरी बात बताइये जो उस  दिन आप दोनों के बीच हुई थी क्योकि वह एक पूर्ण संत हैं। वे किसी कारण के स्पष्ट किये बिना मना नहीं  कर सकते हैं। तब भीमसेन ने उस दिन जो उन दोनों के बीच में बात हुई सारी बताई।

हे श्री कृष्ण उन संत का नाम सुपच सुदर्शन है और वे वाल्मीकि जाति से सम्बन्ध रखते हैं वे बहुत ही ज्ञानी  प्रतीत  हैं। जब मैं उस दिन उनको यज्ञ के आमंत्रित करने के लिए गया था  मैंने सर्वप्रथम उन महात्मा को प्रणाम किया और तत्पश्चात मैंने उनको सारी व्यथा सुनाकर यज्ञ के लिए निमंत्रण पत्र दिया तो वे कहने लगे की मैं आपका पाप खाना नहीं खा सकता और ना ही आपके यज्ञ में उपस्थित होकर पाप का भागीदार बनूँगा। 

सुरदर्शन-जी

मैंने उनसे कहा की हे महात्मन आप जो कह रहे हैं वह मेरी समझ में नहीं आ रहा है कृपा स्पष्ट करें और मुझ अज्ञानी को बताये की हमसे क्या गलती हुई है जो आप हमारे यज्ञ में नहीं आ रहे हैं। 

तब उन संत ने मुझे बताया की भीमसेन आप लोगो ने राज्य पर शासन करने हेतु घोर अपराध किया है। जिसकी वजह से आपके राज्य में बहुत हानि हुई है। 

आज तुम जिन करोड़ो लोगो मारकर राज्य का आनंद ले रहे हो। क्या आप को उनके परिवार की थोड़ी सी भी पीड़ा का आभास है नहीं है। जो सैनिक युद्ध में मारे गए थे वो देश के  लिए शहीद नहीं हुए बल्कि तुम भाइयों के बीच जो राज पाट छीनने की लड़ाई थी उसके लिए बलि का बकरा बने हैं। उन सैनिकों की विधवा पत्नी और अनाथ बच्चे रो-रो कर अपना दुःख प्रकट कर  रहे हैं।

बच्चे अपनी माता से पूछते हैं की माँ मेरे पिताजी छुट्टी लेकर कब घर आएंगे। क्या उन्हें छुट्टी  नहीं मिलती है जो हम अकेले ही रहते हैं वो तो अपने काम में व्यस्त  रहते हैं इधर हम उनकी याद में रोये जाते हैं। एक सैनिक का बेटा जो केवल 10 वर्ष का है वह अपनी माता से कहता है की जब मेरे पिताजी छुट्टी लेकर आएंगे तो वो मेरे लिए ढेर सरे खिलोने लेकर आएंगे और मैं उनको  अपने परिवार की पीड़ा के बारे में भी बताऊंगा की जब वो चले जाते हैं तो हमारा परिवार किन- 2 पीड़ाओं से गुजरता है।

उस मृत सैनिक बेटी जो अपनी माँ से  कहती है कि माँ जब मेरे पिताजी आएंगे तो वे  मेरे लिए एक साड़ी लाएंगे जब मैं बड़ी हो जाउंगी तो उसे ही पहनकर अपने ससुराल जाउंगी। और बेटा कहता है की मैं अपने पिता जी को वापिस नहीं जाने दूंगा और उनसे कहूंगा की अब आप की जगह आपका पुत्र सैनिक बनकर जायेगा क्योकि मैं अब बड़ा हो चूका हूँ।

यह कहते हुए जब बच्चे रोते हैं तो उनकी माँ उन्हें चुप करती है और उन्हें चुप करते करते उनकी बातें सुनकर माँ का दिल भर आता है तो एक कमरे में फुट फुट कर रोती है माँ को रोते हुए देख बच्चे फिर से रोने लगते हैं। फिर पड़ोसी उन्हें आकर सांत्वना देकर उन्हें शांत करते हैं। लेकिन अब तक उन बच्चों की माँ ने उनको ये नहीं बताया है की उनके पिता की युद्ध में लड़ते समय मृत्यु हो चुकी है।

क्योकि उस समय (जब युद्ध चल रहा था) तो उन बच्चो को जबरदस्ती उनके मामा के घर भेज दिया था सिर्फ एक ही बच्चा था जो केवल 1 से डेढ़ साल का था। जब बच्चे और उनकी माँ रो रही थी तो उनके परिजनों ने उनकी ढांढस बांधते हुए कहा की अब तुम अपने बच्चों को सच बताओ की इनके पिता युद्ध में मारे गए हैं।

क्योकि वह युद्ध कोई देश के लिए नहीं बल्कि भाइयों के बीच  राज्य को हथियाने यानि लालच के लिए था। यह जानकर बच्चे उस राजा को कोसने लगे जो राजा आज अपना जीवन आनद से बीता रहा है। सुपच सुरदर्शन ने आगे भी भीम को बताया की हे भीम, ऐसे बहुत से प्राणी हैं जो आपके द्वारा लड़े गए युद्ध के दर्द से पीड़ित हैं यानि आज भी वो उस दर्द को भोग रहे हैं जो आप लोगो ने उन्हें दिए है।

आपके द्वारा उन्हें दी गई पीड़ा और उनकी पीड़ित आत्माएं आपको कभी भी चैन से नहीं रहने देगी इसके लिए आप चाहे कितने भी यज्ञ करवा लो आप उस पाप से मुक्त नहीं हो सकते हैं। ऐसा पापी भोजन मैं तो कभी भी नहीं करूंगा। हाँ यदि तुम मुझे यज्ञ में बुलाना चाहते हो तो मेरे द्वारा पूर्व में किये गए १०० यज्ञ के फल मुझे दे दो तो मैं आ सकता हूँ अन्यथा नहीं।

यह सुनकर भीम ने कहा की अजीब महात्मा हैं ये हमने तो अब तक केवल 2 ही यज्ञ किये हैं जिनमे से दूसरा अभी सफल भी नहीं हुआ है और ये हमें सौ यज्ञ के फल मांग रहे हैं। तो मैं उनको यह कहकर चला आया की आप ना आएंगे तो भी चलेगा क्या तुम्हारे बिना हमारा यज्ञ सफल नहीं होगा?

श्री कृष्ण जी भीम की बातों को सुनकर कहते हैं की भीम तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था आखिर वे एक महात्मा यानि संत थे। और संतो का कभी भी अनादर नहीं करना चाहिए। श्री कृष्ण जी कहते हैं की सात समुद्र के अंत को पाया जा सकता है परन्तु सतगुरु यानि कबीर साहब के संत होने के अंत को नहीं पाया जा सकता। तीन लोक भी उनके सामने कुछ नहीं हैं। उस परम पिता परमात्मा जो हंस के समान है यानि जिसके ऊपर को कलंक ही नहीं है उसे लाने के लिए आप मेरे साथ आइये। 

श्री कृष्ण के कहने पर पांचो पांडव और श्री कृष्ण नंगे पैर ही सुपच सुदर्शन की कुटिया की और चल दिए।  आगे आगे श्री कृष्ण जी और पीछे पांडव बंधु।  श्री कृष्ण और पांडव सुदर्शन जी की कुटिया में पहुंचने के पश्चात् उन्हें सुदर्शन ने देख लिया और कुटिया में ध्यान मगन होकर बैठ गए।

तभी अचानक सुदर्शन जी के मन एक विचार उत्पन्न हुआ और उन्होने सभी को एक साधु को ढूंढने के लिए दूर दूर एक भेज दिया। और वह साधु उन्हें न मिला। सतगुरु यानि कबीर साहब की सुदर्शन के रूप में शक्ति की प्रतिभा को देख कर पांडव आकर्षित हो गए। श्री कृष्ण जी सुदर्शन जी की वंदना करने लगे और उनका अनुसरण किया।  पांडव भी ऐसा ही कर रहे थे जैसा की श्री कृष्ण। 

तब सुपच सुदर्शन जी ने अपनी आँखें खोली और श्री कृष्ण जी की ओर देखा। श्री कृष्ण जी को देखते ही सुरदर्शन जी बोले की श्री कृष्ण आज आप मुझ गरीब की कुटिया में स्वयं दर्शन देने के लिए आये हैं ये  सौभाग्य है की आप स्वयं ही यहाँ पधारे हैं। उन्होंने सभी को बैठने के लिए अनुरोध किया। और कहने लगे कि कहिये दीनानाथ जी कैसे आना हुआ? इस जगत में ऐसा क्या घटित हो गया

जो आपको मेरे पास आना पड़ा वो इतने लोगो के साथ। श्री कृष्ण जी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि गुरुदेव आप से क्या अछूता है यानि आपको तो सब पता है क्योकि आप सर्वज्ञ हैं। आप तो पहले से सब कुछ जानते हैं कि पांडवों ने एक यज्ञ करवाया है जिसे पूर्ण  आपकी सहायता चाहिए अर्थात आपके बिना यह यज्ञ पूरा नहीं हो सकता। अतः मेरा आपसे अनुरोध है की आप उनपे अपनी कृपा दृष्टि बनाये और उनके इस यज्ञ को सफल करें। 

तभी अचानक सुरदर्शन जी की दृष्टि वहीँ पर खड़े भीमसेन पर गई और उन्हें देखते ही बोले, यह बहादुर व्यक्ति मेरे पास यज्ञ का निमंत्रण लेकर आये थे और उन्होंने मुझे सारी स्थिति से अवगत करवाया था। तभी सुदर्शन जी की बात को काटते हुए श्री कृष्ण जी बीच में ही बोलते हैं कि हे पूर्ण ब्रह्म! आप स्वयं ही अपने प्रवचनों में निर्देश देते हैं कि –

संत मिलन को चलिऐ, तज माया अभिमान

ज्यों ज्यों पग अनगे धरै, सोयज्ञ समांन

और फिर श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे नाथ हम छह दास अर्थात पांच पांडव और मैं यानि श्री कृष्ण नंगे पाँव यात्रा करके आपके चरणों में आये हैं कृपया हमारी सहायता करें। सुरदर्शन जी भीम की ओर देख रहे हैं श्री  गज्ञे और उन्होंने देखा की भीम भी उनसे किये गए दुर्व्यवहार के प्रति कोई प्रतिकिर्या नहीं दे रहे हैं तो उन्होंने भीम की ओर इशारा किया की इनसे क्षमा याचना करे। तब  भीम ने उनके चरणों में गिरकर सुरदर्शन जी से क्षमा मांगी और कहने लगे की हे महात्मन मुझ अज्ञानी व्यक्ति को क्षमा कर दीजिये अपने बल और राजा होने अहंकार में मैंने आपसे अभद्र व्यव्हार किया। कृपया  क्षमा करें। 

सभी ने सुदर्शन जी के चरणों में गिरकर कहा की हे नाथ हमारे इस धार्मिक कार्य को पूर्ण करने में हमारी मदद करें। सुदर्शन जी उन सब के विनम्र स्वाभाव को देखकर प्रसन्न हो गए। 

कबीर, साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नहीं

जो कोई धन का भूखा, साधु नहिं को आवाज

कबीर साहिब

सुदर्शन जी अपने आसन से उठ खड़े हुए और कहने लगे  हे श्री कृष्ण चलिए यदि आप मेरे पास इस उम्मीद से आये हैं कि मैं ही आपके यज्ञ को पूर्ण कर सकता हूँ तो निःसंदेह मैं आपके यज्ञ को पूरा करने में आपकी मदद करूंगा। यह कहकर सुदर्शन जी श्री कृष्ण और पांडवों के साथ उनके राज्य में उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ पर यज्ञ चल रहा था।

वहां बैठे सभी ऋषि-मुनि, साधु-संत और मंडलेश्वर, सिद्ध आदि सब देख रहे हैं कि ये कैसा संत है जो कपड़े भी इतने गंदे पहने हुए है और न ही भगवा हैं। लगता है को भिखारी मालूम होता है और इसे ये लोग संत समझ रहे हैं खेर ये हमारे सामने कुछ भी नहीं है एक तिनके के भांति है। 

सुदर्शन जी के लिए श्री कृष्ण जी के द्वारा आसान लगाना और द्रोपदी के द्वारा भोजन की व्यवस्था करना

श्री कृष्ण जी सुदर्शन जी के लिए स्वयं आसान लगाते हैं कर उन्हें बैठने के लिए कहते हैं। श्री कृष्ण जी वही महान आत्मा हैं जिन्होंने भीलनी के झूठे बेर और सुदामा को अपने गले से लगाया था और ये तो पूर्ण परमेश्वर हैं भला इनके लिए वे कैसे पीछे हट सकते थे। श्री कृष्ण जी सेवा का कोई भी मौका नहीं गवांते थे।  उन्होंने आसन लगाने के बाद द्रोपदी जो रानी थी अर्थात पांडवों की पत्नी थी उनसे कहा की बहन संत आये हैं इनके लिए भोजन की व्यवस्था कीजिये। द्रोपदी भी देख कर हैरान थी की ये कैसे संत हैं इनके पास तो संत के कोई भी गुण नहीं दिखाई पड़ते हैं। फिर भी श्री कृष्ण जी का आदेश है तो भोजन की व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी।

द्रोपदी ने संत सुदर्शन के लिए तरह तरह के स्वादिष्ट पकवान तैयार किये और सुदर्शन जो को चंडी की थाली में परोस दिए। भोजन परोसने के पश्चात् रानी द्रोपदी मन ही मन  की ये संत आज मेरे द्वारा बनाये गए भोजन की बहुत प्रशंसा करेंगे क्योकि मुझे नहीं लगता की इन्होने इससे ज्यागा स्वादिष्ट भोजन कभी खाया होगा।

रानी द्रोपदी यह सोच ही रही थी कि संत सुदर्शन ने सारे के सारे भोजन को एक साथ एक थाली में ही मिला लिया और उसे खाने लगे। यह देख रानी द्रोपदी को बहुत ही ग्लानि महसूस हुई की इन संत को तो खाना भी नहीं खाना आता। सब यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गए जब सुरदर्शन जी ने नमक माँगा। क्योकि संत नमक को राम-रस कहते थे। सुदर्शन जी ने खाने को पांच भागों में खाया और संख भी पांच बार बजा और उसके बाद नहीं बजा। 

संत गरीबदास जी महाराज का प्रवचन 

(सतग्रंथ साहिब, पृष्ठ संख्या 62) राग बिलावल से

व्यंजन छतिसन परोसिया, जहान द्रौपदी राणी

बिन अधर सतकर के, कहे शंख बानी

पंच जिरासी बाल्मीक, पंचे बार बोले

आवे शंख पंचायण, कपट खोले

बोले कृष्ण महाबली, त्रिभुवन के साजा

बाल्मिक प्रशाद से, कान में क्या बाजा

द्रौपदी सेती कृष्ण देव, जाब ऐस भीख

बाल्मिक के चारो की, तेरे ना अभिलाषा

प्रेम पंचायण भुख है, अना जग का काजा

ऊँचे नीच द्रौपदी काहा, शंख कान की यूं नहीं बाजा

बाल्मिक के चारो के, लई द्रौपदी धरा

शंख पंचायण बाजिया, कानकान झंकार

सुनत पंचायण शंख रे, पांडव बंद छूत

पंड रजा प्रहर हिय, धरा धाय अनूथी

श्री कृष्ण जी  सोच में पड़ गए कि संत सुरदर्शन जी के द्वारा भोजर ग्रहण करने पर भी शंख नहीं बजा इसका मतलब है की कुछ न कुछ अभी शेष है या कोई गलती हुई है। तभी श्री कृष्ण जी ने अपनी दिव्या दृष्टि से देखा कि द्रोपदी ने जो भोजन तैयार किया और उनको परोसा था तो उनमे अभिमान था यानि घमंड था।

तब श्री कृष्ण जी द्रोपदी से कहते हैं की बहन कोई भी संत सादा भोजन ही खाता है और अपने उन्हें तरह तरह का भोजन परोसा और वो भी परोसते समय अपने अपने मन में मेल रखा। आपको इन महात्मा से क्षमा मांगनी होगी। चाहे घर पर कैसा भी मेहमान आये हमें सदैव ही उनका आदर करना चाहिए न कि उनसे मैल।

अपने जब इनको खाना परोसा था तब आपके मन में मैल था अर्थात आपमें घमंड था जो नहीं होना चाहिए। क्या अपने यह नहीं देखा कि मैं श्री कृष्ण भी इनके लिए आसन लगा रहा हूँ और उनका सत्कार कर रहा हूँ। भला मुझे इसकी क्या जरूरत थी जबकि एक यज्ञ तो आपकी सुख समृद्धि के लिए किया जा रहा है। क्या आपको ये पता है की ये संत महात्मा कौन हैं

ये इस जगत के पूर्ण परमात्मा हैं इनके आगे तीनो लोको के स्वामी अर्थात श्री ब्रह्मा, विष्णु यानि मैं , शिर शिव भी कुछ नहीं हैं अर्थात इनके बाल के बराबर नहीं हैं और आप इनको भोजन कराते समय इनसे मैल  हैं। आपको इस पानी से इनके पैर धोकर जो चरणामृत बनता है उसे पीना होगा। 

रानी द्रोपदी द्वारा सुदर्शन जी से क्षमा मांगना श्री कृष्ण जी द्वारा चरणामृत पान करना

यह सुनकर रानी द्रोपदी ने उन संत अर्थात सुदर्शन जी क्षमा मांगी और उनके मैले पैरों को धोकर जो गन्दा पानी बचा था उसे चरणामृत के रूप में पिने लगी। जब रानी द्रोपदी ने चरणामृत को आधा पी लिया तो श्री कृष्ण जी कहते हैं की बहन क्या सारा चरणामृत पियेंगी इसका थोड़ा प्रसाद मुझे भी दीजिये न और लेकर श्री कृष्ण जी वो सारा चरणामृत पी गए। तब शंख इतनी जोर से बजा की पृथ्वी और स्वर्ग अर्थात तीनो लोक उस आवाज से गूंज उठे और पांडवो का यज्ञ सफल हो गया अर्थात पूर्ण हो गया।  

सतग्रंथ गरीब, पृष्ठ सं. 328 की कुछ पंक्तिया जोकि बंदीछोड़ संत गरीब दास जी महाराज द्वारा रचित  

पारख का अंग 

ग़रीब, सुपच शंख सब करत हैं, नीच जात बिस चुक

पोहमी बिगसी स्वारग सब, खइल जो परवत रंक

ग़रीब, कारी द्रौपदी दिलमंजना, सुपाच चरण जी धोये

बाजे शंख सर्व काल, राह अवज गोय

ग़रीब, द्रौपदी चरणामृत लेये, सुपच शंख कीन

बाज्या शंख असंख धूनी, गण गन्धर्व गीतौं

गरिब, फेर पांडौ के यज्ञ में, संख पंचायण तेर

द्वादाश कोटि पंडित जान, पड़ी सबन की मेर

गरीब, कारी कृष्ण भगवाँ कू, चारनामृत सिउन प्रीत

शंख पंचायण जब बाज्या, लिया द्रौपदी सीत

गरीब, द्वादश कोटि पंडित जान, और ब्रह्मा विष्णु महेश

चरन लागे जगदीश कू, जस कू रत शीश

ग़रीब, बाल्मीक के बाल समि, नहिं तेनाउँ लोख

सुर नर मुनि जन कृष्ण सुधि, पंडौ पावै पोष

गरीब, बाल्मिक बैकुंठ परी, स्वराग लगै लट

सांख्य पंचायण घृत है, गण गंधर्व ऋषि मात

गरीब, स्वराग लोक के देवता, कीन्ह पोरीया

सुपच सथासन बइठतें, बाजे अगम अगधार

ग़रीब, पंडित द्वादश कोटि , सहिद से सुर

सहंस अथासी देव मइँ, कोइ पद मइँ लेएन

गरिब, बाजा संख स्वरग सूर्या, चौदह भावन उचार

तेतिसौं तात लह्या, किनहिं पावै पार

अचला का अंग

(सत ग्रन्थ साहिब पृष्ठ नं. 359)

गरीब, सुपच रूप धरि आईया, सतगुरु पुरुष कबीर।

तीन लोक की मेदनी, सुर नर मुनिजन भीर।।97।।

गरीब, सुपच रूप धरि आईया, सब देवन का देव।

कृष्णचन्द्र पग धोईया, करी तास की सेव।।98।।

गरीब, पांचैं पंडौं संग हैं, छठ्ठे कृष्ण मुरारि।

चलिये हमरी यज्ञ में, समर्थ सिरजनहार।।99।।

गरीब, सहंस अठासी ऋषि जहां, देवा तेतीस कोटि।

शंख बाज्या तास तैं, रहे चरण में लोटि।।100।।

गरीब, पंडित द्वादश कोटि हैं, और चैरासी सिद्ध।

शंख बाज्या तास तैं, पिये मान का मध।।101।।

गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में, सतगुरु किया पियान।

पांचैं पंडौं संग चलैं, और छठा भगवान।।102।।

गरीब, सुपच रूप को देखि करि, द्रौपदी मानी शंक।

जानि गये जगदीश गुरु, बाजत नाहीं शंख।।103।।

गरीब, छप्पन भोग संजोग करि, कीनें पांच गिरास।

द्रौपदी के दिल दुई हैं, नाहीं दृढ़ विश्वास।।104।।

गरीब, पांचैं पंडौं यज्ञ करी, कल्पवृक्ष की छांहिं।

द्रौपदी दिल बंक हैं, शंख अखण्ड बाज्या नांहि।।105।।

गरीब, छप्पन भोग भोगिया, कीन्हें पंच गिरास।

खड़ी द्रौपदी उनमुनी, हरदम घालत श्वास।।107।।

गरीब, बोलै कृष्ण महाबली, क्यूं बाज्या नहीं शंख।

जानराय जगदीश गुरु, काढत है मन बंक।।108।।

गरीब, द्रौपदी दिल कूं साफ करि, चरण कमल ल्यौ लाय।

बालमीक के बाल सम, त्रिलोकी नहीं पाय।।109।।

गरीब, चरण कमल कूं धोय करि, ले द्रौपदी प्रसाद।

अंतर सीना साफ होय, जरैं सकल अपराध।।110।।

गरीब, बाज्या शंख सुभान गति, कण कण भई अवाज।

स्वर्ग लोक बानी सुनी, त्रिलोकी में गाज।।111।।

गरीब, पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में, आये नजर निहाल।

जम राजा की बंधि में, खल हल पर्या कमाल।।113।।

सभी साधना का बिना सतनाम और सरनाम के कोई महत्व नहीं

जब पांडवो को यज्ञ हो रहा था तो स्वयं श्री कृष्ण जी ने यह कहा था कि युधिष्ठिर ये सब लोग जो साधु के भेष में है जिन्हे हम ऋषि, सिद्ध, मंडलेश्वर, देवी-देवता और ब्राह्मण आदि मानते हैं ये सब पाखंडी हैं ये सब भक्ति नहीं करते बल्कि ये सब दिखावा करते हैं जिससे अज्ञानी मानव इनके पाखंड में उलझ जाता है और इनके ही बनाये हुए नियम पर चलने लगता हैं और इनकी जय-जयकार होने लगती है। तब ये लोग प्रसन्न हो जाते हैं और अपने आपको ज्ञानी, सर्वशक्तिमान कहने लगते हैं। 

यह गहन चिंतन करने की आवश्यकता है की ये सब लोग लगभग 5500 वर्ष पूर्व से हैं तब श्री कृष्ण जी उनके बारे में ये बात कह रहे हैं जबकि आज तो कलयुग का युग है और लोगो की सोच अब तो बिलकुल ही बदल चुकी है। 

उस समय श्री कृष्ण ने कहा था कि हे युधिष्ठिर ये सब तो पाखंडी हैं अर्थात जानवर के समतुल्य हैं क्योकि इन्होने सतनाम का जप कभी किया ही नहीं। 

गरीबदास जी महाराज ने सुख सागर बोध के तारक वेदी में, “शतदर्शन घमोडा बहड़ा, में”, शत्रुध्न घमोदा बहदा, में इसी कड़वे सत्य के बारे में जीकर कर रहे हैं। आदि-पुराण”, कि साधना जो ये उपासक कर रहे हैं वह सत्यनाम और शरणम् के बिना निरर्थक (अनावश्यक) है।

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