स्वामी रामानंद जी ने भी भगवान कबीर (कविर्देव) जी से तत्वज्ञान प्राप्त किया।

स्वामी रामानंद जी ने भी भगवान कबीर (कविर्देव) जी से तत्वज्ञान प्राप्त किया।

पंडित स्वामी रामानंद जी वेदो और श्रीमदभागवत गीता की गहन जानकारी रखने वाले एक विद्वान व्यक्ति थे। 

स्वामी रामानंद जी के द्वारा कबीर साहेब (कविर्देव जी) को पांच वर्ष की उम्र में अपने गुरु के रूप में अपनाना। 

भगवान् कबीर (कविर्देव) जी ने 5 वर्ष की उम्र में एक लीला रची। उन्होंने अपने आप को ढाई साल के बच्चे के रूप में ढाल लिया और सुबह होने से पहले ही पांच-गंगा घाट पर सीढ़ियों पर लेट गए। और यहाँ पर स्वामी रामानंद जी हर रोज स्नान करने के लिए आते थेऔर साथ ही भगवान् का नाम लेते थे । श्री रामानंद जी 104 वर्ष के हो चके थे।  स्वामी रामानंद जी दूसरे पड़ितों की भांति पूजा नहीं करते थे जिससे दूसरे पंडित उनसे ईर्ष्या करते थे। स्वामी रामानंद जी शास्त्रों के अनुसार ही पूजा करने के लिए कहते थे।  पुरे काशी शहर में पंडित रामानंद जी के 52 दरबार लगते थे। वे हमेशा ही वेदों और शास्त्रों और श्रीमद्भगवत गीता के अनुसार ही ज्ञान देते थे। वे हमेशा  ही ॐ नाम का जाप करने पर जोर देते थे। 

कबीर साहेब पंच-गंगा घाट की सीढ़ियों पर ढाई साल के बच्चे का रूप धारण करना।

कबीर-साहेब-पंच-गंगा-घाट-की-सीढ़ियों-पर-ढाई-साल-के-बच्चे-का-रूप-धारण-करना।

कबीर साहेब पंच-गंगा घाट की सीढ़ियों पर ढाई साल के बच्चे का रूप धारण करके लेते हुए और स्वामी रामानंद जी जैसे ही वहां स्नान करने के लिए आते है तो उनका पैर कबीर साहेब के सिर को लगता है तो कबीर साहेब जो एक छोटे बच्चे रूप में हैं रोने लगते हैं। बच्चे के रोने की आवाज़ को सुनकर स्वामी रामानंद जी उन्हें झुककर अपनी गोद में उठा लेते हैं और देखने लगते  हैं की कहीं बच्चे को चोट तो नहीं आई है। 

अब वह बच्चे को गोद में लिए हुए हैं और अपने गले से कंठी की माला निकलकर कबीर साहेब के गले में डाल दी और कबीर साहेब को कहते हैं की बेटा रोते नहीं हैं।  उन्होंने कबीर साहेब को कहा की बेटा “राम राम कहो” राम का नाम लेने से सब दुःख दूर हो जाते है और उन्होंने कबीर साहेब के सिर पर हाथ रखा और कबीर साहब चुप हो गए।  यह देख की बच्चा अब चुप जो गया है तो पंडित रामानंद जी स्नान करने के लिए चले गए और सोचने लगे की मैं इस बच्चे को अपने आश्रम में ले जाऊंगा और ये जिस किसी का भी होगा वह इसे ले जायेगा।  पंडित रामानंद जी स्नान करने के बाद बहार आये तो देखा की बच्चा वहां है ही नहीं वे अब सोच में थे की बच्चा कहाँ चला गया है।  लेकिन फिर सोचने लगे की चलो शायद बच्चा अपने घर चला गया होगा। लकिन कबीर साहेब अपनी झोपडी में चले गए थे वे वहां से गायब हो चुके थे। 

भगवान कबीर ने स्वामी रामानंद जी के आश्रम में दो रूप किय

एक दिन की बात है की रामानंद जी के शिष्य कहीं पर प्रवचन सुना रहे दे की कबीर साहेब भी वहां पर प्रवचन सुनने के आ पहुंचे। ऋषि जी उस समय अपने प्रवचनों में श्री विष्णुपुराण जी की कथा सुना रहे थे की भगवान विष्णु ही सर्वोच्च हैं उनसे ऊपर कोई भी नहीं है। वे ही तीनो लोको के निर्माता हैं।  वे अमर हैं उन्हें कोई मार नहीं सकता है।  उन्होंने किसी गर्भ से जन्म नहीं लिया है।  श्री विष्णु जी ने ही श्री कृष्ण और श्री राम के रूप में अवतार लिया है। यह सब कबीर साहेब सुन रहे थे।

जब प्रवचन ख़त्म हुआ तो कबीर साहेब जी ने ऋषि से कहा स्वामी अगर आप बुरा न माने तो क्या मैं आपसे पूछ सकता हूँ कि आपने ये क्या सुनाया है इस पर ऋषि जी बाले की हमने या विष्णुपुराण की कथा सुनाई है। तब कबीर साहेब बोले की हे ऋषिवर तो मैं आपसे प्रश्न करना चाहता हूँ क्या मुझे इजाजत है तो ऋषि ने कहा हाँ वत्स अवशय पूछ सकते हो वहां पर सैंकड़ों की संख्या में भक्त बैठे हुए थे।  तब कविर्देव जी ने पूछा की आप जब विष्णु पुराण सुना रहे थे तो अपने जी कर किया था की भगवान् विष्णु ही सर्वोच्च है वह ब्रह्मा और शिव की शक्ति से उत्पन हुए हैं। इस पर ऋषि जी कविर्देव की बात को काटते हुए बोले की वत्स मैं जो भी सुनाता हूँ वही विष्णु पुराण में लिखा जाता है। 

कविर्देव (कबीर साहब) हे ऋषिवर मैंने अपना संदेह दूर करने हेतु आपसे यह प्रश्न किया था कृपया आप क्रोधित मत होइए। 

तब ऋषि जी शांत रहने के लिए अनुरोध करके कविर्देव जी ने पुनः अपने प्रश्नो को दोहराया और कहा की  मैं एक दिन शिव पुराण सुन रहा था तो शिव पुराण सुनाने वाले  महान महापुरुष ने कहा था की विष्णु की और ब्रह्मा दोनों भगवान् विष्णु की शक्ति से उत्पन्न हुए हैं।  (साक्ष्य: पवित्र शिव पुराण, रुद्र संहिता, अधाय 6 और 7, गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित)। इस पुस्तक के तीसरे स्कन्द में लिखा है की देवी इन तीनो की माता हैं। ये तीनो नश्वर है शाश्वत नहीं है। इतना सुनने के बाद ऋषि जी के पास कोई उत्तर नहीं था अर्थ निरुत्तर थे।  ऋषि जी क्रोधित हो उठे और कहा की तुम कौन हो? और तुम्हारे माता पिता का क्या नाम है? कविर्देव के उत्तर देने से पहले ही भक्तो ने उनका परिचय दे दिया की ये बुनकर नीरू का पुत्र है। अब ऋषि जी और भी तिलमिला उठे और कहने लगे की एक तुच्छ जाती का बच्चा मुझसे प्रश्न करने के लिया आया है। और तुम्हे प्रवचन सुनने के लिए आने किसने दिया है? भगवान् भी तुम छोटी जाती वालों की तरफ नहीं देखता है और तुम इतनी बातें कर रहे हो। 

और तुमने ये कंठी की माला गले में कैसे डाल रखी है कौन है तुम्हारे गुरु? कबीर साहेब जी कहते हैं जैसे आपके गुरु हैं वैसे ही मेरे भी गुरुदेव हैं। अब ऋषि के क्रोध की कोई सीमा नहीं रही और कहने लगे की मैं तुम्हारी शिकायत हमारे गुरुदेव जी से करूंगा और तुम्हे हमारा और हमारे गुरुदेव के अपमान करने के लिए दण्डित करवाऊंगा। 

यह कहकर ऋषि जी वहां से चले गए। 

आश्रम में जाकर उस शिष्य ने स्वामी रामानंद जी से शिकायत की की नीरू बुनकर के लड़के ने उनको और उनके गुरुदेव यानी स्वामी रामानंद को अपमानित किया है। तब स्वामी रामानंद जी मुस्कुराये और बोले ठीक है मैं कल उन्हें यहाँ बुलाता हूँ और उन्हें सबके सामने दण्डित करता हूँ। 

स्वामी रामानंद जी की गुप्त बात का खुलासा –

अगली सुबह कबीर साहेब को पकड़ने के लिए दस अज्ञानी व्यक्ति आये और उन्हें स्वामी रामानंद के आश्रम में ले गए।  वहां ले जाने के बाद उन्हें स्वामी रामानंद जी के समक्ष पेश किया गया। रामानंद जी जो अपनी कुटिया में बैठे हुए थे अब उसे देख कर अपनी कुटिया का पर्दा आगे लगा लिया जैसे की उन्होंने उसे आते देखा ही नहीं और परदे के पीछे खड़े हो गए। वह यह प्रतीत करना चाहते थे की स्वामी जी छोटी जाति के लोगो को देखना पसंद नहीं करते हैं। और वहीँ से बोले की आप कौन हैं और आपकी जाति कौन सी है? ये सुनकर भगवान् कबीर ने उत्तर दिया की –

रामानंद अधिकार सुनि, जुलहा अक जगदीश। दास गरीब बिलंब ना, ताहि नवावत शीश।।407।।

रामानंद कूं गुरु कहै, तनसैं नहीं मिलात। दास गरीब दर्शन भये, पैडे लगी जुं लात।।408।।

पंथ चलत ठोकर लगी, रामनाम कहि दीन। दास गरीब कसर नहीं, सीख लई प्रबीन।।409।।

आडा पडदा लाय करि, रामानंद बूझंत। दास गरीब कुलंग छबि, अधर डाक कूदंत।।410।।

कौन जाति कुल पंथ है, कौन तुम्हारा नाम। दास गरीब अधीन गति, बोलत है बलि जांव।।411।।

जाति हमारी जगतगुरु, परमेश्वर पद पंथ। दास गरीब लिखति परै, नाम निंरजन कंत।।412।।

रे बालक सुन दुर्बद्धि, घट मठ तन आकार। दास गरीब दरद लग्या, हो बोले सिरजनहार।।413।।

तुम मोमन के पालवा, जुलहै के घर बास। दास गरीब अज्ञान गति, एता दृढ़ विश्वास।।414।।

मान बडाई छांडि करि, बोलौ बालक बैंन। दास गरीब अधम मुखी, एता तुम घट फैंन।।415।।

तर्क तलूसैं बोलतै, रामानंद सुर ज्ञान। दास गरीब कुजाति है, आखर नीच निदान।।423।।

कबीर परमेश्वर (कविर्देव) जी ने बहुत ही सहज और मीठे स्वरों में जबाब दिया की

महके बदन खुलास कर, सुनि स्वामी प्रबीन। दास गरीब मनी मरै, मैं आजिज आधीन।।428।।

मैं अविगत गति सैं परै, च्यारि बेद सैं दूर। दास गरीब दशौं दिशा, सकल सिंध भरपूर।।429।।

सकल सिंध भरपूर हूँ, खालिक हमरा नाम। दासगरीब अजाति हूँ, तैं जूं कह्या बलि जांव।।430।।

जाति पाति मेरे नहीं, नहीं बस्ती नहीं गाम। दासगरीब अनिन गति, नहीं हमारे नाम।।431।।

नाद बिंद मेरे नहीं, नहीं गुदा नहीं गात। दासगरीब शब्द सजा, नहीं किसी का साथ।।432।।

सब संगी बिछरू नहीं, आदि अंत बहु जांहि। दासगरीब सकल वंसु, बाहर भीतर माँहि।।433।।

स्वामी सृष्टा मैं, सृष्टि हमारै तीर। दास गरीब अधर बसूं, अविगत सत्य कबीर।।434।।

पौहमी धरणि आकाश मैं, मैं व्यापक सब ठौर। दास गरीब दूसरा, हम समतुल नहीं और।।436।।

हम दासन के दास हैं, करता पुरुष करीम। दासगरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम।।439।।

सुनि रामानंद राम हम, मैं बावन नरसिंह। दास गरीब कली कली, हमहीं से कृष्ण अभंग।।440।।

हमहीं से इंद्र कुबेर हैं, ब्रह्मा बिष्णु महेश। दास गरीब धरम ध्वजा, धरणि रसातल शेष।।447।।

सुनि स्वामी सति भाखहूँ, झूठ हमरै रिंच। दास गरीब हम रूप बिन, और सकल प्रपंच।।453।।

गोता लाऊं स्वर्ग सैं, फिरि पैठूं पाताल। गरीबदास ढूंढत फिरूं, हीरे माणिक लाल।।476।।

इस दरिया कंकर बहुत, लाल कहीं कहीं ठाव। गरीबदास माणिक चुगैं, हम मुरजीवा नांव।।477।।

मुरजीवा माणिक चुगैं, कंकर पत्थर डारि। दास गरीब डोरी अगम, उतरो शब्द अधार।।478।।

पंडित रामानंद जी आप अगर मेरी जाति जानना चाहते हैं तो मैं आपको बताता हूँ की मैं जगतगुरु हूँ। (वेदों में वर्णित है की भगवान् कबीर जगतगुरु हैं ये ही वे गुरु हैं जो सारी की सारी सृष्टि को ज्ञान प्रदान करते हैं ) अगर आप मेरा पंथ जानना चाहते हैं तो मैं आपको ये भी जरूर बताऊंगा की मेरा पंथ क्या है? मेरा पंथ तो वह परमेश्वर हैं जो सर्वोच्च हैं। मैं तो उनका आदेश पाकर परमेश्वर का मार्ग दिखने के लिए आया हूँ। जिन्होंने अनगिनत करोड़ो ब्राह्मणो को बनाया है। और वे जिन्हे वेदो में कविर्देव, कविर्गिरि जैसे नामो से भी सम्बोधित किया जाता है। 

यहाँ हम ईश, ईश्वर और परमेश्वर के अंतर को समझेंगे –

1 ब्रह्म/क्षर को ही ईश कहा गया है जो इक्कीस ब्राह्मणो के मालिक हैं। 

2 परब्रह्मा/अक्षर पुरुष – को ही ईश्वर कहा गया है ये सात ब्रह्मण्डों का स्वामी है। 

3 पूर्णब्रह्मा/परम अक्षर पुरुष – इसी रूप को परमेश्वर या भगवान कहा गया है। यही तो है तो अनंत ब्रह्मांडो का स्वामी है। इसी पर कबीर जी ने स्वामी रामानंद जी से कहा था की मेरा केवल एक ही है उस परमेश्वर को प्राप्त करना। जिसे दिखने के लिए मैं यहाँ आया हूँ। 

गीता के अध्याय 15 में श्लोक 17 में लिखा गया है की इम्पेरिशबल ईश्वर कोई और है वह तो केवल तीनो लोको में प्रवेश करके सभी का भरण पोषण करते हैं। उन्हें ही हम परम परमेश्वर कहते हैं। 

और मैं वही परमेश्वर हूँ यह सुनकर स्वामी रामानंद जी क्रोधित हो उठे और और कबीर साहेब को गाली देने लगे। और परम परमेश्वर कबीर साहेब को भला बुरा कहते हुए बोले की अरे तुच्छ मानव इतनी बड़ी बाते कर रहा है तुम एक छोटी जाति के हो और खुद को भगवान् मान रहे हो। 

कबीर साहेब बहुत ही विनम्रता से बोले की हे गुरुदेव! आप मेरे गुरु हैं। और आप मुझे गाली दे रहे हैं मैं इसका बुरा नहीं मान रहा हूँ लेकिन मैं फिर भी आपसे यही कहूंगा की मैं ही परमेश्वर हूँ। मैं ही वह पूर्ण ब्रह्मा हूँ इसमें कोई संदेह नहीं हैं। यह सुन कर स्वामी रामानंद जी और भी गुस्सा हो गए और अपने शिष्यों से कहने लगे की यह एक लम्बी कहानी है इसे यहाँ से उठा लो मेरा अभी कुछ कार्य बाकी है। 

मैं पहले अपना धार्मिक कार्य करूंगा तत्पश्चात इससे निपटूंगा। लेकिन हाँ तब तक इसे बैठा कर रखना स्वामी रामानंद जी ने अपने शिष्यों को आदेश देते हुए कहा। और वह अपने उस धार्मिक कार्य में जुट गए। अब वह धार्मिक कार्य कौनसा था यह भी जान लीजिये उनके पास भगवान विष्णु जी की एक पत्थर या काल्पनिक मूर्ति थी जिसे वे रोजाना उसके वस्त्र उतार कर नहलाते थे।

फिर उन्हें किसी साफ़ कपडे से साफ़ करके उन्हें दोबारा वस्त्र पहनाने का काम करते थे। इस दौरान उनके कार्य करने का तरीका यह था की पहले कपड़े फिर गले में माला और सबसे बाद में मुकुट पहनना होता है लेकिन उस दिन स्वामी रामानंद जी यह करना भूल गए की श्री विष्णु जी की मूर्ति को गले में माला भी पहननी है उन्होंने कपड़े पहनाकर उसके बाद सीधा ही मुकुट पहना दिया। 

अब वे चिंतित हो गए की माला कैसे पहनाएं क्योकि माला को तो न ही मुकुट के ऊपर से पहना नहीं सकते हैं क्योकि अगर माला को मुकुट के ऊपर से पहनाएंगे तो पूजा भंग हो जाएगी और यदि माला नहीं पहनाई तो पूजा पथ का कार्य अधूरा रह जायेगा जो की घोर अपराध के समान पाप है। उस दिन स्वामी रामानंद जी अपने को बहुत ही कोस रहे थे और कह रहे थे की हे भगवान् आज मुझसे यह क्या गलती हो गई है की आप मुझे ये सजा दे रहे हैं।  मैं हमेशा ही बहुत ही सूझ बुझ के साथ यह कार्य करता हूँ और कोई गलती भी नहीं होती लेकिन आज इतनी बड़ी गलती जिसका मेरे पास कोई उपाय नहीं है और चिंतित हो उठे कि ठाकुर जी को आखिर माला कैसे पहनाई जाये। 

वे मन ही मन बहुत ही परेशान लग रहे थे। कविर्देव (भगवान् कबीर) परदे के पीछे बैठे हुए ये सब देख रहे थे और उन्होंने वहीँ से आवाज लगाई की गुरुदेव आप ठाकुर जी को यह माला न तो मुकुट के ऊपर से पहना सकते हैं और अगर नहीं पहनाएंगे तो आपको पाप लगेगा।  क्योकि मुकुट के ऊपर से पहनाने से आपकी पूजा भ्रष्ट हो जाएगी और नहीं पहनाएंगे तो आप का आज का कार्य अधूरा रह जायेगा दो ही तरफ आपके लिए मुसीबत है। 

आप इस माला की गांठ खोल कर ठाकुर जी के गले में पहना सकते हैं और बाद में गाँठ बांध दीजियेगा।  इससे न तो आप मुकुट के ऊपर से पहनाना पड़ेगा और न ही आपको चिंतित होना पड़ेगा।  यह सुनकर स्वामी रामानंद जी एक दम से परदे को हटाकर कबीर परमेश्वर को गले लगा लेते हैं और कहते है की आप ही सच्चे परमेश्वर हैं और मैं एक तुच्छ सा ब्राह्मण आपको पहचान नहीं पाया जो मेरे सामने एक बच्चे के रूप में थे।

हे परम परमेश्वर मुझे क्षमा करें और मेरा सच्चा मार्गदर्शन करें। अब स्वामी रामानंद जी इस सोच को भुला चुके थे की वे जिस बच्चे को गले लगा रहे हैं वह एक निची जाति का बच्चा है अब तो बस वे अपने परमेश्वर को गले लगाए हुए थे। अब वे उन सभी ढकोसलों से परे थे जो मनुष्य ने अपने स्वाभिमान को बनाये रखने और मानव का मानव से अंतर बताने वाले थे। अब तो वे सिर्फ परमेश्वर की शरण में आने के लिए इच्छा व्यक्त कर रहे थे। 

बोलत रामानंदजी, हम घर बडा सुकाल। गरीबदास पूजा करैं, मुकुट फही जदि माल।।479।।

सेवा करौं संभाल करि, सुनि स्वामी सुर ज्ञान। गरीबदास शिर मुकुट धरि, माला अटकी जान।।480।।

स्वामी घुंडी खोलि करि, फिरि माला गल डार। गरीबदास इस भजन कूं, जानत है करतार।।481।।

ड्यौढी पडदा दूरि करि, लीया कंठ लगाय। गरीबदास गुजरी बौहत, बदनैं बदन मिलाय।।482।।

उसके बाद स्वामी रामानंद जी बहुत ही विनम्रता के साथ कहते हैं की हे भगवन अपने मुझसे झूठ क्यों कहा था? इस पर कबीर जी कहते हैं की मैंने आपसे क्या झूठ कहा है ऋषिवर। स्वामी रामानंद जी कहते हैं की अपने अभी कुछ समय पहले कहा था की मैंने आपको दीक्षा दी है। लेकिन प्रभु मैंने तो आपको कोई दीक्षा नहीं दी यह झूठ नहीं है तो और क्या है?

कबीर साहेब जी मुस्कुराते हुए बोले की मैं सच कह रहा हूँ अपने मुझे दीक्षा दी है। यदि आपको याद हो तो आप एक दिन पांच-गंगा घाट पर सुबह – सुबह अँधेरे में स्नान करने के लिए गए थे और आपकी खड़ाऊ जो सीढ़ियों पर चलते हुए एक बच्चे के सिर में लगी थी और वो बच्चा रोने लगा था और अपने उसे अपनी गोद में उठाकर अपने गले से कंठ निकलकर उस बच्चे के गले में डालकर उसके सर पर हाथ रखकर कहा था की बेटा बोलो “राम-राम” उस समय उसे बच्चे के रूप में मैं ही लेटा हुआ था तब मैं ढाई साल के बच्चे के रूप में था

अब आप ही बताइये ऋषिवर एक ढाई साल के बच्चे को क्या पता होता है। तो आपने ही मुझे दीक्षा प्रदान की और आप ही मेरे गुरुदेव हुए ना। यह कहकर और अच्छी तरह से समझने के लिए कबीर साहेब ने अपने आप को ढाई साल के बच्चे के रूप में ढाल लिया और एक नौकर की चारपाई पर बैठ गए। यह देख स्वामी रामानंद जी इधर उधर देखने लगे और अपनी आँखों को रगड़ने लगे की मैं ये क्या देख रहा हूँ कहीं मेरी आंखे मुझे धोखा तो नहीं दे रही हैं। फिर कबीर साहेब अपने उसी रूप  5 वर्ष के बच्चे के रूप में आ गए। 

मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परबेश। गरीबदास गति को लखै, कौन वरण क्या भेष।।483।।

यह तौ तुम शिक्षा दई, मानि लई मनमोर। गरीबदास कोमल पुरूष, हमरा बदन कठोर।।484।। 

परम परमेश्वर (भगवान कबीर) ने स्वामी रामानंद जी को सतलोक की यात्रा करवाई। 

सुनी बच्चा मैं स्वर्ग की कैसँ छँदौँ रीति। गरीबदास गुदरी लगी, जनम जात बीत गई।।४री६ ।।

च्यारि मुक्ति बैकुंठ मैं, जिन की मोरै चाह। गरीबदास घर अगम की, कैसां पाऊं थाह।।487 ।।

हेम रूप जहाँ धरणी है, रतन जड़े बौह शोभ। गरीबदास बैकुंठ कूं, तन मन हमरा लोभ।।488 ।।

शंख चक्र गदा पदम हैं, मोहन मदन मुरारि। गरीबदास मुरली बजाई, सुरगलोक दरबारि .489 ।।

दूधौं की नदियां बगान, सेत वृक्ष सुभान। गरीबदास मंदल मुक्ति, सुरगापुर अस्थान।।490 ।।

रतन जदौ मन हैं, गण गंधर्व सब देव। गरीबदास उस धाम की कैसँ छाडूँ सेव 1491 ।।

ऋग युज साम अथर्वणं, गावँ चारौं वेद। गरीबदास घर अगम की, कैसियन जानो भेद।।492 ।।

च्यारि मुक्ति चितवन शुरू, कैसँ बंचुन ताहि। गरीबदास गुप्तारगति, हमकूँ द्यो समझाय।।493 ।।

सुरग लोक बैकुंठ है, यासँ परै और। गरीबदास षट्शास्त्रा, च्यारि बेदकी दौर।।494 ।।

च्यारि बेद गावँ तिसँ, सुरनर मुनि मिलाप। गरीबदास धु्रव पोर वही, मिटि गया तीनुन ताप।।495 ।।

प्रहलाद गया तिस लोककं, सुरगा पुरी समूल। गरीबदास हरी भक्ति की, मैं बंचत हूँ धूल।।496 ।।

बिंदावन चला तिस लोककं, सुरगा पुरी समूल। गरीबदास उस मुक्ति कूं, कैसियन जाऊं भूल।।497 ।।

नारद ब्रह्मा तिस रतन, गावण शेष गणेश। गरीबदास बैकुंठ संत, और परै को देश।।498 ।।

सहंस अखासी जो जपण, और तेतीसौं सेव। गरीबदास जासँ परै, और कौन है देव।।499 ।।

सुनीति पूर्ण ब्रह्म मूल गति, कहि समझौं तोहि /गरीबदास भगवान कूं, राधा जगत समोहि ..।। ।।

तीन लोक के जीव सब, विषय वास भरमाय। गरीबदास हमकूं जपं, तिसकूं धाम दिखाय।।५०१ ।।

जो देखैगा धाम क्यूं, सो जानत है मुझे। गरीबदास तोसँ कहुँ , सुनी गायत्री गुज़. -502 ।।

कृष्ण विष्णु भगवान कूं, जहेदयँ हैं जीव। गरीबदास त्रिालोक प्रथम, काल कर्म शिर शीव।।503 ।।

सुनी स्वामी तोसँ कहूँ, अगम दीप की सैल। गरीबदास पूठे के बाहर, पुस्तक लादे बैल।।504 ।।

पौहमी धरनी अकाश थंभ, चलसी चंदर सूर। गरीबदास राज बिरजकी, कहाँ रहैगी धूर।।505 ।।

तरयण त्रलोक सब, चलत इन्द्र कुबेर। गरीबदास सब जात हैं, सुरग पटाल सुमेर।।506 ।।

च्यारि मुक्ति बैकुठ यार्ड, फना हुआ कई बार। गरीबदास अलप रूप मघ, क्या जानकर संसार।।507 ।।

कहौ स्वामी केस रहौगे, चौडा भुवन बिहँद। गरीबदास बीजक कह्या, चलत प्राण और पिंड।।508 ।।

सुन स्वामी एक शक्ति है, अरधंगी कार। गरीबदास बीक तान, अनंत लोक सिंघार।।509 ।।

जैसेका तासा रहै, परलो फना प्रान। गरीबदास उस शक्तिकुं, बार बार कुरबानं।।५१० ।।

कोटि इन्द्र ब्रह्मा जहाँ, कोटि कृष्णा कैलास। गरीबदास शिव कोटि हैं, करौ कौंकीकीशा।।५११ ।।

कोटि विष्णु जहाँ बसत हैं, उस शक्ति के धाम। गरीबदास गुल बौहत हैं, अलफ बस्त निहदें।।५१२ ।।

शिव शक्ति जासै हुई, अनंत कोटितर। गरीबदास उस अलफाकुन, लखै सो होय करतार।।513 ।।

अलफ हमारा रूप है, दम देही नहीं दंत। गरीबदास गुलसैन परै, चलना है बिन पंथ।।514 ।।

बिना पंथ उस कंटकै, धाम चलन है मोर। गरीबदास गति ना कोई, संख सुरग पर डोर।।515 ।।

संख सुरगपर हम बसर, सुनी स्वामी इट सैंण। गरीबदास हम अलफ हैं, यूँ गुल फंट फांन।।516

जो ता कह्या सौ मैं लहया, बिन देखै नहीं धीज। गरीबदासमी कहै, जहाँ अलफ वौ बीज।।५१। ।।

अनंत कोटि ब्रांड फान, अनंत कोटि उदगम। गरीबदासमी कहै, कहां अलफ दीदार।।५१ कह ।।

हद बेहद कहीं ना कहीं, ना कहीं थरपी ठौर। गरीबदास निजी ब्रह्मकी, कनन धाम वह पौर।।519 ।।

चल स्वामी सर पर चलकर, गंग बाण सुन ज्ञान। गरीबदास बैकुंठ बट, कोटि कोटि घट ध्यान।।520 ।।

तनन कोटि वैकुंठ हैं, नकली सरवर संगीत। गरीबदासमी सुनर, जात अनन्त जुग पास ैं५२१ ।।

प्राण पिंड पुरमण धसौ, गया रामानंद कोटि। गरीबदास सर सुरगमर, रहौ शब्दकी ओट।।522 ।।

तों वहाँ चित चक्रित भया, देखि फजल दरबार। गरीबदास सिजदा किया, हमने पाया दीदार।।523 ।।

तुम स्वामी मैं बाल बुद्धि, भर्म कर्म किए नाश। गरीबदास पूर्ण ब्रह्म तुम, हमर दृढ़ विश्वास।।524 ।।

सुन्नबेसुन्न संत तुम परै, उरांव से हमर तीर। गरीबदास सरबंगमँ, अविगत पुरुष कबीर।।525 ।।

कोटि कोटि सिजदे करर, कोटि कोटि प्रणाम। गरीबदास अनहद अधर, हम परसँ तुम धाम।।५२६ ।।

सुनीति एक गलियाँ ग़ज़ल, तिल प्रशंसा पल जोरि.गरीबदास सर गगन मैं, सूरज अनंत करोरि।।527 ।।

सहर अमान अनन्तपुर, रिमझिम रिमझिम होयी। गरीबदास उस नगर का, मरम न जा न कोई .५५२ ।।

सुनीति कैसैन लखौ, कहि समझौं तोहि। गरीबदास बिन पर उडं, तन मन शीश न होय।।५२ ९।

रवनपुरी एक चक्र है, तही धनजय बाय। गरीबदास जीत जन्म, यूँ लेट गई।। 530 ।।

आसन पदम लगायकर, भिरंग नाद को खैंची। गरीबदास अचवन करै, देवदत्त को ऐचि।।५३१ ।।

काले ऊन कुलीन रंग, जाके दो फुन धार गरीबदास कुरंभ शिर, तास करे उद्गार।।532 ।।

चिश्में लाल गुलाल रंग, तीनि गिरह नभ पेंच। गरीबदास वह नागनी कूँ, हौने देवे रेच।।533 ।।

कुंभक रेचक सब करै, ऊन करत उदगार। गरीबदास वो नागनी कूँ, जीतै कोई खिलार।।534 ।।

कुंभ भरै रेचक करै, फिर टुटत है पौन। गरीबदास गगन मण्डल, नहीं होत है रौन ।। 535 …

आगे घाटी बंद है, ईग्लानापिंगला दोय। गरीबदास सुषमन खुला, तास मिलावा होय।।५३६ ।।

चंद के घर सूर रखि, सूरज के घर चंद। गरीबदास मध्य महल है, तहाँ वहाँ अजब आनन्द।।537 ।।

त्रिअवनी का घाट है, गंग जमन गुप्तातर। गरीबदास परबी सिद्धी, तहाँ सहंस प्रमुख धारें।।५३बी ।।

मध्य किवारी ब्रह्मरेंद्र, वा खोलत नहीं सी। गरीबदास सब जोग की, पृष्ठ शुद्र होय।।539 ।।

आसन सम्पत सुधि कर, गुफा गिरद गति ढोल। गरीबदास पल पलड़ै, हीरे मानिक तोल।।540 ।।

पान अपान समान सुध, मंदा चल महकंत। गरीबदास तठी बगै, तो दीपक बात बुँजत।।५४१ ।।

घंटा टुट्टे तालमेल, संख निताए टेर। गरीबदास मुरली मुक्ति, सुनी चढ़ी हंस सुमेर।।542 ।।

खुलहै खिरकी सहज धुनि, दम नहीं खांच अतीत। गरीबदास एक सैन है, तजी अनभय छंद गीत।।५४३ ।।

धीरैं धीरँ दा दा हैं, सुरग चढैंगे सोय। गरीबदास पग पंथ बिन, ले राखौं कहाँ तोय।।544 ।।

सुन स्वामी सीढी बिना, चढौं गगन कैलास। गरीबदास प्राणायाम तजी, नट तोरत साँस लेन। 545 ।।

गली गली गलतान है, सहर सलेमाबाद

और फिर स्वामी रामानंद जी कहते हैं की हे परमेश्वर हम आपको पहचानने में असमर्थ रहे क्योंकि आप हमारे सामने आये ही ऐसी वेश भूषा में थे जिसमे आपको पहचान पाना बहुत ही कठिन था।  अपने एक गरीब, नीच और तुच्छ जात में अपने जन्म लिया जिसकी वजह से हम आपको पहचान ना सके।  हम अज्ञानी मानव हैं जो हमेशा ही अज्ञान के मार्ग पर चलकर भगवान् को पाने की कोशिश करते हैं और उसे असफल हो जाते हैं और तो और हम अज्ञानियों ने आपसे बहस की और आपको भगवान् मानने से इंकार कर दिया और आपका तिरस्कार भी किया।  इसके लिए हे परमेश्वर हमें क्षमा कर दीजिये हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई है। 

हे परम परमेश्वर, भगवान् कबीर साहेब जी हमें अपना अज्ञानी बालक समझ कर माफ़ कर दीजिये और हमें अपनी शरण में ले लीजिये। 

अब कबीर साहेब जी स्वामी रामानंद जी से प्रश्न करते हैं और कहते हैं की स्वामी जी आप किसकी और कैसे पूजा करते हैं? स्वामी रामानंद जी कहते हैं की हे भगवन में वेदों और गीता जी के अनुसार साधना करता हूँ। और भगवान विष्णु जी की पूजा करता हूँ। फिर कबीर साहेब उनसे पूछते हैं की स्वामी जी अगर आप वेदों और गीता की साधना के आधार पर कहा जायेगे?

स्वामी जी कहते हैं की मैं इनके आधार पर स्वर्ग में जाऊंगा। कबीर साहेब फिर से प्रश्न करते हैं की चलिए आप स्वर्ग में भी चले गए हैं तो वहां आप क्या करेंगे? स्वामी जी ने उत्त्तर दिया की वहां पर मेरे सर्वश्रेष्ठ भगवान् विष्णु जी वहां पर विराजमान है मैं हर रोज उनके अलौकिक दर्शन करूंगा। मैं यह भी सुना है की वहां पर दूध की नदी है जो बेहतर है और मुझे वहां पर कोई तनाव भी महसूस नहीं होगा।

परमेश्वर कबीर साहेब जी कहते हैं कि स्वामी जी आप स्वर्ग में कितने वर्ष तक रहोगे? यह प्रश्न सुनकर स्वामी रामानंद चिंतित हो गए और क्योकि एक विद्वान थे तो वे समझ गए की परमेश्वर कुछ ओर इशारा कर रहे हैं –

स्वामी जी ने कहा की मैंने मेरे जीवन में जो साधना की है उसी जो भी कमाई है में उसी के अनुसार रहूंगा। परमेश्वर कबीर साहेब जी ने कहा की स्वामी जी आप ये साधना और पूजा अनंत बार कर चुके हैं और आपको इससे मुक्ति भी नहीं मिलेगी और आपकी जन्म और मृत्यु का चक्र ऐसे ही चला रहेगा। आप विष्णु जी के पास जाना चाहते है ठीक है लेकिन ब्रह्मा, विष्णु और महेश के उपासक है वो स्वर्गलोक तो चले जाते हैं लेकिन जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो पाते हैं। वो ऐसे ही 84 लाख प्राणियों के जीवन को जीते रहेंगे और मृत्यु को प्राप्त होते रहेंगे।  एक दिन ऐसा भी आएगा की ब्रह्मलोक में जिस स्वर्ग का निर्माण हुआ है वह भी नष्ट हो जायेगा। 

गीता जी के आदित्य 8 श्लोक 16 में वर्णित है की स्वामी रामानंद जी एक बहुत बड़े विद्वान व्यक्ति थे जिनका वेदो और शास्त्रों में कोई तोड़ नहीं था।  उन्होंने श्लोको को उँगलियों पर रट रखा था। इस पर स्वामी रामानंद जी ने कहा की हाँ भगवन ये सिर्फ लिखा गया है।  कबीर साहेब फिर से स्वामी जी से प्रश्न करते हुए कहते हैं की हे गुरुदेव, आप कहाँ रहोगे? यह सुनकर रामानंद जी सोचने लगे। तभी परमेश्वर कबीर साहेब ने एक और प्रश्न कर दिया और पूछा की स्वामी जी गीता का ज्ञान किसने सुनाया है ? स्वामी रामानंद जी कहते हैं की श्री कृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था। 

परमेश्वर कबीर जी ने कहा, “स्वामी जी, संस्कृत महाभारत खंड दो में (पृष्ठ संख्या 1531) । एक और 667-नया) इस में श्री कृष्ण जी अर्जुन से कहते हैं की अर्जुन मुझे गीता का वह ज्ञान अब ज्ञात नहीं है और ना ही मैं अब इसे दोबारा सुना सकता हूँ। इसके सारे  साबुत कबीर साहेब ने प्रस्तुत किये हैं। 

गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में, गीता (ब्रह्म) के ज्ञान के दाता कह रहे हैं कि- 

गीता अध्याय 8 श्लोक 13

ओम् इति एकाक्षरम् ब्रह्म, व्याहरन् माम् अनुस्मरन्,

: प्रयाति त्यजन् देहम् : याति परमाम् गतिम् ।। 13।।

अनुवाद गीता के कथावाचक, ब्रह्म या काल कह रहे हैं की मेरे ब्रह्म, का अगर आप सुमिरन करना चाहते हैं तो केवल एक ही शब्द से कर सकते हैं और वह है ॐ। जो भी उपासक या उपासना करने वाला अपने शरीर को छोड़ते समय तक मेरे इस मात्रा का उच्चारण करेगा वही सर्वोच्च अवस्था यानि मुक्ति प्राप्त करेगा। 

अर्थ श्री कृष्ण जी के शरीर में भूत की तरह प्रवेश करके ब्रह्म जो की ज्योति निरंजन काल है। उनके पास तो हज़ार भुजाये हैं वे अपने भक्त या उपासक से कहते हैं की अगर तुम मृत्यु तक मेरा सुमिरन करोगे और मेरे मंत्र का जप करोगे तो मैं तुम्हे अवशय ही मुक्ति दूंगा। मेरा मात्र एक ही मंत्र है और वह ॐ है। 

गीता के अध्याय 8 के श्लोक 5 से 7और 13 में कहा गया है कि इसमें गीता का ज्ञान देने वाले ब्रह्म जी कहते हैं की जो भी मनुष्य अपने जन्म से लेकर अपनी आखिरी सांस तक मेरे मंर्तोंउच्चारण से मेरी सच्ची साधना करता हैं केवल वही मझे प्राप्त कर सकता हैं और कोई नहीं। इसलिए आप ॐ नाम का जप करो और निरन्तर करते रहो ताकि तुम जन्म मृत्यु के इस चक्र से मुक्ति पाना चाहे हो। 

गीता के अध्याय 8 में श्लोक 6 में वर्णित है की एक व्यक्ति जो अपने शरीर को छोड़ता है और अपने आखरी समय में भगवान् को याद करता है और उसे अकेले ही भगवान् के पास जाना होता है। भगवान् अध्याय 8 में श्लोक 8 से 10 तक गीता का ज्ञान देते हुए कहते हैं की ब्रह्मा के अलावा पूर्ण परमात्मा भी हैं।  जब मनुष्य साधना करता हुआ अपना शरीर त्यागता है तो वह केवल पूर्ण परमात्मा के पास ही जाता है यानि पूर्ण परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।  वही हैं जो व्यक्ति को पूर्ण मुक्ति, शांति सतलोक प्रदान करते हैं। इसलिए आप उस ईश्वर की शरण में जाने के लिए सुमिरन करो मैं भी ब्रह्मा, जो गीता का कथाकार हूँ उन्ही की शरण में हूँ। (गीता अध्याय 18 श्लोक 62-66 और अध्याय 15 श्लोक 4)

स्वामी रामानंद जी सत्य को पाकर बहुत ही खुश अवस्था में थे। अब सब कुछ उनकी आँखों के सामने था जिसे वे साफ़ साफ़ देख सकते थे। यह सब जानने के बाद वे अपनी उँगलियों को अपने दांतो के तले दबाने लगे और सारी सच्चाई को मान लिया। स्वामी रामानंद जी ने कहा की पुत्र तुमने अभी तक जो भी बताया है उसे जानकर मैं धन्य हो गया हूँ। जो शास्त्रों में लिखा है उनसे सही बता रहे हो हमें ऐसा ज्ञान किसी ने नहीं दिया है जैसा की तुमने प्रदान किया है। तब कबीर साहब जी ने बहुत ही विनम्र भाव में कहा की यह सब कुछ गीता में ही लिखा है जो अध्याय 8 श्लोक 8 से 10 और अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा गया है। 

ब्रह्मकाल जी (जो पवित्र गीता और वेदों के कथावाचक है) अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं की हे अर्जुन मैं तुम्हे उस भगवान् की शरण में जाने के लिए कह रहा हूँ जो सबके पालनहार है वही तुम्हारा उद्धार कर सकते हैं यानि वही तुम्हे मृत्यु से बचा सकते है। यदि आप उन्हें (अध्याय ४ श्लोक ३४) प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको उन संतो महात्माओं को खोजना होगा जो उस ईश्वर के बारे में सत्य जानते हैं और वही तुम्हे उन तक पहुंचने में तुम्हारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। आपको उनके चरणों में गिरना होगा अर्थात दंडवत प्रणाम करना होगा।  आपको उनसे शिष्टाचार और ईमानदारी का व्यव्हार करना होगा। ये सब आपको उन्हें प्रसन्न करने हेतु करना ताकि आप उनके प्रसन्न होने पर उनसे दीक्षा मांग सको। यदि तुम उनसे दीक्षा पाने में सफल हो जाते हो और उनसे दीक्षा प्राप्त कर लेते हो तो अवशय ही तुम मृत्यु से बच सकते हो अर्थात नहीं मरोगे। 

गीता के अध्याय १५ के मन्त्र १ से ४ में बताया गया है की यह दुनिया एक उलटे पेड़ के समान है ऊपर जो जड़ है वह आदि पुरुष यानी अनंत ईश्वर है और निचे शाखाओं के समान तीनो गुण है जिन्हे हम रजगुण-ब्रह्मा , सतगुण-विष्णु, और तमगुण-शिव के रूप में मानते हैं। मैं ब्रह्मकाल यानि इस सृष्टि के निर्माण करने वाले को पूर्ण तरह से नहीं जनता हूँ। और हम यहाँ गीता के ज्ञान के बारे में बात कर रहे हैं तो मुझे गई का पूर्ण ज्ञान भी नहीं है और पूर्ण ज्ञान देने में असमर्थ हूँ। उसके लिए आपको तत्वदर्शी संत को खोजना होगा जिसका वर्णन गीता के अध्याय ४ के श्लोक ३४ में किया गया है। तत्वदर्शी संत ही केवल तुम्हे सारी सृष्टि का ज्ञान देने में समर्थ हैं वही आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं। एक तत्वदर्शी संत ही स्मपुर्ण प्रकृति और देवताओं के बारे में सत्य ज्ञान दे सकता है। जो साक्षात् परमेश्वर का ही रूप माने जाते हैं अतः आपको उनको खोजने में कतई भी देर नहीं करनी चाहिए। उनसे प्राप्त ज्ञान को पाकर की गई साधना से मनुष्य मुक्त हो जाता है फिर उसे ना ही जन्म लेना पड़ता है और ना ही मृत्यु का भय रहता है। अर्थ जीने और मरने के इस चक्र से मुक्ति मिल जाती है। जो ईश्वर इस संसार रूपी वृक्ष का निर्माता है अर्थात निर्माणकर्ता है मैं भी उसी की शरण में हूँ। इसलिए आप हमेशा ही उस ईश्वर की पूजा करो ताकि सतलोक को प्राप्त कर सको। 

इस पर स्वामी रामानंद जी कहते हैं की पुत्र जो आप कह रहे हैं वह सत्य है। लेकिन मैंने यह पहले किसी से नहीं सुना है और न ही किसी ने हमे ऐसा ज्ञान दिया है और ना ही सतलोक के बारे में बताया है। अतः जो लिखा गया है वह भी तो सत्य है इसलिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मेरा दिल इसे स्वीकृति नहीं दे रहा है की आप सच बोल रहे हैं। 

कबीर साहेब स्वामी रामानंद जी से पूछते हैं की आप साधना कैसे करते हैं?

स्वामी रामानंद जी अपने उत्तर में कहते हैं की मैं अपने सम्पूर्ण शरीर को प्राप्त कर चूका हूँ मैं योग अभ्यास से कमल के भीतर से त्रिकुटी तक पहुंचता हूँ। यह सुनकर कबीर साहेब उनसे अनुरोध करते हैं की क्या आप एक बार त्रिवेणी तक पहुंच सकते हैं। यह सुनते ही स्वामी रामानंद जी ध्यान की अवस्था में चले गए और त्रिवेणी पहुंच गए।

जब स्वामी रामानंद जी त्रिवेणी में पहुंच गए तो वहां उनको तीन रस्ते दिखाई दिए। क्योकि प्रत्येक ब्रह्माण्ड में ब्रह्मलोक में प्रवेश करने के लिए तीन रस्ते बनाये गए हैं।  इसी तरह बीस ब्रह्मांडो से परे इक्कीस ब्रह्मांडो की व्यवस्था एक समान है। एक रास्ता ब्रह्माण्ड में बने तीन गुप्त जगहों की और जाता है जिनके बारे कोई भी नहीं जानता और ज्योति निरंजन यहाँ पर अपने तीन दिव्या रूपों में विराजमान हैं। 

फिर कबीर साहेब स्वामी रामानंद जी को आगे बढ़ने के लिए कहते हैं और पाते हैं की आगे ब्रह्मरंध्र है इसका दरवाजा खोलने के लिए स्वामी रामानंद जी अपने द्वारा जिस मंत्र का उच्चारण करते हैं लेकिन दरवाजा नहीं खुलता तब कबीर साहेब कहते हैं की ऋषिवर ये दरवाजा आपके लिए हुए नाम से नहीं खुल सकता इसके लिए आपको सतनाम लेने की आवश्यकता है और कबीर साहब ने सांस ही सांस में नाम का उच्चारण किया और ब्रह्मरंध्र का दरवाजा खुल गया। अब आप उस काल भगवान् के दर्शन करोगे जिसे तुम निराकार बताते हो और वो जो गीता में कहते हैं कि में काल भगवान् हूँ जो सबको खाऊंगा। 

वो कहते हैं की हे अर्जुन! मुझे कोई सुन नहीं सकता, मुझे कोई देख नहीं सकता क्योकि मैं कभी भी किसी के सामने नहीं आता हूँ। कबीर साहेब स्वामी रामानंद जी से कहते हैं की अब मैं यह सब कुछ तुम्हारी आँखों से ही दिखाऊंगा। 

सबसे पहले एक ब्रह्माण्ड में बने तीन गुप्त स्थानों जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश जी विराजमान है दिखाया। फिर द्वार से बहार निकलकर ब्रह्मलोक को पार करते हुए २१ ब्रह्माण्ड में ले जाते हैं। ब्रह्म काल उस स्थान पर ही अपनी नजर रखे हुए है जो ब्रह्मलोक से परे हैं।    

जो जटा कुंडली सरोवर या झील के ऊपर स्थित है जिससे कोई भी बच नहीं सकता। उन २१ ब्रह्मांडो में सबसे आखिरी स्थान ब्रह्मकाल का है जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपना रखा है। उन्हें आप वहां पर उस वास्तविक रूप में देख सकते हैं जो भयानक तो है ही और साथ में वास्तविक भी है।  

देखिये रामानंद जी आपके ईश्वर वहीँ पर विराजमान हैं जिन्हे आप निराकार कहते हैं या निराकार सम्बोधित करते हैं। योगियों ने केवल ॐ नाम की साधना की है उन्हें पाया नहीं। योगियों को इस साधना से स्वर्ग मिला, अलौकिक शक्तिया मिली, महान स्वर्ग भी मिला और फिर पशु का जीवन व्यतीत करने लगे क्योंकि उन्होंने पूर्ण ईश्वर को प्राप्त नहीं किया। ऐसा सब मानने लगे क्योकि पूर्ण ईश्वर की प्राप्ति किसी को हुई ही नहीं। और वो किसी की भी दिखाई नहीं दिए। इसीलिए उस पूर्ण परमात्मा को सबने निराकार बताया है।

यधपि वेदों में कहा गया है की वह भगवन के रूप में हैं। अब कबीर साहेब स्वामी रामानंद को आगे बढ़ने के लिए कहते हैं की अपने ब्रह्मकाल यानी उस पूर्ण परमात्मा के दर्शन कर लिए हैं जिन्हे आप निराकार कहते हैं आप आगे बढिये। स्वामी रामानंद जी कहते हैं की आगे तो कोई रास्ता ही नहीं है और काल है वह कैसे आगे बढे? तभी कबीर साहेब अपने सरनाम को सतनाम के साथ उच्चारण करने लगे और उनके उच्चारण मात्र से ही काल ने अपना सिर झुका लिया और और सिर के ऊपर एक दरवाजा था और वह खुल गया जो की सतलोक में जाने का रास्ता है जो परब्रह्म की गोद में प्रवेश करता है। आगे चलकर एक शुरू होती है जिसे भंवर गुफा के नाम से सम्बोधित किया जाता है। 

कबीर साहेब के निर्दोष भक्त जो पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने के लिए साधना करते हैं वो सब काल के सर पर अपने पैर रखकर आगे बढ़ते हैं ये काल उन भक्तो के लिए सीधी का काम करता है ताकि सब भक्त आगे बढ़ सकें। परब्रह्म के पास को पार करने के बाद कबीर साहेब स्वामी रामानंद जी की आत्मा को सतलोक में ले जाते हैं।  जैसे ही स्वामी रामानंद जी सतलोक में प्रवेश करते हैं तो वे कबीर साहेब यानि पूर्ण परमेश्वर भगवान् कबीर के वास्तविक रूप के दर्शन करते हैं जो की अलौकिक है।

यहाँ पर कबीर साहेब के शरीर की चमक इतनी है की अगर एक बाल कूप में करोड़ों सूरज और चन्द्रमा भी मिल कर रौशनी करें तो वह भी फीकी पद जाये। यह सब कुछ देख स्वामी रामानंद जी सोच में पद गए की ये सामने ईश्वर प्रतीत होते हैं और कबीर एक सेवक। लेकिन यह लोक बिलकुल अलग है और यहाँ पर ईश्वर भी बहुत ही प्रसन्न है। 

कबीर साहेब ने देखा की रामानंद जी कुछ सोच में पड़े हैं तो उन्होंने अपना भव्य और अलौकिक रूप दिखाया और उन्होंने उसी पांच साल के बच्चे का रूप धारण कर लिया और सिहांसन पर विराजमान हो गए। यह सब रामानंद जी की आत्मा देख रही थी की कबीर साहेब अपना रूप उसी बच्चे के रूप में धर लिया है जिस रूप में उन्हें पृथ्वी पर देखा था। यह सब दिखने के बाद कबीर साहेब ने स्वामी रामानंद जी की आत्मा को वापिस उनके शरीर में भेज दिया। आत्मा के शरीर में प्रवेश करते ही स्वामी रामानंद जी अपने ध्यान को भांग करते हैं और अपने सामने उसी पांच वर्ष के बालक के रूप में कबीर साहेब को देख कर कहते हैं की –

तहां वहाँ चित चक्रित भया, देखि फजल दरबार। गरीबदास सिजदा किया, हम पाये दीदार।।523।।

तुम स्वामी मैं बाल बुद्धि, भर्म कर्म किये नाश। गरीबदास निज ब्रह्म तुम, हमरै दृढ़ विश्वास।।524।।

सुन्नबेसुन्न सैं तुम परै, उरैं से हमरै तीर। गरीबदास सरबंगमैं, अविगत पुरूष कबीर।।525।।

कोटि कोटि सिजदे करैं, कोटि कोटि प्रणाम। गरीबदास अनहद अधर, हम परसैं तुम धाम।।526।।

बोलत रामानंदजी, सुन कबीर करतार। गरीबदास सब रूपमैं, तुमहीं बोलन हार।।556।।

तुम साहिब तुम संत हौ, तुम सतगुरु तुम हंस। गरीबदास तुम रूप बिन और दूजा अंस।।557।।

मैं भगता मुक्ता भया, किया कर्म कुन्द नाश। गरीबदास अविगत मिले, मेटी मन की बास।।558।।

दोहूँ ठौर है एक तूं, भया एक से दोय। गरीबदास हम कारणैं, उतरे हैं मघ जोय।।559।।

रामानंद जी कहते हैं की “हे परमेश्वर! हे कबीर परमात्मा! हे कबीर करतार अपने ही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण किया है। मात्र आप ही सर्वव्यापी भगवान् हैं। आप ही इस जग के पालनहार हैं। “

दहूँ ठोड़ है एक तूं, भया एक से दो। गरीबदास हम कारणे, आए हो मग जो।।

हे कबीर भगवान् आप ही तो पूर्ण परमात्मा हैं। आप दो रूपों में है एक मेरी आँखों के सामने और दूसरा सतलोक में जहाँ आप अपने वास्तविक रूप में विराजमान है। आप यहाँ हम जैसे अज्ञानी मानवों के लिए प्रकट हुए हैं ताकि आप हमें वास्तविक ज्ञान के मार्गदर्शन के द्वारा पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करवा सकें और जन्म मृत्यु के उस चक्र से मुक्त हो सकें। 

मैं भक्ता मुक्ता भया, कर्म कुण्द भये नाश। गरीबदास अविगत मिले, मिट गई मन की बांस।।

स्वामी रामानंद जी जो अपने जीवन के १०४ वर्ष पूर्ण कर चुके है वे उस पांच वर्ष के कबीर परमेश्वर (कविर्देव) की आराधना कर रहे हैं और कह रहे है की मैं आपका दास जो आज आजाद हो गया हूँ जो भटकन मेरे मन थी उसको भी शांति मिल गयी है। 

हे कबीर परमेश्वर मैंने आपके वास्तविक रूप के दर्शन से ही वास्तविक ज्ञान की जानकारी प्राप्त कर ली है। हे भगवान् कबीर , हे परमेश्वर पवित्र गीता और चरों वेद आपकी महिमा का ही गुणगान करते हैं।  ये कविर्देव ने स्वयं कहा है –

बेद हमारा भेद है, मैं बेदों में नाहीं। जिस बेद से मैं मिलूं, बेद जानते नाहीं।

इससे यह अभिप्राय है की यदि चारो वेदों में देखा जाये तो पूर्ण परमात्मा का ज्ञान मिलता है। यदि आप पूजा करके पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं तो केवल ब्रह ये ज्योति निरंजन तक ही पहुंच सकते हैं। यदि पर पूर्ण परमात्मा (कबीरदेव ) और तत्वज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको किसी तत्वांशी संत को खोजना होगा ताकि ताकि आप पूर्ण परमात्मा और सतलोक को प्राप्त करने के लिए उन्हें मार्गदर्शक के रूप में उन्हें अपना गुरुदेव माने ना की वेदो और गीता के आधार पर पूजा करके। 

ये तत्वांशी संत या तो स्वयं पूर्ण परमात्मा  का रूप हो सकते हैं या उनके द्वारा भेजे गए प्रतिनिधि। यदि आप पूर्ण शांति और पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको उनसे ही दीक्षा प्राप्त करनी होगी। 

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