महर्षि सर्वानंद जी और भगवान कबीर साहेब (परम परमेश्वर कविर्देव) के मध्य शास्त्रार्थ (वेदो और शास्त्रों की बहस)

महर्षि सर्वानंद जी और भगवान कबीर साहेब (परम परमेश्वर कविर्देव) के मध्य शास्त्रार्थ (वेदो और शास्त्रों की बहस)

एक समय की बात है जब सर्वानंद नाम के महर्षि हुआ करते थे। वे बहुत ही विद्वान ऋषि थे उन्हें शास्त्रों का बहुत ज्ञान था। यदि उनसे कोई शास्त्रार्थ करता था तो निश्चय ही हार जाता था। महर्षि सर्वानंद की पूज्य माता का नाम श्रीमती शारदा देवी था।

जो अपने पापों के कर्मो को भुगत रही थी यानी गंभीर बीमारियों से पीड़ित थी जो उन्हें अपने किये हुए पाप के कारण भुगतनी पड़ रही थीं। वह अपने दुःख और दर्द से निजात पाने के लिए हर संभव कोशिश करती थी जैसे – पूजाएं करवाना, भस्मे लगाना आदि।

अपनी शारीरिक पीड़ा को दूर करने के लिए वह वैद्य या डॉक्टर्स के पास गई और इलाज़ करवाया परन्तु उसकी शारीरिक पीड़ा का कोई निवारण न मिला। थक हार कर और हर संभव कोशिश करने के पश्चात् वह ऋषियों के पास गई और उनसे उपदेश भी लिया लेकिन कोई काम न आया। तब ऋषि-मुनियों से श्रीमती शारदा देवी जी से कहा की आप यह पिछले जन्मों में किये गए पाप के कर्मो का फल भोग रही है इससे आपको निजात नहीं दिलाई जा सकती और ना ही माफ़ किया जा सकता है। 

बेटी इसे तो आपको भुगतना ही पड़ेगा।  जिस प्रकार बलशाली बाली का वध श्री रामचंद्र जी के हाथों से हुआ था। बाली का वध श्री रामचंद्र जी के हाथों इसलिए हुआ था क्योंकि उन्होंने श्री कृष्ण जी के पैरों में तीर मारकर उनकी हत्या कर दी थी जो तीर बाली ने श्री कृष्ण पर चलाया था वह जरीला तीर था। बाली को अपने पापी कर्मो की सजा को भुगतना पड़ा क्योकि श्री कृष्ण जी की आत्मा जो श्री रामचंद्र जी के रूप में आई थी उन्होंने बाली को उनके पिछले पाप कर्मो की सजा के रूप में बाली का वध करके दी थी। 

कबीर साहेब के द्वारा महर्षि सर्वानंद की माता जी का कष्ट दूर करना

ऋषि-मुनियों और भक्तो के विचारों को सुनकर भक्तिमति शारदा देवी जी अपने निराश मन के साथ अपने घर आ गई और सोचने लगी की अब तो सारा जीवन इसी कष्ट के साथ जीना पड़ेगा। और जो मेरे कर्मो की सजा है वह तो वहन करनी ही पड़ेगी। बस अब तो श्रीमती शारदा जी अपने निराश मन से कष्टमयी जीवन व्यतीत करने लगी और अपनी मृत्यु का इंतज़ार करने लगी। 

भक्तिमति शारदा देवी के जीवन का मानो सुनहरा दिन आया जब एक रिश्तेदार ने उन्हें भगवान् कबीर साहेब का नाम लेने की सलाह दी और श्रीमती शारदा देवी ने उस रिश्तेदार के अनुरोध पर भगवान् कबीर साहेब (परमेश्वर कविर्देव) की साधना करके उन्हें प्राप्त कर लिया। भगवान् कबीर का नाम लेने के दिन से ही श्रीमती शारदा देवी के कष्ट दूर होना शुरू हो गए। और वह पूर्ण रूप से अपने कष्टों से मुक्त हो चुकी थी। क्योकि कबीर साहब पापों के शत्रु हैं 

यजुर्वेद के अध्याय 8 के मंतर 13 में कहा गया है की परमात्मा साधक के पाप को समाप्त करते हैं। भगवान् कबीर श्रीमती शारदा के समक्ष प्रकट होते हैं और उनसे कहते हैं की पुत्री, शारदा यह ख़ुशी तुम्हे मिल ही नहीं सकती थी अर्थात तुम्हारे भाग्य में केवल दुःख ही लिखे हुए थे। मैंने तुम्हे यह ख़ुशी भरा जीवन अपनी तरफ से प्रदान किया है देखो अब तुम्हारे पापों को मैंने ख़त्म कर दिया है। मैं ही पापों का विनाशक हूँ परमेश्वर प्रमाण देते हुए कहते हैं। 

आपके महान पुत्र महर्षि सर्वानंद जो वेदो और पुराणों के बहुत बड़े ज्ञाता हैं। जो शास्त्रों में बड़े बड़े ऋषि-मुनियों को धूल चटा देते हैं वह कहते हैं की भगवान् पापों को क्षमा नहीं कर सकते हैं। लेकिन पुत्री आप मुझसे उपदेश ग्रहण करके अपना कल्याण कर सकती है। भक्तिमति शारदा ने भगवान् कबीर (परमेश्वर कविर्देव) जी से उपदेश लिया और कल्याण का वरदान पाया। 

महर्षि सर्वानंद जी और कबीर साहेब की गोष्टी

महर्षि सर्वानंद जो भक्तिमति शारदा देवी के पुत्र थे और शास्त्रों और वेदों के विद्वान थे वे हमेशा ही शास्त्रार्थ करने के लिए उत्सुक रहते थे क्योकि उन्होंने  शास्त्रार्थ में बड़े बड़े विद्वानों को पराजित किया था। वह इस सोच में डूबा हुआ था की मैं सब के सामने घोषणा करना चाहता हूँ की मैंने सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया है तो मेरी माता श्रीमिति शारदा देवी जी मेरा दोबारा से नामकरण करे और मुझे सभी सर्वाजीत के नाम से सम्बोधित करें।

महर्षि सर्वानंद अपनी इस प्रस्ताव को अपनी माता के समक्ष रखने के लिए गया और भक्तिमति शारदा जो उनकी माता हैं उनसे आग्रह किया की माता श्री आप मेरा नाम सर्वजीत रख दीजिये ताकि मुझे सब सर्वाजीत के नाम से सम्बोधित करें यह तभी संभव होगा जब आप मुझे इस नाम से सम्बोधित करेंगी और मेरा नामकरण करेंगी। क्योकि में शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को पराजित किया है शायद ही कोई विद्वान बचा होगा जो मुझसे शास्त्रार्थ का मुकाबला करेगा। 

महर्षि सर्वानंद जी की माता जी की शर्त

यह सुनकर भक्तिमति शारदा अपने पुत्र महर्षि सर्वानंद से कहती है ठीक है मैं तुम्हे सर्वजीत कहकर सम्बोधित करूंगी और तुम्हारा नाम सर्वजीत रख दूंगी लेकिन इसके लिए मेरी इस शर्त हैं जिसे तुम्हे पूरा करना होगा। महर्षि सर्वानंद बहुत ही उत्सुकता से बोला और कहा कहिये माता श्री मुझे क्या करना होगा। भक्तिमति शारदा देवी बोली की पुत्र तुम्हे शास्त्रार्थ में मेरे गुरुदेव कबीर परमेश्वर (भगवान् कविर्देव) को हराना होगा तो ही मैं तुम्हे सर्वजीत के नाम से सम्बोधित करूंगी अन्यथा नहीं। 

भक्तिमति शारदा देवी का यह वचन सुनकर महर्षि सर्वानंद पहले तो जोर जोर से हंसने लगा और फिर कहा लगता है माताश्री आप का दिमाग खराब हो गया है वह धानक (बुनकर) और आपका गुरु। यह कैसे संभव है। चलिए मान लेते हैं की वो आपके गुरुदेव हैं और फिर उनसे शास्त्रार्थ करने के लिए कह रही हैं जिसे वेदों और शास्त्रों का बिलकुल भी ज्ञान नहीं है। जिसका काम केवल बुनना है शास्त्रों और वेदों का उसे क्या ज्ञान है माताश्री। आप मेरे नामकरण की तैयारी कीजिये बस मैं यूँ गया और यूँ आया। एक बुनकर को शास्त्रार्थ में हराना मेरे लिए को बड़ी बात नहीं है जबकि मैंने बड़े बड़े विद्वानों को हराया है। यह कहकर वह अपनी माता को प्रणाम करके शास्त्रार्थ करने के लिए रवाना हो गया। 

कबीर साहेब के द्वारा सर्वानंद जी के पानी के भरे बर्तन का जबाब देना।

महर्षि सर्वानंद जी अपने सभी शास्त्रों और वेदों को बैलगाड़ी में लाद कर परम परमेश्वर कविर्देव (भगवान् कबीर) के घर की ओर चल पड़े। और रस्ते में ख़ुशी ख़ुशी इसी सोच से चलते रहे की कब उस जुलाहे के घर पहुंचूंगा और कब उसे हराऊंगा। और सब लोग मुझे सर्वाजीत के नाम से पुकारेंगे। इसी सोच में मगन महर्षि सर्वानंद परमेश्वर कबीर के घर के द्वार के पर पहुंच गए और आवाज दी की।

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परमेश्वर कबीर की बेटी कमाली बाहर आकर महर्षि सर्वानंद जी को परनाम करती हैं और कहती हैं की यह परम पिता परमेश्वर कबीर जी का घर है। कहिये महर्षि जी क्या काम है आपको पिताश्री से। महर्षि सर्वानंद जी ने एक बर्तन लिया और उसे पानी से भरकर कबीर साहब की बेटी कमली को दे दिया और कहने लगे की पुत्री इसे अपने पिता श्री कबीर को दे देना और और इस पानी से भरे बर्तन को लेने के बाद कबीर जी जो भी उत्तर दे वो मुझे बता देना। लेकिन पुत्री इसे आप बहुत ही सावधानी के साथ लेकर जाना कहीं इसमें भरा हुआ पानी छलक न जाये क्योंकि मैंने इसमें इतना पानी भर दिया है की इसमें और कुछ भी नहीं डाला जा सकता है। 

कबीर साहेब की पुत्री ने वह पानी से भरा बर्तन परमेश्वर कबीर जी को दे दिया और कहा की ये महर्षि सर्वानंद जी ने दिया है। कबीर साहेब जो कपड़ा बुन रहे हैं उन्होंने कपडा बुनने वाली सुई को उस पानी में डाल दिया जिससे पानी थोड़ा छलक गया और निचे गिर गया फिर उस बर्तन को अपनी पुत्री के हाथ वापिस महर्षि सर्वानंद जी के पास भिजवा दिया।

कमाली ने वह बर्तन महर्षि सर्वानंद जी को दे दिया।  इस पर सर्वानंद जी ने कमली से कहा की आपके पिता जी ने क्या कहा। कमाली ने सारा का सारा वृतांत सुनाया। तब महर्षि सर्वानंद जी कबीर साहेब से पूछने लगे की अपने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। इस पर कबीर साहेब ने कहा अपने मुझसे क्या प्रश्न किया है कृपया बताये महर्षि जी?

यह सब सुनने के बाद महर्षि सर्वानंद जी बोले की मैंने शास्त्रार्थ (यानी वेदो और शास्त्रों की बहस) में सभी विद्वानों और ऋषि-मुनियो को हरा दिया है।  जिससे मैंने अपनी माता श्रीमती शारदा देवी से आग्रह किया था की चूँकि में शास्त्रार्थ में विजयी हूँ मैंने सबको हरा दिया है तो मेरा नाम सर्वाजीत रखा जाये लेकिन मेरी माताश्री ने कहा की मेरे गुरुदेव परम परमेश्वर कबीर साहेब को शास्त्रार्थ में हराने पर ही वह मेरा नाम सर्वजीत रखेगी।

तो इसलिए मैं आपसे शास्त्रार्थ करने के लिए आया हूँ। क्या आप मेरे साथ शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार हैं? और जहाँ तक मेरी सोच है मैंने आपके पास पानी से भरा बर्तन इसलिए भेजा था क्योकि मैंने ज्ञान प्राप्त करने की हर सीमा को पार कर लिया है मुझमे ज्ञान कूट कूट का भरा हुआ है जिस प्रकार बर्तन में पानी। अब अगर आप मुझे ज्ञान देते हैं तो वो मुझमे नहीं समा सकता वह बहार ही रह जायेगा। अर्थात ऐसा ज्ञान बचा ही नहीं है जो मैंने आज तक प्राप्त किया ही ना हो। अतः आपके लिए उचित यही होगा की आप मुझे लिखित में दे दें की अपने हार स्वीकार कर ली है। 

इस पर परमेश्वर कबीर साहेब बोले की मैं तुम्हे जो ज्ञान दूंगा वो इस सुई की भांति होगा। जिस प्रकार यह सुई तुम्हारे दिए हुए पानी के भीतर समा गई है ठीक उसी प्रकार मेरे द्वारा दिया हुआ ज्ञान तुम्हारे ह्रदय में समा जायेगा और तुम मेरे ज्ञान को प्राप्त कर लोगे। मैं तुम्हे तत्वज्ञान की प्राप्ति करवाऊंगा जो आज तक तुमने ग्रहण ही नहीं किया है। बल्कि आज तक तुमने जो ज्ञान प्राप्त किया है वह शास्त्रों , वेदो तक के आधार पर प्राप्त किया है जो तुम्हे स्वर्ग तो दे सकता हैं लेकिन पूर्ण परमात्मा, सतलोक को प्राप्त करने में असक्षम है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं करवा सकता। 


कबीर साहेब के वचन को सुनकर महर्षि सर्वानंद जी ने कहा की मेरे द्वारा प्राप्त किया गया ज्ञान व्यर्थ है यह असंभव है। आप मुझसे प्रश्न कीजिये। उस गाँव में जितने भी अनपढ़ लोग थे जिन्हे ज्ञान नहीं था वो सब उन्ही शास्त्रार्थ पर बहस को सुनने के लिए इकठ्ठा हो गए। तब परम परमेश्वर कबीर साहेब जी महर्षि सर्वानंद जी से प्रश्न पूछते हैं की –

कौन ब्रह्मा का पिता है, कौन विष्णु की माँ।

शंकर का दादा कौन है, सर्वानन्द दे बताए।।

महर्षि सर्वानंद जी का जबाब – महर्षि सर्वानंद जी कबीर साहेब के प्रश्न के उत्तर में जबाब देते हुए कहते हैं की श्री ब्रह्मा जी – रजगुण, श्री विष्णु जी – सतगुण, और श्री शिव जी – तमगुण है। ये तीनो अजर-अमर है। यही सभी देवो के देव महेश्वर और मृतुन्जय हैं। इन्होने किसी माता के गर्भ से जन्म नहीं लिया है अर्थात इनके न माता हैं न पिता। और तीनो ही नश्वर हैं।

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यधपि कबीर साहेब आपको शास्त्रों का ज्ञान प्रतीत नहीं होता इसीलिए आप मुझ से ऐसे बेतुके प्रश्न कर रहे हैं। वहां जितने भी भक्त एकत्रित थे उन सब ने महर्षि की प्रशंसा की और उनका पक्ष लिया।यह सुनकर कबीर साहेब कहने लगे महर्षि जी आप श्रीमद भगवत गीता, शिव पुराण, भगवत पुराण ग्रंथों के छठे और सातवें रूद्र सहिंता के तीसरे स्कन्द का अनुवाद पढ़ें। और साथ ही उसका अनुवाद करें। 

इसके लिए आपको गीता पर हाथ रखकर शपथ लेनी होगी की आप जो भी पढ़ेंगे वो सही सही सबको सुनाएंगे। महर्षि सर्वानंद जी ने गीता पर हाथ रखा और कहा मैं इन ग्रंथो में आपके द्वारा बताये हुए स्कन्द का जो भी अर्थ होगा सबको सही बताऊंगा। 

पवित्र वेदों व पुराणों ब्रह्मा विष्णु व शिव की उत्पत्ति के प्रमाण

भगवान् कबीर (कविर्देव परमेश्वर) के आग्रह करने पर महर्षि सर्वानंद जी ने उन पवित्र पुराणों का अध्ययन किया।  यह शिव पुराण (गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित हुई है, जिसके अनुवादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार हैं। ) पृष्ठ संख्या 100-103 पर लिखा गया है सदाशिव के संघ (पति-पत्नी कृत्य) अर्थात् काल-स्वरूप ब्रह्मा और प्राकृत (दुर्गा) से ही सतगुण श्री विष्णु जी, राजगुण श्री ब्रह्मा जी और तमगुण शिव जी’ का जन्म हुआ। यह बहुत ही प्राकृति (दुर्गा), जिसे अष्टांगी कहते हैं। यही त्रिदेवजननी कहलाती है, जो तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी) की माता हैं। 

यह पवित्र श्रीमददेवी पुराण (गीता प्रेस गोरखपुर, अनुवादक: श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार और चिमन लाल गोस्वामी से प्रकाशित) के तीसरे स्कन्द में स्पष्ट रूप से वर्णित है। पृष्ठ संख्या 114-१२३ पर भगवान् विष्णु जी कहते हैं की प्राकृत से ही हम तीनो का जन्म हुआ है। मैंने उनके दर्शन केवल एक छोटे बच्चे के रूप में किये थे।  माँ दुर्गा का गुणगान करते हुए श्री विष्णु जी ने कहा है की माँ, हम (ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव)) तीनो ही नश्वर हैं हम जन्म और मृत्यु के चक्र में हैं। और भगवान् शिव भी उनकी महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं की यदि ब्रह्मा और विष्णु ने आपके गर्भ से या आपसे उत्त्पन्न हुए हैं और आप उनकी माता हैं तो मैं भी आपका ही पुत्र हूँ मैं भी आपसे ही उत्त्पन्न हुआ हूँ। 

महर्षि सर्वानंद जी ने शास्त्रों में अब तक अधूरे ज्ञान को ही प्राप्त किया था और दूसरों को भी अधूरा ज्ञान ही बांटते आ रहे थे। जो ज्ञान शास्त्रों से परे है उस ज्ञान को प्राप्त करने से वंचित रहना महर्षि सर्वानंद के लिए भारी पड़ रहा था। क्योकि शास्त्रों के अनुसार तीनो देव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) अजन्मे हैं। यानि तीनो ही देवों ने जन्म नहीं लिया है यानी किसी गर्भ से उत्त्पन्न नहीं हुए हैं ये एक शक्ति हैं जो की बनाये गए हैं।

महर्षि सर्वानंद पुराणों को पढ़ने के पश्चात् भी अज्ञानी था क्योकि उसने तत्वज्ञान को प्राप्त नहीं किया था। पवित्र गीता में ब्रह्म काल जी खुद कह रहे हैं की मैं ही सभी जीवों को बुद्धि प्रदान करता हूँ। मैं जब चाहूँ एक जीवित प्राणी की बुद्धि में ज्ञान दे सकता हूँ और चहुँ तो अज्ञान भर सकता हूँ। परम परमेश्वर के कहने पर ब्रह्मा यानी काल ने अपने दबाब महर्षि की बुद्धि से हटा लिया। ब्रह्म का दबाब हटते ही महर्षि सर्वानंद की समझ में आ गया की वास्तव में पुराणों में यही लिखा गया है।

लेकिन महर्षि सर्वानंद को मन ही मन ये डर भी खाये जा रहा था की यह मान लेने से की पुराणों में वही लिखा है जो कबीर साहेब कह रहे हैं तो भक्त मेरा अनादर करने लगेंगे। यह सोच कर महर्षि ने कहा कबीर साहेब आप झूठ बोल रहे हैं मैंने सभी वेदों और पुराणों को अच्छे से पढ़ा है और रोज़ाना पढ़ता हूँ ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है जैसा आप कह रहे हैं। आपको शास्त्रों के बारे में क्या ज्ञान आप तो केवल एक बुनकर हो जो कपडा बुनने का काम करते हो हाँ अगर आपसे बुनने को कहा जाये तो आपको उसका ज्ञान अधिक होगा लेकिन शास्त्रों का ज्ञान हमसे ज्यादा किसी को नहीं हो सकता। और उन्होंने कहा की संस्कृत भी कोई भाषा है।  वे वेदो से परे हटके कुछ और बड़बड़ाते रहे लेकिन पुराण के बारे में कुछ भी नहीं सुनाया। 

वहां पर महर्षि सर्वानंद जी और कबीर साहेब को सुनने के लिए जो भीड़ लगी थी वे यह समझने असमर्थ थे की महर्षि सर्वानंद जी ने संस्कृत के बारे में बोलना शुरू कर दिया और वे उनसे प्रभावित होकर कबीर साहेब को भूलकर सर्वानंद जी के समर्थन में बाते करने लगे। यदि कहा जाये तो उन लोगो ने महर्षि सर्वानंद जी को विजयी घोषित करते हुए कबीर साहेब को पराजित करने के बारे में कहने लगे।  लेकिन भगवान् कबीर साहेब मुस्कुराकर बोले की हे ऋषिवर आप इतने महान और ज्ञानी महर्षि हैं और अपने गीता जो एक पवित्र ग्रन्थ है उस पर हाथ रखा था और शपथ ली थी के आप पुराणों में जो लिखा है वह सबको सच बताएंगे। ठीक है अगर आप सत्य को नहीं मानते हैं तो मैं अपनी हार से खुश हूँ आप विजयी हुए। लेकिन अपने पवित्र ग्रन्थ की शपथ लेकर और झूठ बोलकर उस ग्रन्थ का अपमान किया है। 

मैं आपको इससे सम्बंधित एक उदहारण देता हूँ जो आपको अवशय ही इसे समझने में मदद करेगा

एक गांव में एक किसान रहता था उसका एक पुत्र था जो सातवीं कक्षा में पढता था। कक्षा सात में आते आते उसने कुछ अंग्रेजी पढ़ना व् लिखना सिख ली थी। एक दिन का वाकया है की दोनों बाप और बेटा अपनी बैलगाड़ी में जा रहे थे की उन्हें रस्ते मैं एक अंग्रेज मिल गया और वो उनसे रास्ता पूछ रहा था तो पिता ने अपने पुत्र से कहा की पुत्र तुम्हे भी तो अंग्रेजी आती है ना।  आज इस अंग्रेज का अहंकार तोड़ दे बेटा की हम भी अंग्रेजी में किसी से कम नहीं है। उस लड़के ने अंग्रेज को बीमारी का प्रार्थना पत्र सुना दिया अंग्रेज उसकी इस बात से चिढ गया की मैं तो इनसे रास्ता पूछ रहा हूँ और वह उसको बीमारी का प्रार्थना पत्र सुना रहा है। उसने लड़के माथे पर हाथ लगाया और देखा की कहीं ये बीमार तो नहीं है और अपनी गाड़ी को लेकर चला गया। उस अंग्रेज के जाने के बाद पिता पुत्र की पीठ को थपथपाते हुए बोला आज बेटा अपने मेरा सिर आज गर्व से ऊँचा कर दिया है। पुत्र यह सुनकर जबाब देता है की पिता जी मेरा प्रिय मित्र तो मैंने अभी सुनाया ही नहीं है अगर वो सुना देता तो अंग्रेज शर्म के मारे अपनी गाड़ी को भी छोड़ के भाग जाता। 

ठीक इसी तरह कविर्देव (भगवान् कबीर) महर्षि सर्वानंद जी से कुछ प्रश्न कर रहे हैं और उसके प्रत्युत्तर में महर्षि सर्वानंद जी कुछ और जबाब दे रहे थे। 

उस बहस के बाद कविर्देव (कबीर साहेब) ने महर्षि सर्वानंद जी से कहने लगे की महर्षि जी आप जीत गए हैं और मैं हार गया हूँ। लेकिन सर्वानंद जी को ऐसे अपनी जीत स्वीकार नहीं थी उन्होंने कहा की कबीर साहेब आप हमें लिखित रूप में देंगे की आप हार गए हैं क्योकि किसी भी काम को अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। अगर आप लिखित में नहीं देते हैं तो यह कार्य अधूरा रह जायेगा।

भगवान् कबीर (परमेश्वर कविर्देव) जी सर्वानंद जी को कहते हैं की जीत आपकी हुई है यह कार्य भी आप ही करने मैं केवल अपना अंगूठा लगा दूंगा आप इस पत्र में जो लिखना चाहते हैं लिख सकते है। 

सर्वानंद जी के घोषणा पत्र के अक्ष्ररो का बदलना।

महर्षि सर्वानंद जी  ने लिखा की शास्त्रार्थ में मेरी यानि महर्षि सर्वानंद जी की जीती हुई और कबीर साहेब की हार। यह लिख कर उन्होंने कबीर साहेब का अंगूठा पत्र पर ले लिया और अपने घर के लिए ख़ुशी ख़ुशी रवाना हो गए। अपने घर पहुंच कर कहने लगे की माताश्री आप कहती थी की आपके गुरुदेव को शास्त्रार्थ में कोई हरा नहीं सकता देखो मैंने जैसे कहा था वैसा किया उनको हरा दिया। मैंने आपसे पहले ही कहा था की उनको वेदो और शास्त्रों का कोई गया नहीं है। देखिये मैं लिखित रूप में लेकर आया हूँ।  भक्तिमति शारदा देवी ने कहा की इसमें जो भी लिखा है वह मुझे जोर जोर से पढ़कर सुनाओ। जब महर्षि सर्वानंद जी पढ़ने लगे तो उस पत्र में लिखा था की शास्त्रार्थ यानी वेदो और शास्त्रों की बहस में महर्षि सर्वानंद की हार हुई है और भगवान् कबीर (परमेश्वर कविर्देव) जी की जीत। यह सुनकर सर्वानंद जी की माता जी बोली क्यों तुम तो कह रहे थे की कबीर साहेब की हार हुई है और तुम्हारी जीत लेकिन लिखे हुए को तुम पढ़ रहे हो तो लिखा है की तुम्हारी हार हुई है और कबीर भगवान् की जीत। यह सुनकर महर्षि सर्वानंद जी थोड़ा घबराकर बोले की नहीं माता जी मैं काफी दिनों से धर्मनिरपेक्ष की बहस में व्यस्त था तो कई दिन की नींद हो गई है इसलिए मुझसे गलत लिखा गया। मैं दोबारा जाता हूँ और सही लिखकर लता हूँ। भक्तिमती शारदा देवी जी कहती है की पुत्र मुझे लिखित में चाहिए मौखिक में नहीं। 

महर्षि सर्वानंद जी जल्दी से कबीर साहेब के घर जाते हैं और सारा का सारा वृतांत सुनते हैं उस कबीर जी कहते हैं की ठीक है महर्षि जी दोबारा लिख लो तब महर्षि सर्वानंद जी लिखकर दोबारा अपने घर आते हैं और अपनी माता जी को पढ़कर सुनाते है लेकिन इस बार भी वही लिखा था जो पहले लिखा था की महर्षि सर्वानंद जी की हार हुई है और कबीर भगवान् की जीत। ऐसा विकल्प महर्षि जी तीन बार करते है हर बार घोषणा पत्र में यही लिखा होता था।  महर्षि जी आपकी बार फिर कबीर साहेब के पास लिक्वाने के लिए जाते हैं और कहते हैं की यह क्या हो रहा है आज मेरे साथ। 

अबकी बार महर्षि जी लिखे हुए घोषणा पत्र को अपने घर के द्वार तक पढ़ते आते हैं और कहते हैं की यह सही लिखा है फिर जैसे ही वे अपने घर में प्रवेश करते हैं तो उनकी आँखों के सामने ही शब्दों में फेर हो जाता है यह देख महर्षि सर्वानंद जी गहरी सोच में चले जाते हैं की अब माता जी को पढ़कर सुनाऊ या नहीं। महर्षि जी सोच ही रहे हैं की माता जी उनको कहती हैं की पुत्र हमारे यहाँ स्वयं भगवान् आये है वो भी कबीर साहेब के रूप में।  आपको अपनी गलती स्वीकार कर लेनी चाहिए और और उनका कहा मानना होगा।  अब जल्दी  से जाकर उनसे क्षमा मांग लो और उनका उपदेश भी ग्रहण करो तुम्हारा जीवन सफल हो जायेगा। 

महर्षि सर्वानंद जी द्वारा कबीर साहेब से क्षमा के लिए प्रार्थना करना।

यह सुनकर महर्षि सर्वानंद जी अपनी माता के चरणों में गिरकर जोर जोर से रोने लगे और कहने लगे की मान कबीर साहेब साक्षात् भगवान् का रूप हैं मैंने उन्हें पहचानने में बहुत बड़ी गलती कर दी है।  मेरी गलती शायद क्षमा लायक भी नहीं है क्योकि मैंने स्वयं भगवान से शास्त्रार्थ करने की चेष्टा की और और उन्हें निचा दिखने की कोशिश की। अब मैं उनसे किस मुँह से माफ़ी मांगूंगा। मेरा सिर तो लज्जा से झुक गया है अब आप ही मेरे साथ चलकर मुझे क्षमा करने के लिए कहेंगे तो शायद परम परमेश्वर मान जाये। महर्षि की माता जी उनको लेकर कबीर साहेब के पास गई कर क्षमा मांगी और कहा की हे भगवन इन्हे अपना उपदेश भी दे दीजिये ताकि इनका जीवन भी सफल हो सके। 

परम परमेश्वर कबीर साहेब ने महर्षि सर्वानंद जी को क्षमा किया और उनको उपदेश दिया। फिर उन्हें अपनी शरण में लेकर महर्षि सर्वानंद जी को मोक्ष की प्राप्ति की। 

और महर्षि सर्वानंद से कहने लगे की तुमने शास्त्रों को पढ़ा जरूर लेकिन उनको साक्षरता के आधार पर नहीं समझ  सके।  अगर तुम्हे शास्त्रों का सच्चा ज्ञान चाहिए तो मेरी शरण में आपको आना ही होगा क्योकि मेरी शरण में आने मात्र से ही ब्रह्म यानि काल तुम्हारी बुद्धि को विकसित होने देगा अन्यथा नहीं। 

अब तुम मेरी शरण में हो इसलिए इन वेदों और शास्त्रों को दोबारा से पढ़ो क्योकि अब तुम पूर्ण ब्राह्मण बन गए हो। “ब्राह्मण सोइ ब्रह्म को जान ले “, केवल वह एक ऐसा ज्ञानी है जो ईश्वर को पहचानता है और फिर आपका कल्याण करता है। 

परमेश्वर कबीर साहेब ने अपने प्रवचनों में 550 वर्ष पहले पवित्र पुराणों,  वेदो और शास्त्रों के बारे में ज्ञान दिया था लेकिन उसके बाद अब तक कोई भी ऋषि-मुनि या कोई भी ज्ञानी ऐसा ज्ञान नहीं दे पाया। उन ऋषि मुनियों ने कहा की पुराणों को पढ़ना जरूरी है और कबीर साहेब को अज्ञानी बताते हुए कहते हैं की कबीर साहेब को कोई ज्ञान नहीं है वह तो निरक्षर हैं।  कबीर साहेब को संस्कृत भाषा का ज्ञान कैसे हो सकता है। वे यह भी बताते हैं की श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु, श्री शिव तीनो ही सम्पूर्ण गुणों से सम्पूर्ण हैं वे अजर-अमर हैं।  वे नश्वर भी हैं क्योकि उन्होंने किसी गर्भ से जन्म नहीं लिया है। इसलिए उनके न तो कोई माँ और न ही कोई पिता। वही सभी देवी देवों के देव हैं वे मृत्यु पर अपनी जीत की मुहर लगा चुके हैं यानि मौत भी उन्हें नहीं मार सकती है। उन्होंने ही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण किया है। 

वे सभी ग्रन्थ और पुराण हमारे साथ है जिनमे यह वर्णित है की रजगुण-श्री ब्रह्मा जी, सतगुण- श्री विष्णु, और तमगुण-श्री शिव (महेश) तीनो के माता-पिता के बारे में है। 

आपको ज्ञात हो तो या सुना हो तो उस समय हमारे पूर्वज इतने पढ़े लिखे नहीं होते थे बस कुछ जाति और कुल में ही पढ़ाई की जाती थी। इस तरह से शिक्षा आम नहीं थी। जिसकी वजह से उन्हें शास्त्रों के बारे में जयादा ज्ञान नहीं था। फिर भी वो लोग प्रूफ़ करने के लिए कहते थे की कबीर साहब झूठे हैं और उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं है। अभी तक कोई भी ऐसा शास्त्र नहीं है जिसमे लिखा गया हो की तीनो देवों (श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु, और श्री शिव) के माता-पिता नहीं हैं। या इन्होने जन्म नहीं लिया है। एक पुराण है जो ये प्रमाण देता है की इन तीनो देवों ने जन्म लिया है। और ये तीनो ही जन्म और मृत्यु के चक्र में हैं। इनके माता प्राकृति और पिता निरंजन यानी ब्रह्म हैं जो स्वयं काल के रूप में हैं। 

यदि आज के युग की बात की जाये तो पूरा का पूरा समाज शिक्षित है जिसे बहकाया नहीं जा सकता और न ही गुमराह किया जा सकता है क्योंकि वे सब अपनी शिक्षा के आधार पर यह सब समझ रखते हैं की उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। जो बात परमेश्वर कबीर जी ने अपने प्रवचनों में कही है या लिखी है वह किसी ग्रन्थ या पुराण या शास्त्र में नहीं लिखी गई है। 

ईश्वर कबीर साहेब (कविर्देव) का पवित्र प्रवचन: –

धर्मदास यह जग बौराना। कोइ जाने पद निरवाना।।

अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रिदेवन की उत्पति भाई।।

ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।।

माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।।

पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।।

धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।।

तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।।

तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।।

तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सु निरंजन बासा लीन्हा।।

अलख निरंजन सु ठिकाना। ब्रह्मा, विष्णु शिव भेद न जाना।।

अलख निरंजन बड़ा बटपारा। तीन लोक जिव कीन्ह अहारा।।

ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये।।

तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।।

तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।।

तीनों गुणका यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।।

गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार।

कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरें पार।।

परमेश्वर कबीर साहेब द्वारा धर्मदास जी को ब्रह्म जी की उत्पत्ति का ज्ञान कराना

परम परमेश्वर कबीर साहेब अपने प्रवचनों में अपने सबसे करीबी और चहिते शिष्य से कहते हैं की शिष्य धर्मदास इस दुनिया में तत्वज्ञान की कमी के कारण मोक्ष और प्रकृति की पूर्ण सरचना के बारे में कोई ज्ञान और मार्ग का भी जानकारी नहीं है। भक्त धर्मदास जो ज्ञानी व्यक्ति होगा वो तो इसे समझने कदाचित समय नहीं लेंगे परन्तु जो लोग अज्ञानी हैं जिन्हे बिलकुल भी ज्ञान नहीं है या ज्ञान होते हुए भी अज्ञानी की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं उन्हें तुम चाहे कितना भी प्रमाण दे दो वो लोग समझ नहीं पाएंगे। 

भक्त धर्मदास जिन्हे प्रमाण भी दिया गया है समझ भी नहीं पा रहे हैं उन्हें तो निश्चय ही भक्ति के लायक नहीं समझ सके हैं अर्थात उन लोगो पर तो काल यानी ब्रह्म का साया है वह उन्हें यह समझने ही नहीं दे रहा है। 

भक्त धर्मदास आज मैं आपको बताता हूँ की तीनो महान शक्तियों (रजगुण-श्री ब्रह्मा जी, सतगुण-श्री विष्णु जी और तमगुण-श्री शिव जी) के माता-पिता कौन हैं और इनका जन्म कैसे हुआ है? 

सबसे पहले श्री ब्रह्म जी की उत्पत्ति हुई थी जो की एक अंडे से उत्पन्न हुए थे। और उसके बाद दुर्गा जी का जन्म हुआ।  दुर्गा के रूप और सुंदरता को देख ब्रह्म जी उनकी और आकृर्षित हो गए और उनके साथ गलत हरकत करने लगे अर्थात दुर्व्यवहार किया।

उनसे तंग होकर या बचने के लिए दुर्गा जी उनके पेट में छुप गई। मैं यानि भगवान् कबीर ब्रह्म काल के पास गए जहाँ दुर्गा जी ब्रह्म के पेट में छुपी हुई थी उसको १६ संक दूर २१ ब्राह्मणो के साथ भेज दिया। ब्रह्म यानी काल (ज्योति निरंजन) ने देवी दुर्गा (प्रकृति) के साथ सम्भोग किया जिससे इन तीनो गुणों (रजगुण-श्री ब्रह्मा जी, सतगुण-श्री विष्णु जी, और तमगुण-श्री शिव जी) का जन्म हुआ है।

अर्थात इन तीनो गुणों या शक्तियों के माता अष्टांगी यानी देवी दुर्गा और पिता ब्रह्म यानी काल निरंजन है जिनके मिलन से इनका इस सृष्टि में जन्म हुए है।  मनुष्य या हर वह जीवित प्राणी जो इन तीनो गुणों की पूजा करता है काल के जाल में फंस के रह जाता है।

जब ये सब प्राणी उस असली मंत्र (तत्वज्ञान) को प्राप्त और समझ नहीं लेंगे तब तक इन्हे पूरी तरह से मुक्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि भक्त धर्मदास तत्वज्ञान ही एकमात्र मंत्र है जो मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति तथा सतलोक की प्राप्ति में सहायक है।

अतः यदि आप पूर्ण मुक्ति चाहते हैं तो तत्वदर्शी संत को खोजो और उनसे नाम दीक्षा प्राप्त करके सतलोक को प्राप्त करो। जन्म और मृत्यु के इस चक्र से मुक्ति प्राप्त कर लीजिये। 

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